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Sunday, March 15, 2009

गजल










चाँद शैरी की गजल
मुल्क तूफाने बला की जद में है
दिल सियासत दान का मसनद में है
अब मदारी का तमाशा छोड कर
कल वो आदमी संसद में है
एकता का तो दिलों में है मुकाम
वो कलश में हैं न वो गुम्बद में है
जिंदगी भर खून से सींचा जिसे
वो शजर मेरा निगाहे बद मे है
फिर हैं खतरे मे वतन की आबरू
फिर बड़ी साजिश कोई सरह्द में है
एक जुगनू भी नहीं आता नजर
यह अंधेरा किस बुरे मकसद में हैं
चिलचिलाती धूप में 'शेरी' खयाल
हट के मन्जिल से किसी बरगद में हैं













पुरुषोत्तम 'यकीन' की गजल

न कोई शिकवा न काम रखना
सभी से लेकिन सलाम रखना
किसी को रख लेना अपने दिल में
और उसके दिल में क़याम रखना
अमल को अपने ग़ज़ल में अपनी
मुहब्बतों का पयाम रखना
भरोसा पल का नहीं पे पल का
है लाजमी एहतिमाम रखना
नहीं, न हो,जेरे - आस्माँ घर
दिलों के भीतर मकाम रखना
तुम अपनी यादों की डायरी में
कहीं तो मेरा भी नाम रखना
जफ़ा के बदले वफ़ा मुसलसल
तू रोजो - शब , सुबहो शाम रखना
बहुत ज़माने ने कहर तोड़ा
गया न 'ईमां' न 'राम' रखना
सभी को खुल कर पिला ऐ साकी
किसी का खाली न जाम रखना
'यक़ीन' शैरो - सुखन की जद पर
अदब से दर्दे -अवाम रखना

Wednesday, January 21, 2009

गोविन्द गौड की गज़लें


गोविन्द गौड की गज़लें

हो रहा है क्या गज़ब इधर ये जंग की तरह
बह रहा है यहां लहू भी क्यों रंग की तरह
हाय क्यों मचा हुआ है शोर मार-काट का
कुछ न कुछ पिये हुये हैं लोग भंग की तरह
बीच शहर आज उसका बुत खडा हुआ मिला
लाश जिसकी कल मिली थी एक नंग की तरह
किस कदर बाजार भाव बेलगाम हो गये
कुदते हैं फ़ांदते हैं अब तुरंग की तरह
हाथ में लिये हुये मशाल चल पडा हूं मैं
और रास्ता है आतिशी सुरंग की तरह
दुखभरी यह जिंदगी तो हमने ही कुबूल कि
वो है खुशनसीब जो जिया मलंग की तरह
2
आपके शहर में आकर बडा हैरान हूं मैं
सच के दामन में लिपट कर परेशान हूं मैं
लोग रहने नहीं देते मुझे इन्सान ही क्यूं
देवता कहते, कभी कहते हैं शैतान हूं मैं
चाहता हूं,रहूं अपने खयाले-हाल में ही
सोचता हूं मगर खुद से बहुत अनजान हूं मैं
जानते हो जिन्दा हूं बनकर फ़कत खिलौना
लाश की तरह यूं तो अलफ़ बेजान हूं मैं
आदमी बनकर ही रहने की है फ़ितरत मेरी
आगया जिद पे तो देखोगे कि अरमान हूं मैं
आप क्या कीजियेगा जानकर पहचान मेरी
मैं तो इन्सान हूं, हिन्दू न मुसलमान हूं मैं




Friday, November 7, 2008

रघुनाथ मिश्र की गजल



रघुनाथ मिश्र की गजल

कितने हो गये तबाह, हम तलाशेंगे ।
चश्मदीद कुछ गवाह हम तलाशेंगे ।
ठिठुर रहे हैं सर्द रात में, असंख्य जहाँ ,
वहीं पे गर्म ऐशगाह , हम तलाशेंगे ।
यहाँ ये रोज भूख - प्यास महामारी है ,
वहाँ पे क्यों है वाह -वाह , हम तलाशेंगे ।
खुलूस -ओ - प्यार की आबोहवा जहरने में ,
उठी है कैसे यह अफवाह , हम तलाशेंगे ।
जिन बस्तियों ने हर खुशी बाँटी उनमें ,
ठहरी है क्यों कराह, हम तलाशेंगे ।
बहते हुए दरिया का अचानक यूं ही ,
ठहरा है क्यों प्रवाह हम तलाशेंगे ।
चश्मदीद :- आखों देखा , ऐशगाह :- ऐयाशी की जगह , खुलूस -ओ - प्यार :- प्यार भरी सच्चाई , आबोहवा :- जलवायु

रघुनाथ मिश्र की गजलें





रघुनाथ मिश्र की गजलें
1
मुल्क की हालत , बड़ी गम्भीर है।
प्रश्नचिन्हों में घिरी , तस्वीर हैं ।
चल रहीं हैं , बे-नियंत्रित आँधियाँ,
गर्दनों पे घूमती , शमशीर है ।
आम जन हैं, हसरतों में मौत की,
जिंदगी कुछ खास की जागीर है।
मंजिलों की ओर बढ़ते पाँव को ,
रोकती वर्चस्व की , जंजीर है ।
उग रहे हैं भूख के , जंगल घने ,
मौसमों में दर्द की , तासीर है ।
आरजूएँ लुट गई , इन्सान की ,
चन्द सिक्कों में बिकी तदबीर है॥
शमशीर :- बीच में झुकी हुई तलवार , वर्चस्व :- तेज , प्रबलता , तदबीर :- उपाय , युक्ति

Wednesday, October 22, 2008

अरविंद सोरल की गजल



अरविंद सोरल की गजल

सिक्के हवा में देखिए यूं न उछालिए
जलते हुए सवाल हैं ऐसे न टालिए ।

ढाल की व्यवस्थाएं चरमरा गई ,
खंजर उठाइये या गर्दन निकालिए ।

इस चमन में आपने बोये थे कुछ बबूल ,
हो सके तो अब जरा दामन संभालिये ।

अब हमारी चाल भी तो देखिये हुजूर !
आपने तो दाँव अपने आजमा लिये ।

हमारे हाथ बढ़ चुके हैं नोचने नकाब ,
क्या हुआ जो आपने चेहरे छिपा लिए ।

बेशक हमारे खून को चूसा गया मगर ,
बाकि है अगर एक भी कतरा उबालिए ।



शकूर अनवर की गजल



शकूर अनवर की गजल


हवाओं से बहुत लड़ना पड़ेगा ,
समंदर का सफर महंगा पड़ेगा

सजा लो अपनी दीवारें सजा लो,
गरीबों का लहू सस्ता पड़ेगा

चलो सर्पीली राहों से निकल लें
ये सीधा रास्ता लम्बा पड़ेगा ।

अभी उस बेवफा से कुछ न कहना,
वो सबके सामने झूठा पड़ेगा ।

मेरे उड़ने की कोई हद नहीं है
मुझे ये आसमां छोटा पड़ेगा

समन्दर से अगर मिलना है 'अनवर'
नदी के साथ ही बहना पड़ेगा ।

Saturday, October 11, 2008

अखिलेश 'अंजुम ' की गजल



घर बिना छ्त बनाये जायेंगे ,
लोग जिनमें बसाये जायेंगे ।


आपका राज हो या उनका हो,
हम तो सूली चढ़ाये जायेंगे ।


साल - दर -साल बाढ़ आयेगी ,
आप दौरों पे आये जायेंगे ।


बूढ़े बरगद पे देखना जाकर ,
अब भी दो नाम पाये जायेंगे ।


हम तो होते रहेंगे यूहीं हवन
लोग उत्सव मनाये जायेंगे ।

चाँद शेरी की गजल


नादान न बन कोई तेरा यार नहीं है
जुल्मत में तो साया भी वफादार नहीं है

कार पाए जो मजबूर जवानी की हिफाजत
कानून के हाथों में वो तलवार नहीं है

हर सिम्त नजर आते हैं रावण के फिदाई
अफसोस कहीं राम का अवतार नहीं है

वो सिख है न ईसाई न हिन्दू न मुस्लमां
जिस शख्स में इंसान का किरदार नहीं है

दौलत से नहीं दिल से इसे जीत ले 'शेरी'
ये प्यार है नादां कोई ब्यौपार नहीं है