Thursday, June 23, 2016

दो मुर्दे


 दो मुर्दे

 मालती बसंत

दो मुर्दे थे .पास –पास ही उनकी कब्रें थीं .एक नया आया था और दूसरे को आए चर पाँच दिन हो चुके थे .नये ने पुराने मुर्दे से पूछा –भाई ,यह जगह कैसी है ?तुमको कोई कष्ट तो नहीं है ?
नहीं ,इस जगह तो मौज ही मौज है ,कष्ट का नाम नहीं ,आबहवा भी  अच्छी है.
तब तो ठीक है .कहकर नये मुर्दे ने शांति की साँस ली .फिर अचानक उसने नया सवाल किया –तुम्हारे अलावा और कौन –कौन है यहाँ ?
हाँ ,है तो बहुत लोग पर अपनी उनसे पटती नहीं है .जैसे तुम आए हो ,वैसे ही कभी –कभी कोई न कोई आ जाता है .
वैसे तो मैं किसी से नहीं डरता ,पर वो एक जिन्दा आदमी है अब्दुल्ला नाम का .अरे वही जिसकी शहर में किराने की दुकान है ?
हाँ-हाँ ,  मैं उसे अच्छी तरह पहचानता हूँ .उसका तो खूब उधार खा कर मरा हूँ .मुझे भी उसी का डर लगता है .वह मर गया तो इसी कब्रिस्तान में आयेगा ,और फिर तकाजा करेगा ,तो अपना क्या होगा ?वो आ गया तो नींद हराम हो जायेगी .वो चैन से सोने नहीं देगा .
इस पर पहला हँस पड़ा .दोनों पक्के दोस्त बन गए .
रात बढ़ गई थी .चाँदनी रात थी .दोनों को नींद नहीं आ रही थी ,पुराने ने नये से कहा –चलो थोड़ा टहल आएँ .नये ने स्वीकृति दे दी .

घूमते – घूमते वे अचानक रुक गए .चार  जिन्दा आदमी एक मुर्दे को ला रहे थे .दोनों बहुत खुश हुए ,चलो एक साथी और आया .जैसे ही उन जिन्दा आदमियों ने उस मुर्दे के चेहरे से कफ़न उठाया ,दोनों ने उसकी सूरत देखी तो भाग खड़े हुए ,यह कहते-अरे रे मर गए यह अब्दुल्ला आ गया .वे शीघ्र अपनी कब्रों में छिप गए .उनकी आँखों में डर समाया  हुआ था .उनकी धडकने तेज हो गई थी . 

4 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (25-06-2016) को "इलज़ाम के पत्थर" (चर्चा अंक-2384) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

सु-मन (Suman Kapoor) said...

बहुत बढ़िया

सीमा जैन said...

बहुत सुंदर कथा!

GST Refunds Delhi said...

What you're saying is completely true. I know that everybody must say the same thing, but I just think that you put it in a way that everyone can understand. I'm sure you'll reach so many people with what you've got to say.