Saturday, October 6, 2012

आठवे दशक की लघुकथाए

 भूख
जगदीश चन्द्र कश्यप

वह पूरी शक्ति से भाग रहा था। जब वह रूका तो उसनेअपने को किसी बड़े नगर में पाया। कई बार रो पड़ने के बावजूद किसी ने भी उसे अपने पवित्र घर में घुसने नहीं दिया था। अब वह गांव की ओर दौड़ रहा था।
डसे अच्छी तरह से मालूम था कि पीछा करने वाली डायन उसके मां बाप को भी निगल गयी थी । पूरी की पूरी जिंदगी उसने इस डायन की कैद से छुटकारा पाने में बरबाद कर दी। किसी तरह वह एक रात को चुपचाप भाग निकला था।
ये बुढढा भी वर्षो पहले चंगुल से निकल भागा था। एक हफते तक मैनें इसे खाट से उठने नहीं दिया।
उसके यह सोचते ही कि वह तीन दिन से भूखा है- उसके पेट में कुछ ऐठन सी हुई । फिर भी वह मुड़ भागा। वह मुस्कराती रही ।
जैसे ही वह एक मोड़ पर रूका । वह सामने खड़ी थी। तुरंत ही उसने ढेर सा खून उगला और उसके कदमों में गिर पड़ा।

 
 


वह सुखी था
कृष्ण कमलेश

वह बहुत सुखी था। उसके पास सबकुछ था। बूढ़ी मां, गुडलुकिंग बीवी-जिसके दांत थोड़े बढ़े हुए जरूर थे लेकिन वह उसके सौंदर्य में वृद्धि  ही करते , एक अदद नौकर भीं वह पिछले दो साल से बहुत सुखी था, क्योंकि उसे शादी किये हुए इतना ही अरसा गुजरा था और वे दोनों परिवार बढ़ाओं आंदोलन के हामी नहीं थे। अभी दो तीन साल और इरादा नहीं था उनका । हालांकि नाम उन्होंने पहले से ही सोच रखे थे। अनुराग या अनिवता । लेकिन । बहुत कम लोग उनके यहां आते जाते । हां कोल बैल जरूर उसने अपनी बीवी के कहने से लगवा ली थी। गजर कोंल बेल। तबियत में आती, बजती। वायरिंग ठीक -ठाक थी, लेकिन ...।
उसे दहेज में एक ट्रांजिस्टर मिला था । जब मन में आता बजता या महीनों चुप रहता । उसने बड़े -बड़े इलेक्ट्रिशियनस बुलाए , लेकिन—।
उसकी बीवी ने उसकी पिछली सालगिरह पर सिगरेट कम लाइटर प्रजेन्ट  किया था, पेट्रोल से जला था बस पहलीवार और अब छठे छिमाहे सिगरेट सुलगा लेता है।
उसकी मम्मी कभी उस पर अतिशय ममत्व प्रकट करती तो कभी आक्रोश । पिछले अठारह बरसों में वह अपनी मम्मी को समझ नहीं पाया था।
और उसकी बीवी कभी केफे में, कभी बारात में कभी स्नानगृह में तो कभी कार में ही जिद करती । उसे अपना बीवीपना जाहिर करने का ऐसी ही जगहों पर मौका मिलता और उसके लिए समपंग ठुकरा पाना मुश्किल हो जाता, बल्कि नामूमकिन भी।
हां -वह सचमुच बहुत सुखी था।

2 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (07-10-2012) के चर्चा मंच पर भी की गई है!
सूचनार्थ!

Manu Tyagi said...

उम्दा प्रस्तुति