Tuesday, October 25, 2016

मै वारी जांवा

मै वारी जांवा
-सीमा जैन
शहर क्या, देश के नामी स्कूल की प्रिंसिपल हमारे घर आई। मेरी खुशी का ठिकाना ही नहीं था।
सोशल साइट पर किसी से मैं बात कर रही थी। फोन को एक तरफ पटका और मैडम जी से बात करने बैठ गई।
मैडम जी ने ही बात शुरू की-"क्या करती है आप रिया जी?"
-"जी, एक कम्पनी का एकाउंट्स देखती हूँ।"
-"फिर तो हिसाब की बहुत पक्की होगी आप!"
-"जी मैडम मैंने m.com. में टॉप किया था।"
-"मैंने तो आज देखा, आप लेखिका और कवयित्री भी हैं। कैसे कर लेती हैं ये सब?घर की जिम्मेदारी, काम के बाद कैसे समय निकाल लेती हैं?"
-"क्या करे मैडम, सब करना पड़ता है। अब हुनर है तो..."
-"आपकी कविता, कहानी कई पत्रिकाओं में प्रकाशित होती है। मैंने आज पहली बार आपके अकाउंट को देखा।"
-"अरे, पर आपने कोई कमेंट तो नहीं दिया !"
-"आज सालों बाद अपना अकाउंट खोला था। देखा, आपके तो मित्रों की भरमार है।कमेंट करना तो भूल गई आपके मित्रों की लम्बी लिस्ट देखकर।"
(बहुत अच्छा लगा ये सुनकर की मैडम ने मेरी हैसियत देखी । वो भी समझ गई होंगी कि मै कोई छोटी-मोटी नहीं, बड़ी लेखिका हूँ)
-"अब ये रोज़ का रिश्ता है मैडम, सबसे निभाना पड़ता है तो दोस्त बन ही जाते हैं।"
-"आपके हर दो दिन में बदलते प्रोफाइल फोटो को तो जबरदस्त लाइक मिलते हैं।कभी पेड़ के पीछे तो कभी झरने के नीचे; आप तो अपने बचपन की हो या परिवार की, हर खुशी और याद सबसे साझा करती हैं। यहाँ तक की भोग की थाली की फोटो लगाना भी नही भूलती हैं।"
(आज तो दिल कर रहा था अपने सारे कमेंट्स मैडम जी पर वार दूँ।)
खुशी को छुपाते हुए मैने कहा-"अब ये साइट भी हमारे परिवार जैसी ही हो जाती है।"
-"रिया जी, घर, नौकरी के बाद अपने हुनर को वक्त देना एक बात है और सोशल साइट के बगैर सांस भी न लेना दूसरी बात है। इस सब के बीच में बच्चों का भविष्य आता है, उसको सिर्फ लाइक नहीं उसपर कमेंट करना भी जरूरी है।"
(ये अचानक बात करते-करते मैडम जी का मूड़ क्यों बदल गया?)
-"रिया जी, आपने ये नहीं पूछा कि मै यहाँ आई क्यों? मैं यहाँ आपकी बेटी, जो सातवीं में मेरी बेटी की ही कक्षा में है, उसके बारे में बात करने आई हूँ।"
-"क्यों, क्या हो गया मेरी पारुल को? वो तो शहर के सबसे अच्छे स्कूल में पढ़ती है।"
-" स्कूल चाहे जैसा हो, आपकी जिम्मेदारी किसी भी हालात में कम नहीं हो सकती है! ये देखिये पारुल का वीडियो जो उसने मेरी बेटी को भेजा है। फ़र्क सिर्फ इतना ही है कि वो ये फोटो आपसे छुपाएगी और आप अपने फोटो...."
अब मैडम के हाथ से मैंने फोन छीन लिया और वीडियो देखकर मेरी आँखों से आँसू बहने लगे।अब मुझे मिलने वाले लाइक और आंसुओ में जंग शुरू हो गई।अकाउंट्स में टॉप करने वाली माँ, अब ये हिसाब ठीक से रख पायेगी क्या?
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Thursday, June 23, 2016

दो मुर्दे


 दो मुर्दे

 मालती बसंत

दो मुर्दे थे .पास –पास ही उनकी कब्रें थीं .एक नया आया था और दूसरे को आए चर पाँच दिन हो चुके थे .नये ने पुराने मुर्दे से पूछा –भाई ,यह जगह कैसी है ?तुमको कोई कष्ट तो नहीं है ?
नहीं ,इस जगह तो मौज ही मौज है ,कष्ट का नाम नहीं ,आबहवा भी  अच्छी है.
तब तो ठीक है .कहकर नये मुर्दे ने शांति की साँस ली .फिर अचानक उसने नया सवाल किया –तुम्हारे अलावा और कौन –कौन है यहाँ ?
हाँ ,है तो बहुत लोग पर अपनी उनसे पटती नहीं है .जैसे तुम आए हो ,वैसे ही कभी –कभी कोई न कोई आ जाता है .
वैसे तो मैं किसी से नहीं डरता ,पर वो एक जिन्दा आदमी है अब्दुल्ला नाम का .अरे वही जिसकी शहर में किराने की दुकान है ?
हाँ-हाँ ,  मैं उसे अच्छी तरह पहचानता हूँ .उसका तो खूब उधार खा कर मरा हूँ .मुझे भी उसी का डर लगता है .वह मर गया तो इसी कब्रिस्तान में आयेगा ,और फिर तकाजा करेगा ,तो अपना क्या होगा ?वो आ गया तो नींद हराम हो जायेगी .वो चैन से सोने नहीं देगा .
इस पर पहला हँस पड़ा .दोनों पक्के दोस्त बन गए .
रात बढ़ गई थी .चाँदनी रात थी .दोनों को नींद नहीं आ रही थी ,पुराने ने नये से कहा –चलो थोड़ा टहल आएँ .नये ने स्वीकृति दे दी .

घूमते – घूमते वे अचानक रुक गए .चार  जिन्दा आदमी एक मुर्दे को ला रहे थे .दोनों बहुत खुश हुए ,चलो एक साथी और आया .जैसे ही उन जिन्दा आदमियों ने उस मुर्दे के चेहरे से कफ़न उठाया ,दोनों ने उसकी सूरत देखी तो भाग खड़े हुए ,यह कहते-अरे रे मर गए यह अब्दुल्ला आ गया .वे शीघ्र अपनी कब्रों में छिप गए .उनकी आँखों में डर समाया  हुआ था .उनकी धडकने तेज हो गई थी . 

Friday, March 4, 2016

ऊंचाइयां

ऊंचाइयां


कमल चोपडा



--यह असम्भव है

--मगर क्यों ?

--मेरे बापू कट्टर हिंदू हैं .वे अपनी लडकी का विवाह एक नीच जाति के लडके के साथ कभी नहीं

होने देंगे. वे कहते हैं.....मैं तेरे लिए कोई ऊंची जाति का लडका देखूंगा

--अगर तुम राजी हो तो मैं तुम्हारे बापू से बात करके देखूं  ?

--मैं तो राजी हूँ पर ...बापू ...यह असम्भव है

अपूर्व असीमा के बापू से मिला और बोला –बापू मैं चालीस बीघे जमीन का मालिक हूँ .इसके 

अतिरिक्त एक फैक्टरीहै और शहर में दो कोठियां हैं.मैं एम ए तक पढ़ा हूँ .मैं आपकी पुत्री से शादी 
...

--इतना साधन संपन्न लडका हमें मिल जाए तो मुझे और क्या चाहिए ?

--सोच लीजिए मैं नीची जाति का हूँ .

--ऊंच –नीच कहे की बेटा और फिर धन दौलत ही...मेरा मतलब तुमसे ऊंचा लडका हमें कहाँ 
मिलेगा ?

और वह अपनी निम्न वर्गीय झेंप मिटाने के लिए –हैं ..हैं ..हैं  करने लगे .
(हालात 1981)


Monday, December 21, 2015

आग्रह


सतीश राठी
सुनो ,माँ का पत्र आया है .बच्चों सहित घर बुलाया है ---कुछ दिनों के लिए घर हो आते है .बच्चों की
छुट्टियां भी है .पति ने कहा .
मैं नहीं जाऊँगी उस नरक में सड़ने के लिए .फिर तुम्हारा गाँव तो गन्दा है ही ,तुम्हारे गाँव के और घर
के लोग कितने गंदे है !पत्नी ने तीखे और चिडचिडे स्वर में प्रत्युतर दिया .
मगर तुम पूरी बात तो सुनो .पति कुछ हिसाब लगाते हुए बोले ,माँ ने लिखा है कि बहू आ
जायगी तो बहू को गले की चेन बनवाने की इच्छा है.इस बार फसल भी अच्छी है .
अब आप कह रहे हैं और मान का इतना आग्रह है तो चलिए ,मिल आते हैं और हाँ –फसल

अच्छी है तो मांजी से कहकर दो बोर गेहूं भी लेते आएँगे . पत्नी ने उल्लास के स्वर में कहा . 

Thursday, November 19, 2015

हराम का खाना














श्याम बिहारी श्यामल

चमरू की नवोढ़ा पतोहू गोइठे की टोकरी माथे पर लिए सामने वाली सड़क से जा  रही थी.रघु बाबू ने पत्नी से कहा –देखो मैंने कहा था न कि गरीबों की बहुओं को कोई क्या देखने जायगा !        वह तो दो चार दिनों में गोइठा चुनने ,पानी भरने के लिए निकलेगी ही .                     यह बात चमरू की पतोहू ने सुन ली .बात उसे लग गयी .                               
-हाँ बाबूजी ,हम लोग कोई हराम का तो खाती नहीं हैं कि महावर लगाकर घर में बैठी रहूँगी .काम  करने पर ही पेट भरेगा . चमरू की पतोहू ने रघु बाबू को सुनाकर कहा और पूरे विश्वास के साथ आगे बढ़ गई .                                                         
रघु बाबु सिठियाये से उसे जाते देखते रह गए .

Monday, September 7, 2015

ये पत्र ,ये लोग

ये पत्र ,ये लोग 

शशांक  आदर्श 


राधेश्याम के परलोक सिधारने के दो घंटे बाद उनके प्रिय भतीजे ने शोक विह्वल होकर दो पत्र लिखे ,पहला पत्र स्नेही जनों के नाम था -
"बंधु ,अत्यन्त दुख के साथ लिखना पड़ रहा है कि चाचाजी का देहावसान  हो गया है। हाय !अब मुझ अनाथ को कौन सहारा देगा। "
 तथा दूसरा पत्र अपनी प्रियतमा के नाम - "प्रिये ,चलो बुड्ढ़ा खिसका ,भगवान को लाख लाख शुक्रिया। जायदाद मेरे नाम हो गई है ,अब हम
शीघ्र ही शादी करने का विचार ले सकते है। "

Saturday, July 11, 2015

इज्जत

इज्जत
अंजना अनिल
खजानो बड़ी हडबडी में एक गठरी सी लेकर आँगन में आयी तो बेटे ने पूछ लिया –कहाँ जा रही हो माँ ? -कहीं नहीं ,तू यहीं बैठ .खजानो ने गठरी छुपा लेने की कोशिश करते हुए कहा –मैं अभी आती हूँ .—यह तुम्हारे हाथ में क्या है ?
-कुछ नहीं ....कुछ भी तो नहीं ! कहती खजानो चोर की तरह बाहर निकल गई .
गठरी में खजानो की दो पुरानी सलवारें और एक साडी थी .गली में आकर वह पड़ोस के मकानको घूर कर बुदबुदाने लगी ,--कमबख्त ! पता नहीं अपने आप को क्या समझते हैं ..हम गरीब सही पर किसी से मांग कर तो नहीं खाते ...कटोरी लेते हैं तो कटोरी दे भी देते हैं ...अपना ओढते है ...अपना पहनते हैं ..फिर भी इनकी नजर हम पर लगी रहती है ...मर तो नहीं गए हम ..अभी हिम्मत बाकी है .
दोपहर को खजानो अपने लापता पति को खोज खबर लेकर निराश सी वापस आ रही थी तो घर पहुंचते पहुंचते सोचा कि पड़ोसन से थोडा आटा मांग ले ताकि बेटे को तो कम से कम खिला पिला दे .परन्तु वह पड़ोसन कि दहलीज पर ही ठिठक गई .वो अपनी बर्तन मांजने वाली से कह रही थी –खजानो के घर को जानती हो,चार दिन से अंगीठी नहीं जली.
यह सच था मगर खजानो तिलमिला गयी थी .
वापिस आकर खजानो ने आखिर अंगीठी जला कर दहलीज पर रख ही दी .रसोई में पड़े टीन कनस्तर खाली भन भनारहे थे ...पर  अंगीठी थी कि पूरी तरह भभक रही थी .ऐसे में बेटे से रहा नहीं गया ,बोला –माँ पिताजी का कोई पता ठिकाना नहीं ..घर में कहीं अन्न का दाना नहीं दिखाई दे रहा ,तुझे फिक्र है क्या  ? बता अंगीठी पर क्या धरेगी ?
--बेवकूफ ! तमाचा जड़दिया खजानो ने उसके गाल पर .
--धीरे बोल ...इज्जत के लिए सब कुछ करना पडता है!


Tuesday, June 16, 2015

काला सूरज



काला सूरज

अनिल चौरसिया
-मैं सूरज हूँ .उन्होंने कहा .
कल्लू ने सोचा ,मुझे क्या एतराज हो सकता है .
नहीं शायद उसने कुछ नहीं सोचा. फालतू लफड़े में कौन पड़े ? उसे तो बस काम करना है .काम करता रहा .
अचानक उसे बीमारी ने आ घेरा .अजीब सी बीमारी –जबान को लकवा मार गया .उसने हिम्मत नहीं हारी .जबान का काम आँखों से लेना चाहा .आँखों की भाषा सुनना किसी के बस की बात नहीं .उन्होंने जब देखा कि अदना सा कल्लू दु:साहस करके जबान कि बजाय आँखों से बोलने कि कोशिश कर रहा है तो गुस्से में आकर उसकी आँखों कि रोशनी भी छीन ली .
कल्लू प्रसन्न था –अब केवल सुन सकता था .केवल सुनने वाले को हर कोई पसंद करता है ,पत्नी भी !उसने फिर सुना,कोई कह रहा था –मैं सूरज हूँ !
उसने देखना चाहा ,आँखों में कालापन  था .कहीं सूरज काला तो नहीं हो गया –शायद !
छोटी- बड़ी बातें संपादक महावीर प्रसाद जैन /जगदीश कश्यप (१९७९ )

Saturday, May 23, 2015

आठवें दशक की लघुकथाएँ

पहचान  
लक्ष्मेंद्र चोपड़ा
अंतिम यात्रा की तैयारियां हो रही थी। पूरा परिवार बहुत दुखी था। उसका दुःख देखकर तो अनजान भी दुखी हो जाता। वह जार जार रो रहा था ,
उसके जीवन का सब कुछ चला गया था। अपना होश हवास तक नहीं था उसे।
'चलो अंतिम दर्शन कर लो 'परिवार के बूढ़े पुरोहित ने अंतिम दर्शन की रस्में शुरू कर दी। पुरोहित श्लोक पढता जाता ;समझाता 'दुखी मत हो ,
बेटा पांव छू लो और हट जाओ.'आखिर वह भी दुःख से टूटा बेहोश सा आया। उसकी रुलाई थम नहीं रही थी।
पुरोहित की समझाइश सुनते ही चौंका ,सीधा तन के खड़ा हो गया,कड़क कर बोला -; बक रहे हैं पंडितजी मैं और इसके पाँव छूऊँगा अपनी
बीबी के ---आपका दिमाग तो ठीक है ?'  



(आठवें दशक की लघुकथाएँ संपादक सतीश दुबे प्रकाशन वर्ष 1979 )

Monday, February 9, 2015

·                     उसकी मौत
·                     मधुदीप
·                      
·                     लाल चौक के दायीं ओर दुकन के सामने बरामदेमें एक लाश पडी थी  आते- जाते लोग दो पल को कौतूहलवश वहां ठहर रहे थे।
·                     ;क्या हुआ   कैसे हुआ    पूछने पर  कोई स्थल दर्शक अपनी आवाज में दर्द घोलता है -राह चलते इस व्यक्ति को हार्ट अटैक हुआ।
·                     कोई कुछ करे इससे पहले ही इअसने यहां दम तोड दिया।
·                     ्काफ़ी समय बीत रहा है । एक विलाप करती हुई भीड लाश के चारों ओर एकत्रित होती जा रही है। छाती पीटकर विलापनेवाले
·                     लाश के निकट जोर-जोर से रोनेवाले,उनके पीछे और उदास चेहरा लटकाए अन्त में ! एक चक्रव्यूह-सा बनता जारहा है।
·                     शायद यह मृतक की पत्नी है जो छाती पीटती हुई विलाप कर रही है -हाय रे ! अब इन कच्ची कोंपलों को कौन सभालेगा  !
·                     निकट ही मृतक का बीस वर्षीय लडका मुंह लटकाए सोच रहा है -डैडी जिन्दा रहते तो अगले वर्ष उसकी बी ए पूरी हो जाती।
·                     अब न जाने---"
·                     छोटा लडका उदासी में डूब रहा है -पापा ने वायदा किया था कि इस वर्ष पास होने पर वे उसे साईकल ला देंगे मगर अब--'
·                        दूर उस कोने में खडा वह व्यक्ति जो मृतक को घूरते  हुए पहचानने का प्रयास कर रहा है ,चाय वाला है ।उसके मन में झल्लाहट
·                     उभर रही है-साला ! बाप की दुकान स्मझ कर रोज चाय डबल रोटी खाता था। बीस रुपये है पूरे     क्या अब इसकी मिट्टी से वसूल
·                     करूं ।
·                     सब अपने अपने में उलझे हुए है । शाम करीब आती जा रही है । मुर्दा चीख रहा है कि कोई उसे उठाकर श्मशान तक ले जाने

·                     की भी तो सोचे !

Monday, October 20, 2014

आठवे दशक की लघुकथाए,

शीशा 

रमेश बत्तरा 

'सुनो कल रात मैंने स्वप्न में देखा की एक पर्स लेकर बाजार में घूम रही हूँ। '
'कल तुम शॉपिंग पर नहीं जा पायी थी न !'
'तुम्हीं ने तो रोक लिया था। '
'बस यही बात तुम्हारे मन में रह गई और तुम्हारा अवचेतन मन तुम्हें शॉपिंग पर ले गया। '
'पर,एक बात समझ नहीं आई की मैं नग्न ही क्यों घूम रही थी ?'
'क्या----कह ---रही  हो !'
'हाँ मैंने देखा कि मैं निर्वस्त्र हूँ और लोग मुझे घूर रहे हैं। '
'ओह -हो !तब तो तुम्हें बहुत शर्म आयी होगी ?'
'सच्च ,बहुत शर्म आयी। मेरा पर्स इतना गन्दा और फटा पुराना था जैसे कूड़े में से उठा कर लाया गया हो '
इससे पहले कि सामनेवाला उसका मुँह ताकता हुआ कुछ कह पाता उसने फैसला दिया की आज की शॉपिंग में
वह एक नया पर्स भी जरूर खरीदेगी। 

Thursday, September 25, 2014

हमका नहीं पढ़ाना

हमका नहीं पढ़ाना 

चंद्रभूषण सिंह 

पूरी की पूरी दुनिया बदल गयी ,परन्तु वह शिक्षक नहीं बदला। जब उसे ज्ञात्त हुआ कि भोलाराम के बेटे राजेंद्र ने एक सप्ताह से विद्यालय आना
छोड़ दिया है ,तो एक दिन वह उसके घर पहुँच गया। जब शिक्षक ने भोलाराम से राजेन्द्र की  अनुपस्थिति  के बारे में पूछा तो भोलाराम ने तपाक
से कहा ,--हमका रजिन्दरा को अब नहीं पढ़ाना।
"भाई कुछ कारण तो होगा  ?"
"आप रजिन्दरा को एक हफ्ता पहले मारा  ?"
वह शिक्षक याद करने लगा। कुछ मिनटों के बाद उसने बतलाया कि उसने राजेन्द्र को ताड़ी पीने के लिए पीटा था
इतना सुनना था कि भोलाराम भड़क उठा ,"इ ताड़ी नहीं पीयेगा ,तो दूध पीयेगा ?घी खायेगा ? मास्टर साहेब  इ पासी का बेटा है ,ताड़ी
उतारना ,ताड़ी बेचना और ताड़ी पीना त इसका कमबे है"
"भोलाराम इस गंदी आदत से बच्चे बचे रहें तो अच्छा है। "
इसके उत्तर में भोलाराम ने जो कहा उसेसुनकर  शिक्षक चुपचाप लौट आए।
"आप इस्कूल में पढ़ाने आया है कि हमका रोजी बिगारने। आप  रजिन्दरा को नौकरी दे सकता है।
(तत्पश्चात   )

Monday, June 30, 2014

बिन तले के जूते

बिन तले के जूते

सुखबीर विश्वकर्मा

हमेशा से यही होता था गांव में कभी कोई मौत होती या खुशी का मौका होता तो
उन्हें जरूर बुलाया जाता वह खुद न जाकर चमरौंधे जूतों का एक जोडा भेज देते
जो उनके शामिल होने का प्रतीक था

वे सैकडों बीघा जमीन के मालिक थे। गांव का एक हिस्सा उनकी जमीन जोत-बो कर
पलता था।उनकी किलेनुमा आलीशान हवेली में हर वक्त मोटे-तगडे नौकर मौजूद रहते।
भला किसमें हिम्मत थी कि उनकी हरकत के खिलाफ़ मुंह खोल सकता।

अचानक एक दिन उनकी मां मर गई।परम्परा के मुताबिक गांव में खबर पहुंचा दी गयी
कि हरेक घर से एक-एक आदमी को शवयात्रा में शामिल होना है। जबाब मिला आयेंगे

अर्थी बनकर तैयार हो गई लेकिन एक भी आदमी वहां नहीं पहुंचा । वे हैरान थे।
झल्लाकर वे नौकरों पर बरसने लगे।

तभी दो बैलगाडियां हवेली की तरफ़ आती दिखाई पडी । वे चादरों से ढकी थी । पास
आने पर उन्होंने गाडीवालों से पूछा,"लोग कहां है ? और ये क्या तमाशा है ?

गाडीवान बगैर कुछ कहे वापस लौट गये ।इधर उन्होंने आगे बढकर बैलग़ाडियों पर से
चादरें हटायी ।वह ठगे रह गये । ग़ाडियों में बिन तलों के वही जूते भरे थे जो उन्होंने
समय-समय पर गांव वालों के यहां भिजवाये थे ।

("तनीहुई मुट्ठियां" सम्पादक मधुदीप/ मधुकांत     1980)

Wednesday, May 21, 2014

बहू का सवाल

बहू का सवाल

बलराम


रम्मू काका काफ़ी रात गये घर लौटे तो काकी ने जरा तेज आवाज पूछा---कहां च्लेगे रहन तुमका घर केरि तनकब चिंता फिकिर नांइ रहित हय। कोट की जेब से हाथ
निकालते हुए रम्मू काका ने विलम्ब का कारण बताया।
--जरा ज्योतिषीजी के घर लग चलेगे रहन ।बहू के बारे मा।म पूछय का रहय
रम्मू काका क जबाब सुनकर सूरजमुखी के मानिंद काकी का चेहरा खिल उठा, आशा भरे स्वर में जिज्ञासा प्रकट की
---का बताओ हइन
चारपाई पर बैठते हुए रम्मू काका ने कम्पुआइन भाभी को भी अपने पास बुला लिया और धीरज से समझाते हुए बताया
----शादी के बाद आठ साल लग तुम्हारी कोखि पर शनिचर देवता क्यार असर रहो,ज्योतिषीजी बतावत रहेय। हवन पूजन
किराय कय उइ शनिचर देवता की शान्ति करि दयाहंय। तुम्हंया तब आठ सन्तानन क्यार जोगु हयऽगले मंगल का हवन पूजन होई
ज्योतिषीजी ते हम कहि आये हन ।रम्मु काका एक ही सांस में सारी बात कह गये।
कम्पुआइन भाभी और भइया चर दिन की छुट्टी पर कानपुर से गांव आये थे और सोमवार को उन्हें कानपुर पहुंच जाना था। रम्मू काका
की बात काटते हुए कम्पुआइन भाभी ने कहा।
--हमने बडे-बडे डाक्टरों से चेकाप करवाया है और मैं कभी भी मां नहीं बन सकूंगी।
कम्पुआइन भाभी का यह जबाब सुनकर रम्मू काका सकते में आगये और अपेक्षाकृत तेज आवाज में बोले---
तब्फिरि इसे साल बबुआ केरि दूसरि शादी करि देवे अवहिन ओखेरि उमर का हय तीसय बत्तीस बरसक्यार तव हय
रम्मू काका की यह बात सुनते ही भाभी को क्रोध आ गया तो उन्होंने सही बात उगल दी।
---कमी मेरी कोख में नहीं ,आपके बबुआ के शरीर में है। मैं मां बन सकती हूं पर वे बाप नहीं बन सकते और बोलो।

Tuesday, February 18, 2014


अदला-बदली
मालती महावर
-क्या आप मुझे गोद लेना पसंद करेंगे ?
यह सुन्कर उस हरिजन व्यक्ति ने सिर से पैर तक उस नवयुवक को देखा,जिसका यह सवाल था।
-मुझे इसकी क्या आवश्यकता ?मेरा लडका भी तुम्हारी उमर का है
-नहीं,मेरा मतलब है आप मुझे सिर्फ़ सरकारी कागजों पर अपना लडका बना लें।मैं ब्राह्मण जाति का हूं,लेकिन मेरे पिता की पेंशन होने से मुझे आगे पढाने में असमर्थ है,आपका लडका बनने से मुझे हरिजन स्कालरशिप मिल जायेगी।
-मेरा लडका भी कालिज में ऊंची जाति के लडकों के साथ पढने के कारण हीन भावना से ग्रस्त हो गया है ,अक्सर अपने को कोसता है कि इस जाति में जन्म क्यों लिया! ऐसे जीवन से तो मर जाना अच्छा। तुम अपने पिताजी से
पूछकर आओ कि क्या वे मेरे लडके को गोद ले लेंगे?