Monday, June 11, 2018

पुस्तक समीक्षा
 बैसाखियों के पैर 
पुस्तक समीक्षा : बैसाखियों के पैर 
लेखक : भगीरथ परिहार 
प्रकाशक : एडूक्रियेशन पब्लिशिंग, दिल्ली 
मूल्य : 280/-

44 साल की परम्परा है बैसाखियों के पैर : कान्ता रॉय 

1974 ई. में 'गुफाओं से मैदान की ओर' से एक बात निकली थी जमाने के लिए, जिसने बातों के कई पर्वत श्रृँखलाएँ गढ़ते हुए परिवर्तनकारी सामाजिक सुधार के उद्देश्य से कह डाला कि 'पेट सबके हैं।' इस तरह कह डालना इतना आसान भी नहीं रहा था, फिर भी आलोचनाओं के विशाल समंदर में एक सिद्धहस्त तैराक की तरह अगाध जलराशि को पार कर, विजेता बन, इस उम्र में भी निरंतरता को बनाए रख लघुकथाकार भगीरथ परिहार ने फिर से गढ़ दिए हैं 'बैसाखियों के पैर', जिसके प्रभाव से अपने इस नवीनीकरण को देखकर कई बैसाखी जो पुरातन ढर्रे पर टिकने की कोशिश में थे आज एकाएक चरमरा उठे हैं। 
बैसाखी स्वयं में अर्थहीन ही नहीं बल्कि मोहताज भी हुआ करती है फिर भी लाचारगी को संबल चाहिए इसलिए आज उसकी भी कीमत है। आदमी की लाचारी से बैसाखी का कद, इसकी कीमत बढ़ती है, इसलिए बैसाखियां दुआ माँगती है आदमी के अपाहिज होने का।
बैसाखी की प्रवृत्ति 'आदमखोर' भी होता है, वह आदमी को सहारा देने के नाम पर उसकी कर्मठता को ठगती हुई मानसिक रूप से अपाहिज बनाने लगती है, क्योंकि आदमी की लाचारी में ही 'बैसाखियों के पैर' गतिशील हुआ करते हैं।
वह अपनी टांगों सहारे नहीं चलता था, क्योंकि उसकी महत्वाकाक्षाएँ ऊँची थी क्योंकि वह चढ़ाइयॉं बड़ी तेजी में चढ़ना चाहता था, क्योंकि उसे अपनी टांगों पर भरोसा नहीं था क्योंकि वे मरियल और गठिया से पीड़ित थी।“----- यहाँ व्यंग्य शैली में बात को कहने की अलग ही तस्वीर नजर आती है। फिर दूसरी पंक्ति में चाटुकारिता को परिभाषित करने का जो अंदाज यहाँ देखने को मिला वो अद्वितीय है कि
फिर भी, जिन दूसरी टांगों के सहारे चलता था, उन पर टरपेन्टाइन तेल की मालिश किया करता था। हाथ की मॉंसपेशियाँ खेता नाई की तरह मजबूत हो गई थी और शाम उनके टखने एवं ऊँगलियॉं चटखाया करती थीं ताकि विश्वास हो जाये कि कल भी ये टांगे उसका साथ देंगी।“--------'बैसाखियों के पैर' प्रतीकात्मक रूप में कही गई एक सशक्त लघुकथा है। हाथ की माँसपेशियों का खेता नाई की तरह मजबूत हो जाना, बैसाखियों के आदतन लोगों के स्वभाव और आचरण में लिजलिजेपन को अभिव्यक्त करती है।
लघुकथा इस एक कथ्य को ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण पुस्तक में निहित भाव का संवहन करने में  सफल  है।

इसमें जरा भी दो राय नहीं है मानने में कि भगीरथ परिहार  की पुस्तक पढ़ना अपने आप में एक विशिष्ट उपलब्धि है। लघुकथा साहित्य के अध्ययन संबध में ये कहा जा सकता है कि इनको नहीं पढ़ा तो आपने कुछ भी नहीं पढ़ा। 
भगीरथ परिहार की सभी लघुकथाएं धैर्य से लिखी गयी प्रतीत होती है। संग्रह की लघुकथाओं में नैसर्गिक आरोह-अवरोह गतिमान है। लेखन मौलिकता लिए नव-निर्माण करती नजर आती है। पुस्तक की पहली लघुकथा 'आदमखोर' की पहली पंक्ति स्त्री-विमर्श से शुरू तो होती है लेकिन नरभक्षियों के प्रादुर्भाव के साथ ही राजपुरूष के प्रेम को माधुर्यता से अभिव्यक्त करने में कामयाब हो जाती है। यहाँ प्रेम को अलहदा तरीके से सम्प्रेषित किया गया है जो लघुकथा को श्रेष्ठ बनाता है। समाज, परिवार से ठुकरायी गयी स्त्री को जब भी कोई राजपुरूष प्रेम के वश में उसकी ओर बढ़ेगा, स्त्री को उसकी छाती से चिपकने से कोई भेड़िया रोक नहीं सकता है।
'आदमी की मौत' लघुकथा की संरचना ढोलनुमा पेट, दाढ़ी सूखी जंगली घास, काला स्याह शरीर, बाहर झांकते पीले मैल जमे दाँत के सहारे की गई है। आदमी को आखिर में मरना ही पड़ा। प्रतीकों के सहारे यहाँ गजब की बुनावट दिखाई देती है।

'अपराध' में एक अलहदा रंग उभरकर सामने आया है। किशोरावस्था और यौनिक जिज्ञासा कथ्य के केंद्र में है। बाकी सब बातों पर तो छूट दी भी जा सकती है लेकिन किशोरावस्था में प्रेम करना! यह तो अपराधी करार देने का पक्का कारण है।
'असीम आकाश' पाने के नाम पर महत्वाकांक्षी भ्रामक स्वप्न बोध से उबरने को सचेत भी करती है लघुकथाएं।
'अतिथि' आईना है संयुक्त परिवार के विघटन का। परायेपन के एहसास से गुजरती हुई स्त्री अनजाने में ही सही रचती जाती है पराएपन की जमीन। बोती है बीज निज सुख की और उगाती है फसल अतिथ्य के रूप में निज सम्बन्धों में स्वार्थ की प्रतिफल।
'बलिदान' में पुत्र का माँ के सुख के लिए स्वंय का बलिदान, 'बुद्ध की आँखें' चैतन्य होने का बोध देती है तो वहीं 'बन्दी जीवन' स्त्री पुरुष सम्बन्धों में प्रेम और कर्तव्य के समीकरण में उलझने को बेबस पति पत्नी के मन की छटपटाहट को बुनती है। फेसबुकलघुकथा के जरिये स्त्रियों के साथ छेड़छाड़ को उद्दत बेशर्म पुरुष प्रवृत्ति को उजागर किया गया है। इस लघुकथा को पढ़ते हुए मन सोचने पर मजबूर हुआ कि पढ़े लिखों का हमारा समाज कितना शिक्षित है? मेसेंजर में स्त्री संग एकांत पाने की लालसा, वाकई में छिछोरे सिर्फ नुक्कड़ों पर ही नहीं पाए जाते है बल्कि यहाँ हर इनबॉक्स की खिड़की से झांकते ये पाए जाते हैं। इन बातों पर खुलकर चर्चा करने की जरुरत है ताकि बदनीयती पर अंकुश लग सके। भगीरथ परिहार की दृष्टि अभी युवा है, इन्हीं क्षण विशेषों से इंगित होती है।  
'भाग शिल्पा भाग' भ्रूण हत्या को लेकर एक जबरदस्त लघुकथा है। यहाँ अभिव्यक्ति की शक्ति को एक आश्चर्यजनक प्रवाह देखने को मिलता है। 
'चम्पा' मैला ढोने के विरोध में दलित-विमर्श को हवा देती अच्छी लघुकथा है। चेहरा, छिपकली, चीखें, चुनौती, ये सबके सब लघुकथाएँ कथ्य को व्याकुलता से अभिव्यक्त करने में सक्षम हैं। 
पुत्रियाँ इतनी जल्दी युवा क्यों हो जाती हैं! युवा होकर सपने क्यों देखती है! सपने भी इन्द्रधनुषी! सपनों में वे हिरनियों - सी कूदती - फांदती, किलोल करती, मदन - मस्त विचरण करती है। हिरनी जैसी आँखों को देखकर सपनों का राजकुमार पीछा करता है। वह रोमांचित हो उठती है। अंग - प्रत्यंग मस्ती में चूर। इस उमर में इतनी मस्ती आती कहाँ से है!” ----- ‘सपने नहीं दे सकतालघुकथा की ये शुरुआत की पंक्तियों से जो अंतर्द्वंद वेदना का शूल बनकर छाती में उतरती है और अंत तक आते आते कलेजे के पार निकल जाता है, ह्रदय को रक्त-रंजित कर जाती है।
बेटी, सपना देख, लेकिन सपने में राजकुमार को मत देख।“----कहती हुई पंक्ति जब आत्महीन, टूटी हुई स्त्री को पुनश्च नव चेतना को ये कहकर जगाती हुई सपने देखने के लिए कहती है कि, “...लेकिन सपने देखने वाले ही सामाजिक यथार्थ को बदलते है। नहीं, तू देख सपने और मुस्तैदी से देख,कि तू औरत की नियति बदल सके।“---और यहाँ कथ्य का ऐसा उठान हुआ कि कथा अपने आप हठात एक समर्थ लघुकथा बन जाती है।
भगीरथ परिहार ने लघुकथा में एक लम्बे संघर्ष को जिया है। उन्होंने  लघुकथा साहित्य को विकसित कराने में अपनी सशक्त भूमिका निभाई है। लघुकथा में रचे बसे हुए लेखक हैं, इसलिए जब मैं फड़फड़ाहटलघुकथा से गुजर रही थी तो ऐसा लगा कि मानों यह अभिव्यक्ति मात्र है, इसमें कथातत्व कहाँ है? मन के उथल-पुथल को पकड़ अपनी व्यग्र भावों का सम्प्रेषण ही तो है। फिर सोचा कि हो सकता है मेरी नजर वहां न पहुंची हो। कभी अवसर मिला तो आपसे मिलकर इस बिंदु पर, आपका दृष्टिकोण जरूर चाहूंगी।

पुस्तक में निहित सतहत्तर श्रेष्ठ लघुकथाएं मन के अंदर उठती कोलाहल का स्वर है। प्रतीकों व बिंबों का प्रयोग मनःस्थिति को लेकर अपने प्रयोजन में सफल है। तर्क का अनुशासन प्रत्येक लघुकथा में परिलक्षित होता है।
लघुकथा संग्रह का एक आकर्षण परिशिष्टभी है। यह  'बैसाखियों के पैर' को एक अलग श्रेणी में रखता है जिसमें आधुनिक लघुकथा की अवधारणा विस्तार से आलेखित है। लघुकथा के शिल्प पर चर्चा-विमर्श के तहत जगदीश कश्यप एवं विक्रम सोनी को पूछे गए प्रश्नों के उत्तर प्रश्नोत्तरी स्वरुप रखा गया है। जब विधा सम्मत तकनीकी प्रसंग पुस्तक का हिस्सा बनता है तब लेखक और पाठक दोनों की दृष्टि से उस पुस्तक की महत्ता बढ़ जाती है। मुझे इस पुस्तक की लगभग सभी लघुकथाएं पसंद आयी है।
 लघुकथाकार की चिंतनशीलता लघुकथा संग्रह के सार्थकता के मिशन को पूरा करती है, ऐसा मेरा निजी मत है। मनुष्य के चैतन्यता और उसके आवरण को अभिव्यक्त करने का आधारभूमि है यह लघुकथा संग्रह।


कान्ता राय
मकान नम्बर-21
सेक्टर-सी सुभाष कालोनी ,
नियर हाई टेंशन लाईन,गोविंदपूरा, भोपाल-462023
फोन – 9575465147,ई-मेल- roy.kanta69@gmail.com


Wednesday, August 23, 2017

कटे हुए पंख

कटे हुए पंख

रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

एक निरंकुश बादशाह को मरते समय उसके बाप ने कहा, बेटा,प्रजा शेर होती है.बादशाह की कुशलता इसी में है कि शेर पर सवार रहे. नीचे उतरने का मतलब है मौत. इसलिए यह ध्यान रखना कि लोग गुलामी के आगे कुछ न सोच सकें. जनता में जो सरदार प्रसिद्ध हो जाय उसे रास्ता का कांटा समझकर हटा देना. बेटे ने बाप की शिक्षा का पालन किया और सबसे बूढ़े वजीर को हवालात में बंद कर दिया. बूढा वजीर आज तक सारे शासन का सूत्रधार था.
इसी बीच कहीं से उड़ता हुआ एक तोता राज्य में आ पहुँचा. उसने चारों दिशाओं में उडकर कहना शुरू कर दिया ,  गुलाम बने रहना सबसे बड़ी कायरता है. चुप रहकर सहना सबसे बड़ा पाप है.
प्रजा में खुसुर-पुसुर शुरू हो गई. तोते की वाणी को देव वाणी समझकर लोग एकजुट होने लगे. बादशाह को भी सुराग मिल गया. उसने तोते को पकडवाकर पिंजरे में बंद करवा दिया.
क्रुद्ध जनता ने तोते को मुक्त करने की आवाज उठाई तो बादशाह ने वाहवाही लूटने के लिए उसे पिंजरे से मुक्त कर दिया. तोता उडकर दूर के वृक्ष पर जा बैठता, इसके पूर्व ही प्रजा बादशाह की दरियादिली का बखान करती हुई लौट आई.

परन्तु तोता उड़ न सका. वह धीरे-से पिंजरे के पास बैठ गया था: क्योंकि उसके पंख मुक्त होने से पहले काट
दिए गए थे.   

Sunday, June 4, 2017

लघुकथा का रचना विधान
भगीरथ
लघुकथा जहां तक लोक, बोध, नीति और उपदेश तक सीमित रहती है उसका कलेवर, उसकी भाषा और शैली भी बहुत हद तक कथ्य की उद्देश्यपरकता से प्रभावित होती है उसमें कथा- क्रम रोचक होता है और अंत में पूरी कहानी के कथ्य को नीति वाक्य में निचोड़ कर कह दिया जाता है।
पंचतन्त्रीय कथाओं का उद्देश्य जीव - जन्तुओं की प्रकृति एवं मनुष्य के चारित्रिक लक्षणों में साम्यता स्थापित कर , कुछ उपदेशात्मक बातें या व्यवहारिक सीख देने का रहा है। इन कथाओं के रचनात्मक विधान में प्रतीकात्मक व प्रक्षेपणात्मक शैली का प्रयोग हुआ है और इसलिए ही ये साहित्य की अद्वितीय रचनाएं सिद्ध हुई है।
वर्तमान में जीवन की परिस्थतियों एवं मानवीय संबधों की जटिलता की वजह से नीतिकथाएं, जो परिस्थतियों और मानवीय संबंधों के द्वंद्व का अति सरलीकृत एंव फार्मूलाबद्ध रूप है अब अप्रासांगिक हो गई है।
नीतिकथाओं में कथोपकथन शैली का भी व्यापक प्रयोग हुआ है  जिसे रचना की उद्देश्यपरकता के परिप्रेक्ष्य को ध्यान में रखकर रचना में व्यवस्थित किया जाता है।
जिब्रान की रूपक कथाओं की भाषा शैली में प्रतीकात्मकता ओर व्यजंनात्मकता  की शक्ति के कारण वे साहित्य में अद्वितीय रचनाएं सिद्ध हुई है उनके कथ्य शाश्वत है और इसी कारण अमूर्त एवं रहस्यवादी बन गई है रचनाएं ।
हिन्दी की प्रारम्भिक लघुकथाओं में शैली के स्तर पर या कथ्य के स्तर पर कोई नई जमीन नहीं तोड़ी गई चाहे रचनाकार जगदीशचन्द्र मिश्र रहे हो या रावी ।
लेकिन आठवें दशक के आते - आते लघुकथा अभिव्यक्ति की विवशता के रूप में प्रस्फुटित हुई। क्योंकि जीवन  का तल्ख यथार्थ अभिव्यक्ति चाहता था। अतः आठवें दशक की लघुकथा यथार्थ की जमीन पर खड़ी दिखी । कथ्य की विविधता ने लघुकथा में नई जमीन तोड़ी और शैली के स्तर पर व्यापक प्रयोग हुए भाषा गठन में भी बदलाव आया। क्योंकि अब लघुकथाकार का उद्देश्य साम्प्रतिक जीवन के यथार्थ को कथा में प्रस्तुत करता था न कि कोई उपदेश या दृष्टांत देना था।
लघुकथा का पूरा आन्दोलन अव्यवसायिक पत्रिकाओं और नये रचनाकारों ने चलाया व्यवसायिक जगत में लघुकथा की कोई पहचान नहीं थी । कालान्तर में व्यवसायिक जगत ने इस आन्दोलन के परचम को थामने की कोशिश की लेकिन उसमें उन्हें मामूली सफलता ही मिली सारिका के लघुकथांक और श्रेष्ठ लघुकथाएं, एंव समान्तर लघुकथाओं के प्रकाशन ने यह साबित किया कि व्यवसायिक जगत केवल लघुकथा के नाम पर व्यंग्य लघुकथा या व्यंग्य रचनाओं से ही वाकिफ है। और आठवें दशक में लघुकथा जो तस्वीर अव्ययवसायिक पत्रिकाएं प्रस्तुत कर रही थीं उनका कोई उल्लेख उनमें नहीं था इस कारण भी लघुकथांक व पुस्तकों में व्यंग्य लेखकों को ही स्थान मिला ।
हरशिंकर परसाई ने व्यंग्य लघुकथाएं भी लिखी है और उनका अधिकतर लेखन व्यंग्य रचनाओं के नाम से जाना जाता है जिसमें कथातत्व की प्रमुखता न हो कर भाषा  व्यञ्जकता    और शैली की व्यंग्यात्मकता है। हरिशंकर परसाई के लिए व्यंग्य  कोई हास्य की वस्तु नहीं है हालांकि उपहास उन्होंने जरूर उडाया है जिन्हें व्यंग्यरचनाएं एवं लघुकथा का फर्क मालूम नहीं है उन्हें परसाई की लघुकथाएं और व्यंग्य रचनाओं को साथ - साथ रख कर पढ़ना चाहिए।
अव्यवसायिक क्षेत्रों में यथार्थ के साथ व्यंग्य था लेकिन जब हम किसी विधा का अंक प्रकाशित कर रहे हो तो इतना तो ध्यान रखा जाना चाहिए व विधा की समग्र तस्वीर प्रस्तुत करें ।
लेकिन रमेश बत्रा के संपादन में साहित्य निर्भर तारिका लघुकथांकों ने लघुकथा को ईमानदारी से पेश किया यह पहली बार था कि लघुकथा को साहित्य जगत में ठीक से प्रस्तुत किया गया उसके बाद तो लघुकथांकों  की अच्छी परम्परा है।
व्यवसायिक क्षेत्रों में व्यंग्य कथा के अन्तर्गत पैरोडी कथाओं का भी व्यापक प्रयोग हुआ लेकिन एक सीमा के बाद वे निरर्थक साबित होने लगी क्योंकि उनमें पौराणिक कथाओं के निष्कर्षो पर आधुनिक पात्र थोपे गये मूल्यों में आए पतन को दर्शाने की इन लघुकथाओं ने कोशिश अवश्य की लेकिन अपेक्षाकृत सरलीकृत तरीके से ये लघुकथाएं लिखी गई अतः प्रकान्तर में वे अनुपयोगी होकर रह गई।
घटना कथा व व्यथा कथा के नाम से व्यवसायिक क्षेत्रों में लघुकथा लिखी जाने लगी जो केवल घटना की रिपोर्टिंग होती थी। उसमें लघुकथा के रूप विन्यास पर कोई मेहनत नहीं होती थी भाषा भी पूर्ण अखबारी होती थी यथार्थ तो था लेकिन ललित    साहित्य नहीं।
लगातार तनाव की स्थिति को  भोगती रचनाएं  क्लाइमेक्स से आरम्भ हो - उसी स्तर पर यात्रा कर  वहीं समाप्त हो जाती है ऐसी लघुकथाएं पाठक को पकड़े रहने में सक्षम होती है ।
कभी - कभी लघुकथा तेजी से चरमोत्कर्ष की ओर दौड़ती हे और अप्रत्याशित ही समाप्त हो जाती है। यहां पाठक स्तम्भित, भौंचक, सम्मोहित या चौंक पड़ता है। ऐसी रचनाएं लघुकथा में काफी सफल होती है क्योंकि इनका कथ्य धारदार और उसका प्रकटीकरण भी उतना ही सशक्त।प्रभावी डायलाॅग के रूप में लिखी रचनाएं, एक स्थिति को प्रकट करती है। जिसमें कथोपकथन के जरिए ही कथा का विकास व पात्रों के भावों की अभिव्यक्ति होती है। रमेश बतरा की माएं और बच्चे सिमिर की हथकंडे कृष्णा अग्निहोत्री की मातम ऐसी ही रचनाएं है।
मशकूर जावेद ने अपनी रचना केबरे व इस लेखक की रचना हड़ताल में वाक्यों के अभाव और शब्दों के मोजेक वर्क से लघुकथा का कम्पोजीशन उभारा है। आयातित संस्कृति के खोखलेपन एवं सेक्स के व्यवसायीकरण को उजागर करने लूटमार सभ्यता की पथराई आत्मा - जो वस्तुओं में अपनी संतुष्टि खोजकर समूची मानव जाति से आंखे मूंद अपने जीवन की इतिश्री समझ लेते है- ऐसे कथ्य को इस शैली के माध्यम से सशक्त अभिव्यक्ति दी है ।
      गोल दायरा/लड़की/थिरकती हुई/लड़की/आरकेस्ट्रा/मेरी नजरें/लड़की/नाचती हुई/कपड़े/लड़की बिना कपड़े/लड़की/कपड़े/खोलती हुई/लड़की।
      लघुकथा में नरेटिव (विवरणात्मक) शैली का काफी प्रयोग हुआ है मगर इस शैली में लिखी गई रचनाएं अक्सर लचर पाई गई लोककथाओं में इस शैली का  विशेष उपयोग होता है। लेकिन लोककथाओं की  रोचकता एवं उत्सुकता तत्व ने  पाठकों पर अपनी पकड़ बनाए रखी   । जबकि विवरणात्मक लघुकथाओं ने  पाठकों पर अपनी पकड़ बनाने की क्षमता खो दी
      घटना और स्थितियों के स्थूल वर्णन का लघुकथा में स्थान नहीं होता ऐसे में सांकेतिकता और व्यंजनात्मकता के सहारे रचना की सृष्टि कर लेना लेखक के लिए उपलब्धि है । लेकिन कई बार इनके बिना भी सपाट बयानी में सशक्त अभिव्यक्ति देना रचनाकार के लिए संभव  है। जैसे प्रभासिंह की सत्याग्रही”” मोहन राजेश की परिष्कृत, व कृष्ण कमलेश की यकीन, आज की लघुकथा दुराव - छुपाव का अवसर न देकर पाठक के आमने सामने होती है और सड़ी गली व्यवस्था पर सीधे चोट करती है। ऐसी रचनाएं तीखे कथ्य और दो टूक भाषा की अपेक्षा करती है।
कथा तत्वों से विहीन होते हुए भी कुछ रचनाएं विचार के स्तर पर रूपायित होती है वे मात्र एक रचना प्रक्रिया होती है जो विवेक पूर्ण एवं स्थिति सापेक्ष होती है । इसमें ठोस कथा की जगह मात्र कथा सूत्र होते हैं। लेखक की टूल कछुए ऐसी ही विचार कथाएं है!
रूपक कथाओं में दो समान्तर कथाएं चलती हैं एक प्रत्यक्ष और दूसरी अप्रत्यक्ष (सूक्ष्म) जैसे डिसीप्लीन - पुरूषोत्तम चक्रवर्ती  प्रतिबंध - शंकुतला किरण, भूख - जगदीश कश्यप आदि
प्रतीकों का प्रयोग लघुकथा लेखन में काफी हुआ है। कईं रचनाएं  जो प्रतीकात्मक होती है वहां कथ्य के अमूर्तिकरण के कारण संप्रेषणीयता कुछ हद तक बाधित हो जाती है फिर भी लेखक कभी - कभी अपने कथ्य को प्रभावी बनाने में प्रतीक की विवशता महसूस करता है। आज के दर्दनाक यर्थाथ और उनसे जूझते इन्सानों के संघर्ष  पलायन और प्रतिक्रियाओं का लेखा- जोखा प्रस्तुत करने में प्रतीक बहुत सहायक होते है प्रतीकों के अभाव में ये रचनाएं अनावश्यक लम्बी होकर उबाऊ एवं प्रभावहीन हो जाएगी रमेश जैन की मकान ब्रजेश्वरमदान की मरे हुए पैर  अनिल चौरसिया की कालासूरज आदि।
फैंटेसी का प्रयोग अक्सर प्रतीकों के साथ होता है लेकिन लघुकथा अपने आंतरिक बुनावट में फैंटेसी का उपयोग करती है। अपनी विचित्र स्थितियों के बावजूद वे यथार्थ का अवलोकन है रमेश बतरा की खोया हुआ आदमी, भगीरथ की दोजख और जगदीश कश्यप की चादर।
जो सबसे ज्यादा प्रचलित रचना विधान दो विपरित परिस्थितियों को आमने - सामने कर देना, विरोधाभासों और विडम्बनाओं को कथा में उतार देना इस शैली कि सैकड़ों रचनाएं लघुकथा साहित्य में मिल जायेगी । यह शैली इतनी रूढ़ हो गई हैं कि अब उसका उपयोग कम ही होता है फिर नये लेखकों द्वारा इसका सार्थक प्रयोग होता है । सतीश दुबे की रचना संस्कार कमल चोपड़ा की जीव हिंसा आदि इस शैली अच्छी रचनाएं है।  [रचनाकाल १९८२के आसपास ]
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Tuesday, October 25, 2016

मै वारी जांवा

मै वारी जांवा
-सीमा जैन
शहर क्या, देश के नामी स्कूल की प्रिंसिपल हमारे घर आई। मेरी खुशी का ठिकाना ही नहीं था।
सोशल साइट पर किसी से मैं बात कर रही थी। फोन को एक तरफ पटका और मैडम जी से बात करने बैठ गई।
मैडम जी ने ही बात शुरू की-"क्या करती है आप रिया जी?"
-"जी, एक कम्पनी का एकाउंट्स देखती हूँ।"
-"फिर तो हिसाब की बहुत पक्की होगी आप!"
-"जी मैडम मैंने m.com. में टॉप किया था।"
-"मैंने तो आज देखा, आप लेखिका और कवयित्री भी हैं। कैसे कर लेती हैं ये सब?घर की जिम्मेदारी, काम के बाद कैसे समय निकाल लेती हैं?"
-"क्या करे मैडम, सब करना पड़ता है। अब हुनर है तो..."
-"आपकी कविता, कहानी कई पत्रिकाओं में प्रकाशित होती है। मैंने आज पहली बार आपके अकाउंट को देखा।"
-"अरे, पर आपने कोई कमेंट तो नहीं दिया !"
-"आज सालों बाद अपना अकाउंट खोला था। देखा, आपके तो मित्रों की भरमार है।कमेंट करना तो भूल गई आपके मित्रों की लम्बी लिस्ट देखकर।"
(बहुत अच्छा लगा ये सुनकर की मैडम ने मेरी हैसियत देखी । वो भी समझ गई होंगी कि मै कोई छोटी-मोटी नहीं, बड़ी लेखिका हूँ)
-"अब ये रोज़ का रिश्ता है मैडम, सबसे निभाना पड़ता है तो दोस्त बन ही जाते हैं।"
-"आपके हर दो दिन में बदलते प्रोफाइल फोटो को तो जबरदस्त लाइक मिलते हैं।कभी पेड़ के पीछे तो कभी झरने के नीचे; आप तो अपने बचपन की हो या परिवार की, हर खुशी और याद सबसे साझा करती हैं। यहाँ तक की भोग की थाली की फोटो लगाना भी नही भूलती हैं।"
(आज तो दिल कर रहा था अपने सारे कमेंट्स मैडम जी पर वार दूँ।)
खुशी को छुपाते हुए मैने कहा-"अब ये साइट भी हमारे परिवार जैसी ही हो जाती है।"
-"रिया जी, घर, नौकरी के बाद अपने हुनर को वक्त देना एक बात है और सोशल साइट के बगैर सांस भी न लेना दूसरी बात है। इस सब के बीच में बच्चों का भविष्य आता है, उसको सिर्फ लाइक नहीं उसपर कमेंट करना भी जरूरी है।"
(ये अचानक बात करते-करते मैडम जी का मूड़ क्यों बदल गया?)
-"रिया जी, आपने ये नहीं पूछा कि मै यहाँ आई क्यों? मैं यहाँ आपकी बेटी, जो सातवीं में मेरी बेटी की ही कक्षा में है, उसके बारे में बात करने आई हूँ।"
-"क्यों, क्या हो गया मेरी पारुल को? वो तो शहर के सबसे अच्छे स्कूल में पढ़ती है।"
-" स्कूल चाहे जैसा हो, आपकी जिम्मेदारी किसी भी हालात में कम नहीं हो सकती है! ये देखिये पारुल का वीडियो जो उसने मेरी बेटी को भेजा है। फ़र्क सिर्फ इतना ही है कि वो ये फोटो आपसे छुपाएगी और आप अपने फोटो...."
अब मैडम के हाथ से मैंने फोन छीन लिया और वीडियो देखकर मेरी आँखों से आँसू बहने लगे।अब मुझे मिलने वाले लाइक और आंसुओ में जंग शुरू हो गई।अकाउंट्स में टॉप करने वाली माँ, अब ये हिसाब ठीक से रख पायेगी क्या?
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Thursday, June 23, 2016

दो मुर्दे


 दो मुर्दे

 मालती बसंत

दो मुर्दे थे .पास –पास ही उनकी कब्रें थीं .एक नया आया था और दूसरे को आए चर पाँच दिन हो चुके थे .नये ने पुराने मुर्दे से पूछा –भाई ,यह जगह कैसी है ?तुमको कोई कष्ट तो नहीं है ?
नहीं ,इस जगह तो मौज ही मौज है ,कष्ट का नाम नहीं ,आबहवा भी  अच्छी है.
तब तो ठीक है .कहकर नये मुर्दे ने शांति की साँस ली .फिर अचानक उसने नया सवाल किया –तुम्हारे अलावा और कौन –कौन है यहाँ ?
हाँ ,है तो बहुत लोग पर अपनी उनसे पटती नहीं है .जैसे तुम आए हो ,वैसे ही कभी –कभी कोई न कोई आ जाता है .
वैसे तो मैं किसी से नहीं डरता ,पर वो एक जिन्दा आदमी है अब्दुल्ला नाम का .अरे वही जिसकी शहर में किराने की दुकान है ?
हाँ-हाँ ,  मैं उसे अच्छी तरह पहचानता हूँ .उसका तो खूब उधार खा कर मरा हूँ .मुझे भी उसी का डर लगता है .वह मर गया तो इसी कब्रिस्तान में आयेगा ,और फिर तकाजा करेगा ,तो अपना क्या होगा ?वो आ गया तो नींद हराम हो जायेगी .वो चैन से सोने नहीं देगा .
इस पर पहला हँस पड़ा .दोनों पक्के दोस्त बन गए .
रात बढ़ गई थी .चाँदनी रात थी .दोनों को नींद नहीं आ रही थी ,पुराने ने नये से कहा –चलो थोड़ा टहल आएँ .नये ने स्वीकृति दे दी .

घूमते – घूमते वे अचानक रुक गए .चार  जिन्दा आदमी एक मुर्दे को ला रहे थे .दोनों बहुत खुश हुए ,चलो एक साथी और आया .जैसे ही उन जिन्दा आदमियों ने उस मुर्दे के चेहरे से कफ़न उठाया ,दोनों ने उसकी सूरत देखी तो भाग खड़े हुए ,यह कहते-अरे रे मर गए यह अब्दुल्ला आ गया .वे शीघ्र अपनी कब्रों में छिप गए .उनकी आँखों में डर समाया  हुआ था .उनकी धडकने तेज हो गई थी .