Tuesday, May 4, 2010

भीतर का सच


अशोक भाटिया
बच्ची सो चुकी थी । वह खाना खाकर खाली था। उसने काम के हिस्से के तौर पर, ब्रश किया, टी.वी. ऑन किया और बैड पर पसर गया । उधर रमा सुबह के लिए दही जमाने, सब्जी बनाने और कपड़े तहाने के बीच , ताबड तोड घुम रही थी । वह खाली हुई तो पति ने बाहरी दरवाजे बंद कर दिये ।
''आज तो कई दिन हो गये..........'' विशाल ने चादर खोलते हुए कहा
''इस वक्त तो में थककर चूर हो जाती हू।...........'' रमा ने कमर सीधी करते हुए कहा।
वह सोना चाहती थी, पर उसने सोचा - ''ये नाराज हो गये , तो जो थोड़ा बहुत काम करते हैं , वह भी नहीं करेंगे''
''अब तो रितु ढाई साल की हो गई ! '' विशाल ने रमा को चादर ओढते हुए कहा
''अभी बहुत छोटी है, थोड़ी और बड़ी हो जाये......''
''.......''
''मैं तो कहती हूँ..... एक बच्चा ही काफी है हम दोनो नौकरी - पेशा है। बच्चे पालने आजकल बड मुश्किल है ...''
''जो आयेगा, वह पल भी जायेगा... हमे क्या कमी है? ''
सुनकर रमा पल - भर सोच में डूब गई .... फिर मुस्कान और गम्भीरता को जोड कर बोली -''अच्छा एक बात बताओ... अगर हमारा पहला बच्चा लड का होता, तो भी क्या दूसरे के बारे में सोचते ? ''
''तो क्या तू यह कहना चाहती है , कि मैं लड के की चाह में ही , दूसरा बच्चा कह रहा हूँ !'' विशाल ने अपने मन पर प्रश्न -चिन्ह को तुरंत हटाना चाहा ।
''आदमी लाख लबादा ओड कर आ जाये , औरत उसका मन ताड ही लेती है!'' यह सुनकर विशाल मानो हिल गया। उसने सोचा -''इसे आज क्या हो गया है! '' और सहज होने की कोशिश करते हुए उसने कहा -''तो चलो , इसमें बुराई क्या है? लडकी तो है ही लड का भी हो जायेगा , तो जिंदगी में दोनो तरह का ऐक्सपीरियंस हो जायेगा.......''
''लेकिन यह तो किसी के बस का नहीं , कि क्या होगा ? कार्नर वाले देसराज ने इसी चक्कर में पॉच लड कियॉं पैदा कर ली। अब पछता रहे हैं!'' विशाल के मर्म पर चोट पड़ी थी , ''क्यों नहीं किसी के बस का ..?'' तिलमिलाते हुए वह बोला -''कई औरतें तो लड कियों का ठप्पा लेकर आती हैं!''
''ऐसी बात नहीं!'' रमा ने थोड़ा खिसकते हुए कहा- ''औरत तो मर्द का ही सूक्ष्म रूप होती है।''
''मर्द तो सप्लाई ही कर सकता है ग्रहण तो औरत को करना होता है वह क्या ग्रहण करती है। इसी पर सब कुछ है!'' विशाल रौ में कह गया।
सहसा दोनों के बीच एक सन्नाटा पसर गया रमा दीवार पर टंगे, अर्द्ध नारीश्वर का चित्र देखने लगी उसने सोचा-''औरत तो सिर्फ सॉंचा है।''
थोड़ी देर बाद विशाल की ओर मुड कर वह बोली -''सांइस तो आपने भी पढी है। औरत के पास तो सिर्फ एक्स गुण होते हैं । मर्द के पास एक्स और वाई दोनों होते हैं'' वह गम्भीर हो गई थी,
विशाल ने उसकी बात नहीं सुनी। वह अभी उसका पिछला तर्क ही पचा नहीँ पाया था वह बोला - ''हो सकता है वाई गुण तूने लिए ही न हो....''
''ऐसे तो मैं भी कह सकती हूँ कि हो सकता है आपसे सिर्फ ऐक्स गुण ही आये हों.... ''रमा भी रौ में कह गई,
यह सुनकर विशाल पूरी तरह जल - भुन गया ,उसेन मूँह दूसरी तरफ घुमा लिया रमा ने उसके हाथ में हाथ रखते हुए कहा-''यह सब तो संजोग होता है , इसमें कोई कुछ नहीं कर सकता न आप, न मैं....''
विशाल का मन अभी बड़ा नहीं हो पा रहा था, हालांकि बात उसे जॅंच जरूर गई थी।
(अंधेरे की ऑंख पुस्तक से)

5 comments:

परमजीत सिँह बाली said...

बढिया प्रस्तुति। आभार।

रवि कुमार, रावतभाटा said...

यह कथन,''यह सब तो संजोग होता है , इसमें कोई कुछ नहीं कर सकता न आप, न मैं....''

संपूर्ण संजोग व्यवस्था के टिके रहने का कारण बखूबी बयां कर रहा है...

अच्छा लगा...आभार...

प्रदीप कांत said...

अशोक जी की लघुकथाएँ गम्भीर ही होती हैं।

उमेश महादोषी said...

एक यथार्थपरक अच्छी लघुकथा ।

उमेश महादोषी said...
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