Friday, September 9, 2011

मानसिक व्यभिचार

 अन्तरा करवड़े



अपने अकाउंट से लॉग आउट होते हुए रीटा पसीना पसीना होने लगी। कौन हो सकता है ये परफेक्ट गाय? उसकी कुछ बातों पर ही¸ आवाज के अंदाज पर ही उसे अपना मान बैठा है। कुछ क्षणों के लिये उसके मस्तिष्क में नीली सपनीली आँखों वाला एक गोरा चिट्‌टा¸ गठीला युवक अलग - अलग कोणों से आता - जाता रहा। अनजाने ही रीटा के चेहरे पर मुस्कान आती रही।

और फिर अचानक वो परफेक्ट गाय¸ अभिषेक में बदल गया। अभिषेक¸ उसका मंगेतर!

अपने मन में विचारों का तूफान लिये वह घर पहुँची। अपने कमरे की शरण ली। अभिषेक¸ उसका मंगेतर¸ दूसरे शहर में नौकरी करता है। ऑफिस में काम करते वक्त ऑनलाईन रहता है। रीटा उसी से वॉईस चैट करने के लिये कैफे गई थी। उसके लिये अभिषेक ने मैंसेज छोड़ रखा था। वह एक घण्टे के लिये मीटींग में व्यस्त था और ऑनलाईन होते हुए भी उससे संपर्क नहीं कर सकता था।

तभी रीटा के मैंसेंजर पर एक अनजान संदेश उभरा।

"हैलो स्वीटी!"

यही था परफेक्ट गाय! रीटा का लॉगिन नेम था स्वीट सॅन्योरीटा।और फिर थोड़ी बहुत पूछ ताछ के बाद उसने रीटा को वॉईस चैट के लिये राजी कर लिया। उसकी बातचीत¸ आवाज¸ लहजे की तारीफें करता हुआ वह दस मिनट में ही दिल¸ ईश्क¸ प्यार¸ मुहब्बत तक पहुँचते हुए उसे प्रेम प्रस्ताव देने पर उतर आया।

बिना देखे सोचे उत्पन्न हुए इस प्रेमी के लिये रीटा तैयार नहीं थी। कई बार उसने लॉगआऊट होने का सोचा लेकिन सहेली मोना क वाक्य याद आने लगे। "यदि कोई पीछे पड़ा ही है तो थोड़े बहुत मजे ले लेने में क्या हर्ज है?" और रीटा बह चली थी। उस वक्त उसके मन से अभिषेक जाने कहाँ गायब हो गया था। लेकिन जब यह परफेक्ट गाय उसका शहर¸ नाम¸ पता¸ फोन नंबर पूछकर घर आने की जिद पर अड़ गया तब रीटा को होश आया। ये क्या कर रही थी वो?

किसी तरीके से बहाने बाजी करते हुए उससे छुटकारा पाया और अब अपने कमरे में बुत सी बनी बैठी थी।


उसी समय घर के सामने से जय जयकार की आवाजों के साथ ही एक स्वामीजी की पालकी निकालने लगी। रीटा ने ध्यान से देखा। ये वही स्वामीजी थे जो कहने को तो ब्रम्हचारी थे लेकिन सदा औरतों की ओर ही ध्यान लगाए रखते। कॉलेज के दिनों में इनके कितने ही किस्से मशहूर थे।

इन्हीं किस्सों को सुनते सुनाते एक दिन रीटा की माँ के मुँह से निकाला था¸ "सब कुछ मन¸ वचन¸ कर्म से हो तो ठीक है। फिर चाहे ब्रम्हचर्य हो या गृहस्थी।"

रीटा का मन उसे अपराधी की भाँति कटघरे में खड़ा कर रहा था। वो स्वयं क्या कर रही थी?

भले ही अभिषेक को कभी कुछ मालूम नहीं होगा... लेकिन मन में बात तो आई ना?

दूसरे ही दिन उसने अभिषेक को मेल किया। "मैंने अपना लॉगिन नेम "स्वीटसैन्योरीटा" से बदलकर "रीटाअभिषेक" कर लिया है।"


गद्यकोश से साभार

4 comments:

Pallavi said...

अच्छी कहानी है, लेकिन यदि उसके मन में बात आ ही गई थी। तो उसे अपना ID बदलने के बदले अभिषेक को सच बता देना चाहिए था। ऐसा मुझे लगता है। खैर कभी समय मिले तो आयेगा मेरे पोस्ट पर आपका स्वागत है।
http://mhare-anubhav.blogspot.com/

रवि कुमार, रावतभाटा said...

बेहतर...

anita agarwal said...

manav mun ke bhatkav yu bhi hote hain...ek achhi kahani...badhai...
kabhi mere blog per bhi ayein, achha lagega.

प्रदीप कांत said...

आत्म मंथन या आत्म ग्लानि
जो भी हो संस्कार बाकी हैं


अच्छी लघुकथा है