Monday, July 7, 2008

रामभरोसे



बलराम अग्रवाल

"इका गजब क'अत है।" बेकाबू होते जा रहे रामभरोसे के हाथों से कुल्हाड़ी छीनने का प्रयास करता रामआसरे गिड़गिड़ाया-- " पंडित क मारि कै परलोक न बिगाड़ ।"
"महापंडित रावण को मारने पर राम का परलोक नहीं बिगड़ा …।"
ऊँची आवाज में रामभरोसे चिल्लाया - " तब इस महामूरख को मारने से मेरा परलोक क्यों बिगड़ेगा-अं। "
"उ तो राजा रहे बिटवा - कानून बनान वारे । "
"जिस पंडित ने बहना को छुआ है काका …अपनी बिरादरी के सामने आज वह चमार बनेगा - या परलोक जाएगा ।"
खून उतरी आँखो वाले रामभरोसे काका को झटका देकर एक बार फिर बाहर निकल जाने की कोशिश की तो घर की औरतो और बच्चों के बीच कुहराम कुछ और तेज हो गया ।
"जन्मते ही मर काहे न गई करमजली ।" रामभरोसे की माँ ने अन्दर अपनी बेटी को पीटना - कोसना शुरु कर दिया - "पंडित मरि गवा तो ब्रह्महत्या अलग , बदनामी अलग्…फाँसी अलग ।"
क्रोधित रामभरोसे के हाथो पंडित की सम्भावित हत्या के परिणाम की कल्पना मात्र से रामआसरे टूट - सा गया ।
"कुल्हाडी फेंक द बिटवा!'' वह फूट पडा -"पंडित क मारे का पाप मत लै। उ अपनी ही बेटी क हाथ पकडा है । तोहार बहना तोहार माँ के साथ उ के अत्याचार का ही फल है भैया । उक नरक जरुर मिलि है । "
' नरक ! ' कुल्हाडी पर रामभरोसे की पकड कुछ और मजबूत हो गई। यह पंडित आज के बाद इस धरती पर् साँस नहीं लेगा - उसने निश्चय किया… और आज ही बिरादरी को वह सुना देगा कि आगे से कोई भी अपने बच्चे क नाम रामभरोसे या रामआसरे न रखे ।

7 comments:

रूपसिंह चन्देल said...

भाई भगीरथ जी,

ज्ञासिन्धु देखा. रचनाएं पढ़ीं. आपने वातायन का लिंक दिया है. आभार. यदि रचनासमय का भी दे दें तो अच्छा रहेगा. लिंक है : wwwrachanasamay.blogspot.com

मैं अपने ब्लॉग्स में आपके ब्लॉग का लिंक जोड़ दूंगा.

चन्देल

सुभाष नीरव said...

भाई भगीरथ जी, आपका ब्लाग देखकर मन प्रसन्न हो गया। वाह ! देर से ही सही पर बहुत सुन्दर ब्लाग बनाया है आपने। अभी तक जो लघुकथाएं आपने दी हैं, वे आपके चयन की दाद देने वाली हैं। अच्छा किया आपने कि "ज्ञानसिंधु" को लघुकथा की ब्लाग पत्रिका का टाइटिल न देकर समकालीन साहित्य और संस्कृति का गुलदस्ता कहा। इस गुलदस्ते में साहित्य और संस्कृति के
भिन्न-भिन्न पुष्प खिलाते रहें। मेरी शुभकामनाएं।

और हाँ, टिप्पणी वाले फार्म में जाकर इस वर्ड वैरीफिकेशन की बंदिश को समाप्त करें। इससे कोई लाभ नहीं हैं। इससे उल्टा टिप्पणी देने वाला उकता जाता है। मैंने तो अपने सभी ब्लाग्स पर से इसे हटा दिया है। आप भी हटा दें।

अपने ब्लाग्स पर "ज्ञानसिंधु" का लिंक जल्द दूँगा।

छत्तीसगढिया .. Sanjeeva Tiwari said...

हिन्‍दी ब्‍लाग जगत के लिए यह एक सौगात है ।


आभार ।

Amit K. Sagar said...

अति सुंदर. लिखते रहिये.
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उल्टा तीर

रश्मि प्रभा said...

शानदार सन्देश,
बहुत ही बढिया लिखा है आपने

Vijendra S. Vij said...

Ghyan ji..bahut hi sunder laghu katha lagee..umda lekhan hai aapka.
jaari rakhen.

राजेश अग्रवाल said...

सचमुच प्रभावकारी रचनाओं का गुलदस्ता बनता जा रहा है आपका यह ब्लाग.