Friday, November 7, 2008

रघुनाथ मिश्र की गजल



रघुनाथ मिश्र की गजल

कितने हो गये तबाह, हम तलाशेंगे ।
चश्मदीद कुछ गवाह हम तलाशेंगे ।
ठिठुर रहे हैं सर्द रात में, असंख्य जहाँ ,
वहीं पे गर्म ऐशगाह , हम तलाशेंगे ।
यहाँ ये रोज भूख - प्यास महामारी है ,
वहाँ पे क्यों है वाह -वाह , हम तलाशेंगे ।
खुलूस -ओ - प्यार की आबोहवा जहरने में ,
उठी है कैसे यह अफवाह , हम तलाशेंगे ।
जिन बस्तियों ने हर खुशी बाँटी उनमें ,
ठहरी है क्यों कराह, हम तलाशेंगे ।
बहते हुए दरिया का अचानक यूं ही ,
ठहरा है क्यों प्रवाह हम तलाशेंगे ।
चश्मदीद :- आखों देखा , ऐशगाह :- ऐयाशी की जगह , खुलूस -ओ - प्यार :- प्यार भरी सच्चाई , आबोहवा :- जलवायु

4 comments:

Shiv Kumar Mishra said...

बहुत बढ़िया गजल है. प्रस्तुति के लिए धन्यवाद स्वीकार करें.

Anonymous said...

आदरणीय भागीरथजी, श्री रघुनाथजी की ग़ज़लें पढ़ कर आत्‍मविभोर हो गया. साथ ही आपके ब्‍लॉगस्‍पोट के बारे में श्री मिश्र से जानकारी हुई. नियमित सम्‍पर्क में रहने की कोशिश करूंगा. मेरी बधाई स्‍वीकार करें.
गोपाल कृष्‍ण भट्ट ‘आकुल’

आदरणीय भागीरथ जी, प्रकाशित / चयनित रचनायें पढ़ कर अच्‍छी लगीं. वे उत्‍प्रेरक हैं और दिशा देती हैं.
सकारात्‍मक और उत्‍साहवर्धक प्रयास प्रशंसनीय है. बधाई.
रघुनाथ मिश्र, लेखक.

'आकुल' said...

आदरणीय भागीरथजी, श्री रघुनाथजी की ग़ज़लें पढ़ कर आत्‍मविभोर हो गया. साथ ही आपके ब्‍लॉगस्‍पोट के बारे में श्री मिश्र से जानकारी हुई. नियमित सम्‍पर्क में रहने की कोशिश करूंगा. मेरी बधाई स्‍वीकार करें.
गोपाल कृष्‍ण भट्ट ‘आकुल’

सुभाष नीरव said...

बहुत अच्छी ग़ज़ल है।
मकान शिफ़्टिंग की वजह से लगभग घर का नेट एक माह बंद रहा। आज ही चालू हुआ है। मेरा घर का नया पता और घर का नया टेलीफ़ोन नंबर मेरे ब्लागों में जा रहा है। चाहें तो नोट कर लें भविष्य के लिए। मित्रों को भी बता दें।
ज्ञानसिंधु निरंतर देखता रहता हूँ। आपका यह छोटा सा प्रयास बहुत अच्छा और सराहनीय प्रयास है।