Saturday, May 23, 2015

आठवें दशक की लघुकथाएँ

पहचान  
लक्ष्मेंद्र चोपड़ा
अंतिम यात्रा की तैयारियां हो रही थी। पूरा परिवार बहुत दुखी था। उसका दुःख देखकर तो अनजान भी दुखी हो जाता। वह जार जार रो रहा था ,
उसके जीवन का सब कुछ चला गया था। अपना होश हवास तक नहीं था उसे।
'चलो अंतिम दर्शन कर लो 'परिवार के बूढ़े पुरोहित ने अंतिम दर्शन की रस्में शुरू कर दी। पुरोहित श्लोक पढता जाता ;समझाता 'दुखी मत हो ,
बेटा पांव छू लो और हट जाओ.'आखिर वह भी दुःख से टूटा बेहोश सा आया। उसकी रुलाई थम नहीं रही थी।
पुरोहित की समझाइश सुनते ही चौंका ,सीधा तन के खड़ा हो गया,कड़क कर बोला -; बक रहे हैं पंडितजी मैं और इसके पाँव छूऊँगा अपनी
बीबी के ---आपका दिमाग तो ठीक है ?'  



(आठवें दशक की लघुकथाएँ संपादक सतीश दुबे प्रकाशन वर्ष 1979 )

1 comment:

Kavita Rawat said...

सिर्फ अपने स्वार्थ के लिए रोते हैं ऐसे आदमी
औरत ऐसे लोगों की निगाहों में कामवाली बाई होती है
मर्मस्पर्शी प्रस्तुति