Friday, January 11, 2013


सत्याग्रही 
प्रभासिंह
वे सत्याग्रह करने आई   थी। भुखमरी, बेरोजगारी, पिछड़ापन दूर करने और शिक्षा व्यवस्था को नया मोड़ देने के लिए।
वे राजनीति नहीं समझती थीं फिर इन सारी समस्याओं से ग्रस्त थी। जाड़े की हडडी कंपा देने वाली सर्द रातों के लिए , एक कम्बल तक उनके पास नहीं था। और शरीर पर चिथड़े ही चिथड़े थे।
दल की ओर से सत्याग्रह और फिर गिरफता्री में, महिलाओं का नाम आ जाने से सत्याग्रह का रिकार्ड कायम हो जाता । बस इसी आधार पर वे सत्याग्रही दल के नेताओं द्धारा फुसलाकर लाई गई थी।
तीन दिनों के निरंतर प्रयास के बाद भी वे जेल नहीं ले जाई गई तो नेताओं के लिए वे बेकार साबित होने लगी और वे लोग उन्हें टरका देने के उपाय सोचने लगे।
चौथे दिन दल के नेताओं ने सुबह में कार्यालय खाली पाया। वे चली गई थी पर कार्यकर्ताओं के धोती, लौटा और कुछ कम्बलों के साथ ही।
वे अपने अभियान में सफल रही थी, जबकि नेताओं का सत्याग्रह विफल गया था।


अतिरिक्त(मार्च1973)
रेगिंग
कृष्णा अगिनहोत्री
पिता कृषक । सीधी बंजर भूमि पर निंरतंर प्रयास से कुछ पैदा कर सके।
एक पुत्र : उसे कृषि में योग्य बनाने के लिए कृषि महाविधालय भेजा। गरीबी का आंचल फाड़कर वे किसी प्रकार प्रत्येक माह रूपये भेज देते और मंदिर में जाकर ईश्वर से प्रार्थना करते कि बेटा अच्छी तरह पास हो जाय।
लड़का सीधा सच्चा पिता की इच्छाओं को पूरा करने के लिए लगन निष्ठा में अग्रसर । सीधी वेषभूषा सादा आचरण। लड़के उसे छेड़ते साधु महाराज की जय। उसे बहुत कहा गया परंतु वह गाढ़ी पैतृक कमाइ से अपने मित्रों की खिलाने पिलाने को सहमत न हुआ। लड़के बिगड़े उसे निर्वस्त्र करके सताया। परंतु उसने रूपये नहीं दिये। वह जानता था कि इनके जाने पर वह फीस जमा न कर सकेगा।
आप लोग जितनी चाहे रेगिंग ले पर मैं बहुत गरीब हूं मुझसे रूपये मत मांगी। लड़का रोने लगा।
ठीक है बच्चू गरीब है तो पढ़ने क्यों आया देख लेगे? छात्रों का झुण्ड चला गया।
लड़का प्रतीक्षा करता रहा एक से पन्द्रह तारीख आ पहुंची पर मनीआर्डर नहीं आया। वह सर पकड़ कर बैठा रहा । आज उसके कमरे में शानदार पार्टी थी पर वह कोने से खाली आंखो में ताकता रहा ।
उसके रूम -पार्टनर ने घकियाया- अबे बुद्धु चुप क्यां है इतना भी नहीं समझता तेरा ही तो माल है खाता क्यों नहीं
क्या !
हां परसों ही तो मेरा मनीआर्डर राजीव ने तेरी ओर से लिया था। उसकी आंखों का खालीपन बढ़ने लगा। बढ़ता गया वह जोर से चीखा मेरी फीस और अचानक चीख मारकर चुप हो गया।
साधु महाराज की जय....जय ।  पर वह चुप रहा। भूखा प्यासा चुप रहा। चुप्पी बढ़ती ग ई। लड़केसाधु महाराज की जय... कहते कहते बिखर गये। पर वह बैठा रहा। वैसा ही चुप और खाली।
मानसिक चिकित्सालय की मोटर आ ग ई। वह पागलखाने के कमरे में बैठा बुदबुदाया।
रेगिंग लो रूपये मत लेना।

अतिरिक्त(मार्च1973)     आई   

3 comments:

प्रदीप कांत said...

Sochane ko majboor karati laghukathaein

gurpreet singh Butter said...

आज कि निकृष्ट मानसिकता स्टीक चित्रण किया है।
....
http://yuvaam.blogspot.com/2013_01_01_archive.html?m=0

अशोक भाटिया said...

भगीरथ भाई,अच्छा और ज़रूरी काम कर रहे हो.कृष्णा अग्निहोत्री की 'रैगिंग'लघुकथा का जो अंत है,उसे देखते हुए ऐसी ही रचना बन सकती थी.
अशोक भाटिया