Thursday, February 21, 2013

रोजी


                   रोजी

       महेश दर्पण

तडाक---तडाक---तडाक--- उसने पूरी ताकत से सोबती के गाल पर तीन चार तमाचे जड़  दिये।वह अभी और मारता पर पीछे से सत्ते ने हाथ रोक लिया—पागल हुआ है क्या---डेढ हड्ड़ी की औरत है मर गई तो—?
उसके हाथ रुके तो जबान चल पड़ी
—हरामजादी आंख        फाड़-फाड़ कर क्या देख रही है –रात भर में तुझे दो ही रुपये मिले बस ? निकाल कहां छिपा रखे है--- रोटी तोडते समय  तो ऐसे   ---।
सोबती की लाल आखें, जो अब तक झुकी हुई चुपचाप सुने जा रही थी,उसकी ओर उठ गई –चुप भी कर हिंजडे—रात भर बीड़ी के पत्ते मोडे हैं  और तू----तन बेचना होता तो तुझे खसम ही क्यों करती !
(समग्र-१९७८)(छोटी-बडी बातें  १९७८)

4 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

श्रीमती वन्दना गुप्ता जी आज कुछ व्यस्त है। इसलिए आज मेरी पसंद के लिंकों में आपका लिंक भी चर्चा मंच पर सम्मिलित किया जा रहा है।
आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (23-02-2013) के चर्चा मंच-1164 (आम आदमी कि व्यथा) पर भी होगी!
सूचनार्थ!

प्रतिभा सक्सेना said...

काहे का खसम ,जोंक है वह तो छुटा के फेंक दे!

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

मार्मिक

प्रदीप कांत said...

सोबती की लाल आखें, जो अब तक झुकी हुई चुपचाप सुने जा रही थी,उसकी ओर उठ गई –चुप भी कर हिंजडे—रात भर बीड़ी के पत्ते मोडे हैं और तू----तन बेचना होता तो तुझे खसम ही क्यों करती !

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किस काम के हैं ऐसे खसम?


ये लघुकथा इस समाज के इस पहलू पर आक्रोश पैदा करती है