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Wednesday, August 23, 2017

कटे हुए पंख

कटे हुए पंख

रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

एक निरंकुश बादशाह को मरते समय उसके बाप ने कहा, “बेटा,प्रजा शेर होती है.बादशाह की कुशलता इसी में है कि शेर पर सवार रहे. नीचे उतरने का मतलब है मौत. इसलिए यह ध्यान रखना कि लोग गुलामी के आगे कुछ न सोच सकें. जनता में जो सरदार प्रसिद्ध हो जाय उसे रास्ता का कांटा समझकर हटा देना.” बेटे ने बाप की शिक्षा का पालन किया और सबसे बूढ़े वजीर को हवालात में बंद कर दिया. बूढा वजीर आज तक सारे शासन का सूत्रधार था.
इसी बीच कहीं से उड़ता हुआ एक तोता राज्य में आ पहुँचा. उसने चारों दिशाओं में उडकर कहना शुरू कर दिया ,  “गुलाम बने रहना सबसे बड़ी कायरता है. चुप रहकर सहना सबसे बड़ा पाप है.”
प्रजा में खुसुर-पुसुर शुरू हो गई. तोते की वाणी को देव वाणी समझकर लोग एकजुट होने लगे. बादशाह को भी सुराग मिल गया. उसने तोते को पकडवाकर पिंजरे में बंद करवा दिया.
क्रुद्ध जनता ने तोते को मुक्त करने की आवाज उठाई तो बादशाह ने वाहवाही लूटने के लिए उसे पिंजरे से मुक्त कर दिया. तोता उडकर दूर के वृक्ष पर जा बैठता, इसके पूर्व ही प्रजा बादशाह की दरियादिली का बखान करती हुई लौट आई.

परन्तु तोता उड़ न सका. वह धीरे-से पिंजरे के पास बैठ गया था: क्योंकि उसके पंख मुक्त होने से पहले काट
दिए गए थे.   

Tuesday, October 25, 2016

मै वारी जांवा

मै वारी जांवा
-सीमा जैन
शहर क्या, देश के नामी स्कूल की प्रिंसिपल हमारे घर आई। मेरी खुशी का ठिकाना ही नहीं था।
सोशल साइट पर किसी से मैं बात कर रही थी। फोन को एक तरफ पटका और मैडम जी से बात करने बैठ गई।
मैडम जी ने ही बात शुरू की-"क्या करती है आप रिया जी?"
-"जी, एक कम्पनी का एकाउंट्स देखती हूँ।"
-"फिर तो हिसाब की बहुत पक्की होगी आप!"
-"जी मैडम मैंने m.com. में टॉप किया था।"
-"मैंने तो आज देखा, आप लेखिका और कवयित्री भी हैं। कैसे कर लेती हैं ये सब?घर की जिम्मेदारी, काम के बाद कैसे समय निकाल लेती हैं?"
-"क्या करे मैडम, सब करना पड़ता है। अब हुनर है तो..."
-"आपकी कविता, कहानी कई पत्रिकाओं में प्रकाशित होती है। मैंने आज पहली बार आपके अकाउंट को देखा।"
-"अरे, पर आपने कोई कमेंट तो नहीं दिया !"
-"आज सालों बाद अपना अकाउंट खोला था। देखा, आपके तो मित्रों की भरमार है।कमेंट करना तो भूल गई आपके मित्रों की लम्बी लिस्ट देखकर।"
(बहुत अच्छा लगा ये सुनकर की मैडम ने मेरी हैसियत देखी । वो भी समझ गई होंगी कि मै कोई छोटी-मोटी नहीं, बड़ी लेखिका हूँ)
-"अब ये रोज़ का रिश्ता है मैडम, सबसे निभाना पड़ता है तो दोस्त बन ही जाते हैं।"
-"आपके हर दो दिन में बदलते प्रोफाइल फोटो को तो जबरदस्त लाइक मिलते हैं।कभी पेड़ के पीछे तो कभी झरने के नीचे; आप तो अपने बचपन की हो या परिवार की, हर खुशी और याद सबसे साझा करती हैं। यहाँ तक की भोग की थाली की फोटो लगाना भी नही भूलती हैं।"
(आज तो दिल कर रहा था अपने सारे कमेंट्स मैडम जी पर वार दूँ।)
खुशी को छुपाते हुए मैने कहा-"अब ये साइट भी हमारे परिवार जैसी ही हो जाती है।"
-"रिया जी, घर, नौकरी के बाद अपने हुनर को वक्त देना एक बात है और सोशल साइट के बगैर सांस भी न लेना दूसरी बात है। इस सब के बीच में बच्चों का भविष्य आता है, उसको सिर्फ लाइक नहीं उसपर कमेंट करना भी जरूरी है।"
(ये अचानक बात करते-करते मैडम जी का मूड़ क्यों बदल गया?)
-"रिया जी, आपने ये नहीं पूछा कि मै यहाँ आई क्यों? मैं यहाँ आपकी बेटी, जो सातवीं में मेरी बेटी की ही कक्षा में है, उसके बारे में बात करने आई हूँ।"
-"क्यों, क्या हो गया मेरी पारुल को? वो तो शहर के सबसे अच्छे स्कूल में पढ़ती है।"
-" स्कूल चाहे जैसा हो, आपकी जिम्मेदारी किसी भी हालात में कम नहीं हो सकती है! ये देखिये पारुल का वीडियो जो उसने मेरी बेटी को भेजा है। फ़र्क सिर्फ इतना ही है कि वो ये फोटो आपसे छुपाएगी और आप अपने फोटो...."
अब मैडम के हाथ से मैंने फोन छीन लिया और वीडियो देखकर मेरी आँखों से आँसू बहने लगे।अब मुझे मिलने वाले लाइक और आंसुओ में जंग शुरू हो गई।अकाउंट्स में टॉप करने वाली माँ, अब ये हिसाब ठीक से रख पायेगी क्या?
-

Tuesday, October 11, 2011

अबीज

        











  पूरन  मुदगल


अजनबी ने गेहूं की एक पकी बाल तोड़ी।

''बहुत मोटी है यह बाल।'' उसने किसान से कहा । किसान ने बाल से कुछ दाने निकालकर अपने हाथ पर रखे    और बेमन से कहा, ''देखो''

देखते -देखते सब दाने दो - दो     टुकड़ो      में खिल गए। अजनबी हैरान हुआ, पूछा, ''ये दाने साबुत क्यों नहीं रहे ? ''

''यह नए बीज की फसल है । पिछले पांच सालों से हम यही खा रहे हैं।चार -पांच गुना झाड है इसका, लेकिन....''

किसान के चेहरे पर अनजाने में किसी गलत दस्तावेज पर किए दस्तखत जैसी लिखाई उभरी।

''क्या ....?
''यह बीज विदेशी हैं।मेरे बेटे इसे बाहर से लाए है। इसकी फसल तो अच्छी होती है , पर बीज के काम नहीं आती।''

क्यों ?''
''देखा नहीं तुमने ! बाल से निकलते ही हरेक दाने के दो   टुकड़े  हो जाते हैं। मेरे लडके निक्का और अमली चोरी छिपे ले आते हैं यह बींज''  
''लेकिन जिस फसल से बीज न बने , वो किस  काम की !किसी  साल  विदेश से बीज ने आया तो......? अजनबी ने वही बात कह दी जो किसान की परेशानी की बायस बनी हुई थी। लोग फसल काटने में व्यस्त थे। निकट ही हवा में तैर रही ढोल की आवाज किसान को अप्रिय लगी। वह अपनी हथेली पर रखे गेंहू के    टुकड़ा  -टुकड़ा  दानों को देखने लगा, जिनका धरती से रिश्ता  टूट गया था।

Friday, September 9, 2011

मानसिक व्यभिचार

 अन्तरा करवड़े



अपने अकाउंट से लॉग आउट होते हुए रीटा पसीना पसीना होने लगी। कौन हो सकता है ये परफेक्ट गाय? उसकी कुछ बातों पर ही¸ आवाज के अंदाज पर ही उसे अपना मान बैठा है। कुछ क्षणों के लिये उसके मस्तिष्क में नीली सपनीली आँखों वाला एक गोरा चिट्‌टा¸ गठीला युवक अलग - अलग कोणों से आता - जाता रहा। अनजाने ही रीटा के चेहरे पर मुस्कान आती रही।

और फिर अचानक वो परफेक्ट गाय¸ अभिषेक में बदल गया। अभिषेक¸ उसका मंगेतर!

अपने मन में विचारों का तूफान लिये वह घर पहुँची। अपने कमरे की शरण ली। अभिषेक¸ उसका मंगेतर¸ दूसरे शहर में नौकरी करता है। ऑफिस में काम करते वक्त ऑनलाईन रहता है। रीटा उसी से वॉईस चैट करने के लिये कैफे गई थी। उसके लिये अभिषेक ने मैंसेज छोड़ रखा था। वह एक घण्टे के लिये मीटींग में व्यस्त था और ऑनलाईन होते हुए भी उससे संपर्क नहीं कर सकता था।

तभी रीटा के मैंसेंजर पर एक अनजान संदेश उभरा।

"हैलो स्वीटी!"

यही था परफेक्ट गाय! रीटा का लॉगिन नेम था स्वीट सॅन्योरीटा।और फिर थोड़ी बहुत पूछ ताछ के बाद उसने रीटा को वॉईस चैट के लिये राजी कर लिया। उसकी बातचीत¸ आवाज¸ लहजे की तारीफें करता हुआ वह दस मिनट में ही दिल¸ ईश्क¸ प्यार¸ मुहब्बत तक पहुँचते हुए उसे प्रेम प्रस्ताव देने पर उतर आया।

बिना देखे सोचे उत्पन्न हुए इस प्रेमी के लिये रीटा तैयार नहीं थी। कई बार उसने लॉगआऊट होने का सोचा लेकिन सहेली मोना क वाक्य याद आने लगे। "यदि कोई पीछे पड़ा ही है तो थोड़े बहुत मजे ले लेने में क्या हर्ज है?" और रीटा बह चली थी। उस वक्त उसके मन से अभिषेक जाने कहाँ गायब हो गया था। लेकिन जब यह परफेक्ट गाय उसका शहर¸ नाम¸ पता¸ फोन नंबर पूछकर घर आने की जिद पर अड़ गया तब रीटा को होश आया। ये क्या कर रही थी वो?

किसी तरीके से बहाने बाजी करते हुए उससे छुटकारा पाया और अब अपने कमरे में बुत सी बनी बैठी थी।


उसी समय घर के सामने से जय जयकार की आवाजों के साथ ही एक स्वामीजी की पालकी निकालने लगी। रीटा ने ध्यान से देखा। ये वही स्वामीजी थे जो कहने को तो ब्रम्हचारी थे लेकिन सदा औरतों की ओर ही ध्यान लगाए रखते। कॉलेज के दिनों में इनके कितने ही किस्से मशहूर थे।

इन्हीं किस्सों को सुनते सुनाते एक दिन रीटा की माँ के मुँह से निकाला था¸ "सब कुछ मन¸ वचन¸ कर्म से हो तो ठीक है। फिर चाहे ब्रम्हचर्य हो या गृहस्थी।"

रीटा का मन उसे अपराधी की भाँति कटघरे में खड़ा कर रहा था। वो स्वयं क्या कर रही थी?

भले ही अभिषेक को कभी कुछ मालूम नहीं होगा... लेकिन मन में बात तो आई ना?

दूसरे ही दिन उसने अभिषेक को मेल किया। "मैंने अपना लॉगिन नेम "स्वीटसैन्योरीटा" से बदलकर "रीटाअभिषेक" कर लिया है।"


गद्यकोश से साभार

Monday, August 22, 2011

महानगर की डायरी



हमारा प्यारा सा छोटा¸ सुंदर परिवार है। यानी मेरे पति¸ चार साल का बेटा अभि और मैं। और हाँ अभि के दादा भी हमारे ही साथ रहते है। मैं थोड़ा गलत बोल गई। इतना भी छोटा परिवार नहीं है हमारा। मेरे पति तो दिन भर काम में व्यस्त रहते है। वो एक्सपोर्ट का बिजनेस है ना हमारा। कस्टम वालों से लगाकर टैक्स अथॉरिटीज सभी के साथ अच्छी सेटिंग है इनकी। मैं अपनी सहेलियों के साथ जिम¸ किटी और क्लब की एक्टीविटीज में ही इतना थक जाती हूँ कि हफ्ते में दो तीन बार तो हम बाहर ही खा लेते है।


अभि के दादाजी को नहीं भाता ये सब। अब बाहर जाएँगे तो साढे ग्यारह बारह से पहले लौटेंगे क्या? उनके लिये पॅक्ड डिनर ले आते है। कभी खाते है तो कभी वैसा ही पड़ा रहता है।

बदादा को मेरा घर में किटी करना¸ टीवी पर सीरियल देखना¸ कॉकटेल पार्टीज में जाना और यहाँ तक कि नॉन वेज और ड्रिंक्स तक लेना भी पसंद नहीं है। हद होती है दकियानूसी सोच की भी । आखिर कोई किसी की लाईफस्टईल में¸ जीने के तरीके पर तो पेटेंट नहीं रख सकता न?

आप ही बताईये जब वे घर में जोर जोर से मंत्रा बोलकर हमारी मॉर्निंग स्लीप में दखल देते थे¸ धूप जलाकर मेरे सारे इम्पोर्टेड कर्टन्स खराब कर दिये उन्होने¸ अभि के बर्थडे पर उसे गंदे आश्रम के बच्चों के पास ले जाने की जिद करने लगे थे¸ अपनी पत्नी की धरोहर के नाम पर तीन पेटियों की जगह घेरे हुए रहते है तब हम उन्हें कुछ भी कहते है क्या?



कई बार मेरा दिमाग खराब होता है लेकिन अभि के पापा सब कुछ समझते है। वे तो दादा से ज्यादा बातें भी नहीं करते। उन्होने मुझे बता रखा है कि मरते समय उनकी माँ को उन्होने वचन दिया है इसलिये दादा को वृद्धाश्रम में नहीं रख सकते। अब आखिर मैं भी तो भारतीय नारी हूँ। कुछ तो ख्याल रखना ही पड़ता है ना पति की इमोशन्स का।

लेकिन दादा ने उस दिन तो हद ही कर दी थी। दिवाली पर मैं नौकरानियों के लिये कुछ सामान लाने बाजार ही नहीं जा पाई थी। सोचा कि अपनी सासूजी की पुरानी धुरानी सड़ियों के बंड़ल में से चार पाँच निकाल कर उन्हें दे भी दूँगी तो काम चल जाएगा। दादा टहलने गये थे और मैंने अपना काम कर ड़ाला था। लेकिन अभि! आखिर बच्चा ही तो ठहरा¸ सो इनोसेंट ही इज। उसने दादा को बता ही दिया कि मैंने दादी की साड़िया रमा¸ ऊमा¸ पारो और सविता को दी है। फिर क्या था¸ वे मुझसे¸ रियली मुझसे ऊँची आवाज में बातें करने लगे थे।

पता नहीं कौन सी पास्ट हिस्ट्री बताते रहे थे। पुराना वैभव और क्या - क्या। तब मैंने उन्हें अभि के पापा वाली बात बता ही दी थी कि

"आपकी धर्मपत्नी की ही बदौलत आपको दाना - पानी मिल रहा है यहाँ। नहीं तो...।" और पता नहीं क्यों वे छाती मलते हुए से हमेशा की तरह नाटक करते बैठ गये थे।


और सच बताऊँ अभि ने ये भी सुन लिया और तो और मेरी सारी एक्सप्रेशन्स को वह बखूबी इमीटेट करने लगा है आजकल। उसे ना मेरा वर्ड "धर्मपत्नी" बड़ा अच्छा लगा था। कहता था "ममा आप तो बड़ा ही अच्छा मदर टंग बोलती है।" अभि के पापा का मूड थोड़ा सा ऑफ जरूर हुआ था लेकिन जब अभि ने मेरा डायलॉग वैसे ही एक्सप्रेशन्स के साथ बार - बार दोहराया तब ही ऑल्सो एन्जॉइड लाईक एनीथिंग।

फिर तो जब भी दादा खाना खाने बैठते¸ अभि उनके आगे पीछे दौड़ता हुआ यही डायलॉग बोलता रहता। लेकिन कितने रूड व्यक्ति थे वो। मैंने तो सुना है और देखा भी है कि दादा दादी को अपने नाती पोतों से कितना प्यार होता है लेकिन यहाँ दादा तो बस एक्सप्रेशनलेस होकर बैठे रहते थे।

साल का ये दिन मुझे बड़ा बोरिंग लगता है यू नो। मेरी सासू माँ की बरसी। अब आप ही सोचिये कि जिस लेड़ी को मैं ठीक से जानती भी नहीं उसके लिये ये सारा कुछ करने की एक्सपॅक्टेशन मुझसे क्यों की जाती है? पता नहीं कौन कौन से बूढ़े और बोरिंग व्यक्ति आ जाते है इस दिन। और इतना खाते है कि पूछिये मत। और तो और सभी गँवारों के जैसे नीचे बैठकर खाते है। और हमारे दादा! उनकी तो पूछिये मत। प्ताा नहीं हमारे बारे में इन सभी लोगों को क्या क्या बताते रहते है।

इस सब चक्कर में अभि के पापा को घर पर रहना होता है और उनका बिजनेस लॉस होता है सो अलग। लेकिन कौन इन्हें समझाए। देखिये कैसे बैठे है सभी। छी! मुझे तो उनके सामने जाने की इच्छा भी नहीं होती। उसपर आज साड़ी पहननी पड़ती है सो अलग। अभि को तो मैं उसकी नानी के यहाँ भेज देती हूँ हमेशा लेकिन इस बार जिद करके रूका है वो यहाँ। मैं ध्यान रखती हूँ कि वो इनमें से किसी भी आऊट ऑफ डेट पीस के पास न चला जाए। ऐसा लग रहा है कि कब ये लोग एक बार के जाएँ यहाँ से और मैं साड़ी की जगह ढीली नाईटी पहनू।

लेकिन उस दिन आराम तो था ही नहीं जैसे किस्मत में। सबके साथ दादा खाने बैठे थे। वही हमेशा की आदत! सासू माँ के "चरित्र" का गुणगान! वे खाना अच्छा बनाती थी¸ वे मेहमाननवाजी अच्छी करती थी¸ उनके जाने के बाद तो जैसे घर में जान ही नहीं रही आदी आदी। और जानते है उतने में क्या हुआ? अभि वहाँ पहुंचा और उसने अपना वही डायलॉग सबके बीच में दादा पर मारा। उसका प्रेजेन्स ऑफ माईंड भी लाजवाब है।

"आपकी धर्मपत्नी की ही बदौलत आपको दाना - पानी मिल रहा है यहाँ। नहीं तो...।"

लेकिन दादा हमेशा की तरह तटस्थ नहीं बैठे रहे। वे गिर पड़े थे अपनी जगह पर ही।


खैर... हमें डॉक्टर ने बताया कि किसी शॉक के कारण ही हार्ट फेल हुआ है। अब जो आदमी इस दुनिया में ही नहीं रहा उसके लिये कोई कहाँ रूकता है भला। उन्होने उनका अंतिम संस्कार काशी में करवाने का लिखा था। हमने रमाबाई और उसके पति को टिकट निकालकर दे दिया था संस्कार कर आने के लिये। फिर हम प्लांड़ केरला ट्रिप पर गये। कितना फ्रस्ट्रेशन आया था अभि के पापा को। उससे बाहर निकलना भी तो जरूरी था।

अभि अपने साथ दादा का पुराना फोटो भी लाया था। एक दिन मैं और उसके पापा रिसोर्ट के लॉन में कॉफी पी रहे थे। उनका मूड थोड़ा ऑफ था। अभि भी कमाल का लड़का है हाँ। दादा का फोटो हमारे सामने रखा और कहने लगा¸


"आपकी धर्मपत्नी की ही बदौलत आपको दाना - पानी मिल रहा है यहाँ। नहीं तो...।"


हमारा हँसते - हँसते बुरा हाल था...

गद्यकोश से साभार


Thursday, August 11, 2011

डा. उमेश महादोषी की लघुकथा

 






भू-मण्डल की यात्रा


हरीचन्द जी ने जैसे-तैसे साल भर से बन्द पड़े मौके-बेमौके काम आ जाने वाले छोटे से पैत्रिक घर का दरवाजा खोला। एक कोने में पड़े पुराने झाड़ू से जाले और फर्श को किसी तरह थोड़ा-बहुत साफ किया, पुराने सन्दूक से पुरानी सी चादर ढूँढ़कर फर्श पर बिछायी, और लेट गये। आज शरीर ही नहीं, उनका मन भी पूरी तरह टूटा हुआ था। नींद आने का सवाल ही कहां था, किसी तरह बेचैनी को सीने में दबाकर आँखे मूँद लीं। एक-एक कर जिन्दगी की किताब के पन्ने खुद-ब-खुद पलटते चले गये...।

बचपन में ही माता-पिता का साया सिर से उठ जाने के बाद कितनी मेहनत करके पाई-पाई जोड़कर उन्होंने वह सुन्दर-सा घर बनाया था, एक दुकान भी कस्बे के मेन बाजार में खरीदकर अपना कारोबार जमाया था। बेटे अर्जुन को भी बी.टेक. की शिक्षा दिलवा ही दी थी। ग्रहस्थी की पटरी लाइन पर आने के साथ थोड़े सुख-सुकून के दिन आये ही थे, कि पत्नी उर्मिला दुनियां से विदा हो गई। उसके जाते ही जैसे उनकी दुनियां उजड़ने लगी। छः माह भी न हुए थे कि अर्जुन ने लन्दन से एम.एस. करने की जिद ठान ली थी। बहुत समझाया था उसे- ‘बेटा तू इतनी दूर परदेश में होगा, जरूरत पड़ने पर किसे तू याद करेगा और किसे मैं। यहां अपने देश में कम से कम एक-दूसरे का सहारा तो है। फिर आर्थिक स्थिति भी ऐसी नहीं है कि विदेश का खर्चा वहन किया जा सके....। पर बेटे के तर्को के आगे वह विवश हो गये थे- ‘पापा कैसी बातें करते हो आप! आज जितनी देर हमें अपने प्रदेश की राजधानी पहुँचने में लगती है, उससे कम समय में लन्दन पहुँचा जा सकता है। आज सारी दुनियां सिमिटकर छोटा सा गांव बन गई है। रोज हम आपस में टेलीफोन पर बात कर लिया करेंगे। जरूरत पड़ने पर कितनी देर लगेगी यहां आने में। रही बात पैसों की, तो आपके अकेले के रहने के लिए पुराना घर काफी है। इस नये घर को बेच देते हैं, अच्छी खासी रकम की व्यवस्था हो जायेगी। फिर मैं वहां कोई पार्ट टाइम जॉब भी कर लूँगा। दो साल के बाद तो मुझे अच्छा और स्थाई जॉब मिल ही जायेगा, तब आप भी वहीं हमारे साथ रहेंगे। क्या जरूरत रहेगी इस छोटी-मोटी दुकानदारी की? आप तो पूरे भू-मण्डल की यात्रा करना....’। और हुआ भी वही, मकान बेचा और बेटे ने सीधे लन्दन का टिकिट.....।

पूरे दो साल बाद एक दिन अचानक अर्जुन भारत यानी पापा के पास आया। ‘पापा मुझे लन्दन में ही एक बड़ी कम्पनी में बहुत अच्छी स्थाई नौकरी मिल गई है। आपको भी मेरे साथ ही चलना होगा। वहां मैंने एक फ्लैट भी देख लिया है, उसके लिए थोड़े पैसों की जरूरत भी है। अब आपको दुकानदारी की जरूरत तो रही नहीं और यहाँ इण्डिया में हमें आना भी नहीं है, इसलिए दुकान और पुराना घर भी बेच दो। इससे फ्लैट के लिए जरूरी पैसों की व्यवस्था हो जायेगी। फ्लैट रूबिया को बेहद पसन्द आया है, आपको भी अच्छा लगेगा.....।’

झटका ता लगा था, पर जैसे-तैसे अपने-आपको सम्हालकर पूछा था- ‘ये रूबिया कौन है, कहां की रहने वाली है, क्या करती है और तेरा क्या रिश्ता है उससे?’

‘पापा, वो मेरी कम्पनी में ही जॉब करती है। रहने वाली पाकिस्तान की है। हम दोनों एक दूसरे को बहुत पसन्द करते हैं, आपको भी अच्छी लगेगी। आपके वहाँ चलते ही हम शादी कर लंेगे......।’ तब भी कितना समझाया था- ‘बेटा तू अपनी नौकरी कर और मुझे यहीं मेरे वतन में रहने दे। फ्लैट साल-दो साल बाद भी तू ले सकता है। जहाँ तक बात बेटा एक पाकिस्तानी लड़की से शादी करने की है, सो यह ठीक नहीं रहेगा। अलग-अलग धर्मों का होने पर एक बार निर्वाह हो भी जाये, पर साथ में तुम दोनों का सम्बन्ध दो अलग-अलग ऐसे देशों से है, जिनकी पारस्परिक विरोध की जड़ें बहुत गहरी हैं। और दोनों देशों के निवासियों की अपने-अपने देश के साथ आस्थाएं और भावनाएं भी उतनी ही गहरी हैं। इसलिए तुम दोनों और दोनों के पारिवारिक जनों के बीच ऐसे बहुत सारे मौके आ सकते हैं, जब जाने-अनजाने इन आस्थाओं और भावनाओं के चलते एक-दूसरे को समझना और सहन कर पाना असम्भव हो जायेगा। इसलिए मेरी सलाह यही है कि एक-दूसरे के प्रति भावनात्मक लगाव को सिर्फ दोस्ती तक ही रहने दो....।’

पर अर्जुन कहाँ सुनने वाला था। ‘पापा, फिर वहीं घिसी-पिटी बातें लेकर बैठ गये। दुनियां बहुत बदल गई है, आज हम देशों की सीमाओं से बहुत ऊपर उठ चुके हैं। न रूबिया पाकिस्तान की बन्धुआ है और न मैं हिन्दुस्तान का। पापा आप भी इन संकुचित सीमाओं से ऊपर उठ जाओ। हमारा देश पूरी दुनियां है........।’ लम्बा सा भाषण दे डाला था, अर्जुन ने। हरीचन्द जी की एक न चली, किसी प्रकार बेटे को समझा-बुझा कर इस पैत्रिक मकान को न बेचने पर ही राजी कर पाये थे। दुकान पड़ोसी लाला भीम सिंह जी को बेची और फिर वही हुआ, जो बेटे ने चाहा। एक साल भी नहीं बीता, कि परसों वो निष्ठुर दिन भी हकीकत बनकर सामने आ गया, जिसकी आशंका वह व्यक्त कर चुके थे।

अर्जुन के दोस्त वरुण के पापा हरेन्द्र जी घर आये थे उनसे मिलने। हमवतन और हमउम्र से मिलकर बातों में दोनों भूल ही गये कि वे लन्दन मंे बैठे हैं। उसी दिन दुर्भाग्य से आतंकियो ने मुम्बई पर हमला कर दिया। इस हमले की खबर टी.वी. पर देखी-सुनी तो चर्चा का बिषय बदल गया। चर्चा के बीच में पाकिस्तान और उसकी पाकिस्तानियत कब आ गई, पता ही नहीं चला। यह भी याद नहीं रहा कि घर में पाकिस्तानी बहू बैठी है। हरेन्द्र जी के घर में रहते हुए तो कुछ नहीं हुआ, पर उनके जाते ही क्या कुछ नहीं हुआ....! ‘मेरे घर में रहकर मेरे ही ऊपर अविश्वास करते हो? यदि विश्वास नहीं था तो शादी क्यों की थी बेटे के संग? बुड्ढे अब मैं तुझे एक दिन भी नहीं रुकने दूँगी यहाँ.....।‘ तमाम मिन्नतों के बावजूद बहू ने अर्जुन के दो दिन बाद आफीशियल टूर से लौटने तक भी घर में नहीं रूकने दिया। एजेन्सी से एयर टिकिट मंगाकर हवाई जहाज में बैठाते हुए उसने एक बार भी नहीं सोचा कि ये इस उम्र में भारत जाकर भी किसके सहारे और कैसे अपना जीवन बसर करेगा.......! सोचते और आँसू बहाते हरीचन्द जी की आँख कब लग गई, पता ही नहीं चला। और जब आँख खुली तब अगले दिन का सूरज भी सिर चढ़ रहा था।

थोड़ी देर के लिए वह फिर उन्हीं विचारों में खोने लगे। पर अचानक उन्होंने अपने आँसू पोंछ डाले, ‘बहुत मान ली बेटे की जिद। अब और नहीं....! जीविका का अपना कोई साधन नहीं है तो क्या, लाला भीम सिंह जी से मिलूँगा, भले आदमी हैं, अपनी दुकान पर सेल्स मेन तो रख ही लेंगे।....न...नहीं, जिस दुकान का मालिक था, उस पर नौकर.... अरे! काहे की शर्मिन्दगी.... भू-मण्डल की यात्रा की इतनी कीमत तो......!’

Wednesday, July 6, 2011

दर्पण के अक्स

दर्पण के अक्स
आभासिंह

पत्नी अपने बच्चों में गुम हो गयी और बच्चे अपने परिवारों में । रह गया वह । दिनभर की जी तोड़ मेहनत से व्यवसाय सम्भालता । शामें रातें सूनी हो गयी । अकेलेपन की बेबसी को दूर करेन के लिए उसने कम्प्यूटर की शरण ली। 'इन्टरनेट' पर 'चैटिंग'' का चस्का लगते भला क्या देर लगती । नये -नये अछूते संसार में विचरण करता वह अति व्यस्त हो गया । हर पन्द्रहवें बीसवें दिन एक नई लड की से बातचीत करना। अंतरगता के दबे - छिपे कोनों तक पहुंच बनाना। अपने भीतर उछलती उत्तेजना को महसूस करना। बेवकूफ बना पाने की अपनी कुद्गालता पर कुटिलता से मुस्कुराना ।

इस बार भी वह इंटरनेट बंद करके लिप्सा से मुस्कुराया। सोलह साल की लड की की लहकती आवाज में नरम सा प्रेमालाप उसके कानों में रस घोल रहा था। उसने ऐनक उतारी । खुरदरे हाथों से माथा सहलाया और खुमारी में डूबा - डूबा बिस्तर में जा धंसा।

उधर भी उस सोलह बरस की लडकी ने इंटरनेट बंद किया। ऐनक उतार कर मेज पर रख दी। लहकती आवाज में गुनगुनाना शुरू कर दिया । रैक से झुर्रियॉं मिटाने की क्रीम को हल्के हाथों चहरे पर लगाने लगी । खिचडी बालों की उलझी लटों को उंगलियों से सुलझाया । बेवकूफ बना पाने की अपनी कुशलता पर मंद -मंद मुस्कायी और खुमारी में डूबी-डूबी बिस्तर में जा धंसी।

Monday, April 25, 2011

औकात


                 जगदीश कश्यप



जज द्वारा दिए फैसले पर जब दोनों पक्षों के वकीलों ने हस्ताक्षर कर दिए तो जीतने वाले पक्ष के लोग कमल की माफिक खिल उठे.

हारने वाले पक्ष के वकील ने कहा-‘मुझे दुख है रामजीलाल मैं तुम्हारा केस बचा न सका.’ और वह तेजी से अपने बस्ते की ओर चला गया.

रामजीलाल के चेहरे पर विेषाद और बरबादी के एवज में वकील के प्रति क्रूर भाव उभर आए थे. इतने महंगे और प्रसिद्ध वकील ने अंतिम दम पर कैसी बोगस बहस की थी. घर खाली कराने के आदेश पर वह कम से कम एक माह की मोहलत तो ले ही सकता था.

‘यार मुझे रामजीलाल के हार जाने का बड़ा दुख है. अगर तुम्हारा दबाव नहीं होता तो नत्थू उसे कभी भी घर खाली नहीं करवा सकता था.’ यह बात रामजीलाल के वकील ने जीतने वाली पार्टी के वकील से कही.

‘वो तो ठीक है मिस्टर खुराना, पर इस बात के लिए आपको पूरा पांच हजार कैश भी तो मिला है. आखिर तुम इतने दुखी क्यों हो? न जाने कितने गरीब रामजीलालों को तुम इसी तरह हरवा चुके हो.’

इस पर मिस्टर खुराना ने ताजे खाए पान की ढेर सारी पीक को लापरवाही से एक ओर थूक दिया. जिस कारण अनेक बेकसूर चीटियां उस तंबाकू की पीक में जिंदा रहने की कोशिश करती हुई बिलबिलाने लगीं.



Saturday, February 19, 2011

जगदीश कश्यप की लघुकथाएं

औकात


जगदीश कश्यप



जज द्वारा दिए फैसले पर जब दोनों पक्षों के वकीलों ने हस्ताक्षर कर दिए तो जीतने वाले पक्ष के लोग कमल की माफिक खिल उठे.

हारने वाले पक्ष के वकील ने कहा-‘मुझे दुख है रामजीलाल मैं तुम्हारा केस बचा न सका.’ और वह तेजी से अपने बस्ते की ओर चला गया.

रामजीलाल के चेहरे पर विेषाद और बरबादी के एवज में वकील के प्रति क्रूर भाव उभर आए थे. इतने महंगे और प्रसिद्ध वकील ने अंतिम दम पर कैसी बोगस बहस की थी. घर खाली कराने के आदेश पर वह कम से कम एक माह की मोहलत तो ले ही सकता था.

‘यार मुझे रामजीलाल के हार जाने का बड़ा दुख है. अगर तुम्हारा दबाव नहीं होता तो नत्थू उसे कभी भी घर खाली नहीं करवा सकता था.’ यह बात रामजीलाल के वकील ने जीतने वाली पार्टी के वकील से कही.

‘वो तो ठीक है मिस्टर खुराना, पर इस बात के लिए आपको पूरा पांच हजार कैश भी तो मिला है. आखिर तुम इतने दुखी क्यों हो? न जाने कितने गरीब रामजीलालों को तुम इसी तरह हरवा चुके हो.’

इस पर मिस्टर खुराना ने ताजे खाए पान की ढेर सारी पीक को लापरवाही से एक ओर थूक दिया. जिस कारण अनेक बेकसूर चीटियां उस तंबाकू की पीक में जिंदा रहने की कोशिश करती हुई बिलबिलाने लगीं.

‘

चादर

जगदीश कश्यप



जब मेरी आंख खुली तो मैंने अपने दोगले मित्र को पास खड़े पाया. मुझे जागता पा उसने गिलास के पानी में ग्लूकोस घोलकर दिया. चुपचाप मैं पी गया पर मेरे हृदय में रक्त के बजाय क्रोध का संचार होने लगा. आंखों में खून तैर आया—‘तुम बुजदिल हो. मुझे यहां क्यों लाए?’

‘शश्श्श!’ उसने उंगली होंठ पर रखकर धीरे-से कहा—‘बोलो नहीं, चुपचाप पड़े रहो.’

मैं अपने इस मित्र को मजदूरों का नेता मानने के लिए शुरू से ही तैयार न था. काम चलाऊ भाषा में वह मिल-मालिक का चमचा था. और मुझ जैसे ईमानदार नेता को अपनी जानिब खींचने की असफल कोशिश कर चुका था.

ईमानदार आदमी पर आरोप लगाना ज्यादा आसान होता है. यही हुआ. स्ओर इंचार्ज होने के नाते मुझपर आरोप लगाया गया कि मैंने चालीस किलो तांबा गायब करवाया था. लिहाजा मेरी नौकरी खत्म.

‘अब तुम कैसे हो?’ उसने यह बात कहते ही मुस्कराहट-भरा मुखौटा ओढ़ लिया. मेरे कुछ न बोलने पर उसने धीरे से कहा—‘देख लिया न मजदूरों को. किसने तुम्हारा साथ दिया? सारा काम बाखूबी चल रहा है इस मिल का.’

इस पर मैं कुछ नहीं बोला तो वह कह उठा—‘सुनो, मैं तुम्हें एक ऐसा हलका काम दिलवा दूंगा, जिसमें कुछ भी मेहनत नहीं करनी होगी. रुपये भी पूरे पंद्रह सौ महीना मिलेंगे. मजे की बात तो यह है कि तुम एक-एक मजदूर से अपने अपमान का बदला भी ले सकते हो.’ यह कहते ही उसने मुझे एक चादर दिखाई जो अभी तक उसके जिस्म के चारों ओर लिपटी हुई थी.

‘मेरा काम बस इतना ही है कि मैं रात के समय यह चादर किसी मजदूर को ओढ़ा देता हूं और मजे से पंद्रह सौ रुपये महावार पीट लेता हूं.’

‘चादर ओढ़ाना तो पुण्य का काम है?’

‘यही तो तुम्हें समझाना चाहता था. पर तुम अब तक समझे ही नहीं.’

उसी रात को मैं मित्र द्वारा दी गई चादर को लेकर अपने किसी मजदूर भाई की झोपड़ी में घुसा और उसकी पत्नी से बोला की वह उस चादर को अपने सोते हुए पति पर डाल दे. उसकी पत्नी ने ऐसा ही किया. क्योंकि वह जानती थी कि मेरे द्वारा दी गई चादर भाग्यवाले को ही मिलेगी.’

उस मजदूर की पत्नी ने सुबह जब अपने पति के ऊपर से चादर हटानी चाही तो भय से चीख पड़ी. चादर का रंग सुर्ख पड़ चुका था. उसका पति अब भी गहरी नींद में सोया था. पति का चेहरा देखकर वह गश खाते-खाते बची. गालों की हड्डियां शंकु के समान उभर आई थीं. आंखें धंस गई थीं. पेट की पसलियां खाल को फाड़कर बाहर आना चाहती थीं. जब उसे जगाया गया तो मजदूर ने बताया कि उसके पैरों में जान नहीं रही थी. शायद वह किसी बीमारी द्वारा जकड़ लिया गया था.

वह औरत दौड़ी-दौड़ी मेरे पास आई और वह चादर मुझपर फंेक, गाली बकती हुई चली गई.

अब मुझे चादर को किसी दूसरे मजदूर के लिए इस्तेमाल करना था.

Wednesday, December 29, 2010

भंवरी देवी : एक पब्लिक फिगर

 
 भंवरी देवी : एक पब्लिक फिगर



चैतन्य त्रिवेदी



अच्छा बताओ भवंरी देवी, जब वे तुम्हारा चीर खींच रहे थे, तब क्या तुमने सरकार को पुकारा था या गोपाल को याद किया था ?

भंवरी देवी, अच्छा यह बताओ , तुम्हारी जानकारी में यह बात तो होगी ही कि सरकार तो द्रोपदी के समय में भी कुछ न कर सकी थी तो अब क्या करेगी । घटना के दौरान तुम गोपाल को आवाज लगा लेती तो हो सकता है कि गोपाल चीर बढ़ा देते । जैसे द्रोपदी का बढ ाया था।

भंवरी देवी , जांच से पता चला कि तुमने घटना के दिन बहुत सस्ती साड ी पहन रखी थी। पता लगाने की बात यह है कि द्रोपदी के समय जो चीर बढ ाया गया था, वा कौन - सा कपड ा था? कितने पने का था ?

(यह बात संसद में विरोधी दलों को जवाब देने के सिलसिले में पूछी गई) हां तो भंवरी देवी , तुमने गोपाल को नहीं पुकारा पता नहीं, तुमने सरकार पर कैसे भरोसा कर लिया । पता नहीं गोपाल ने द्रोपदी के समय इतना कपड ा किसके थान में से चुराया होगा ? यहां तुम्हें अनावृत कर देने से ........ इस इलाके में कपड ों की कितनी दुकाने है ? वे साडि यां रखते हैं या नहीं । घटना के दिन उनके पास साडि यां थी या नहीं ।

अब आखिरी बात यह है कि टी.वी. पर हमने देखा था तुम्हें। तुम्हारा इंटरव्यू भी। देद्गा - भर ने तुम्हें देखा । अखबारों में पढा । रेडियो से जाना तुम्हारा नाम। तुम पब्लिक फिगर हो गई । मीडिया का यही काम है , पब्लिक फिगर बनाना । द्रोपदी भी आज तक पब्लिक फिगर है और बनी रहेगी।

कुछ पाने के लिए कुछ खोना तो पडता ही है । है ना भंवरी देवी!

Sunday, November 7, 2010

नई परिभाषा

यशेंद्रा  भारद्वाज

‘‘देख रामकली तू परिवार की बडी बहू है इसलिए सर ढाँप कर रखना और  बड़ों के पाँव  छूकर आशीर्वाद लेना ।‘‘

सुहाग सेज पर पति द्वारा दी गई हिदायत को उसने पल्लू से बाँध  लिया था। अपने प्रेम और सेवाभाव से रामकली ने सभी का मन जीत लिया था। जिस देवर को उसने कभी गोद में खिलाया था आज उसकी सगाई की रस्म अदा करने लडकी वाले आ रहे थे।

मन में उठ रहे विचारों को झटक उसने काँजीवरम की साड़ी पहनी , नाक में नथनी पावों को लाल-लाल आलते से और चादी नगों वाले बिछुए  पहन  कर सजाया।

सोलह श्रृंगार कर अपना रूप दर्पण में निहारा और धीरे से साड़ी के पल्लू से अपना सर ढ़ाँप लिया था।

चालीस पार कर चुकने के बाद भी उसकी सुन्दरता ज्यों की त्यों कायम थी किसी नई नवेली दुल्हन की शर्माती सकुचाती वह पति के सामने चली गई थी।

‘‘कैसे लग रही हूँ जी , उसने इठलाते हुए पूछा । ‘‘बेजोड‘‘ परन्तु ये पल्लू सर से उतारो, जानती नहीं क्या तुम्हे इस रूप में देखकर लडकी वाले समझेंगे कि हम असभ्य है, गंवार हैं जो आजकल के जमाने के अनुसार नही चलतें।‘‘ कहते-कहते उसने पत्नी के सर से पल्लू खीच लिया था

उसे लगा था कि जैसे किसी ने उसे भरे बाजार में नंगा कर लिया हो । बडे-बूढ़ो के आगे बिना पल्लू के जाने की कल्पना मात्र से ही उसका मन काँप उठा था

अब उसका ड़रा सहमा सा मन ‘कुलवधु‘ की नई परिभाषा सीखने की कोशिश करने लगा था ।
अन्धा मोड़     सम्पादक  : - कालीचरण प्रेमी   , पुष्पा रघु

Sunday, October 31, 2010

बन्द दरवाजे

सुरेश शर्मा
श्यामलाल का परिवार सुखी परिवार में गिना जाता था रात को काम पर लौटने के बाद दोनो बेटों व बडी बहू के साथ खाना खाते समय टी वी आन कर लेते । सब मिल कर टी वी देखते हुए दिन भर के दुख-सुख व समाचारों का आदान-प्रदान देर तक करते रहते।श्यामलाल सेवानिवृति तथा पत्नी बिछोह के बावजूद कभी भी अकेलेपन का अहसास नही हुआ।
छोटे पुत्र की शादी हुई । दहेज में अन्य सामान के साथ रंगीन टी वी भी आया । श्यामलाल बच्चों के साथ चर्चा करने वाले थे कि दो टी वी का घर में क्या करेगें ? पुराना टी वी बेचकर नया टी वी रख लेंगे। उनका विचार बाहर आ पाता , उससे पूर्व ही छोटू के कमरे से नए टी वी की आवाज बाहर आ गई । खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग बदलता है। एक दिन बडा पुत्र अपने लिए नया टी वी ले आया । अब खाना भी उनके कमरे में जाने लगा।
एक रात अचानक श्यामलाल के सीने में जोर का दर्द उठा । शरीर पसीने से भीग गया । हाथ-पाव कापने लगे। घबराहट बढने लगी तो पानी पीने के लिए उठे । पैरों ने साथ नही दिया। लडखडा कर गिर पडे । दोनो पुत्रों को आवाज लगाई। बन्द दरवाजों से आती धारावाहिक तथा पाप संगीत की मिलीजुली तेज आवाजों में उनकी आवाज कहीं खो गई।
अन्धा मोड(सं-कालीचरण प्रेमी, पुष्पा रघु)-से साभार

Tuesday, May 4, 2010

भीतर का सच


अशोक भाटिया
बच्ची सो चुकी थी । वह खाना खाकर खाली था। उसने काम के हिस्से के तौर पर, ब्रश किया, टी.वी. ऑन किया और बैड पर पसर गया । उधर रमा सुबह के लिए दही जमाने, सब्जी बनाने और कपड़े तहाने के बीच , ताबड तोड घुम रही थी । वह खाली हुई तो पति ने बाहरी दरवाजे बंद कर दिये ।
''आज तो कई दिन हो गये..........'' विशाल ने चादर खोलते हुए कहा
''इस वक्त तो में थककर चूर हो जाती हू।...........'' रमा ने कमर सीधी करते हुए कहा।
वह सोना चाहती थी, पर उसने सोचा - ''ये नाराज हो गये , तो जो थोड़ा बहुत काम करते हैं , वह भी नहीं करेंगे''
''अब तो रितु ढाई साल की हो गई ! '' विशाल ने रमा को चादर ओढते हुए कहा
''अभी बहुत छोटी है, थोड़ी और बड़ी हो जाये......''
''.......''
''मैं तो कहती हूँ..... एक बच्चा ही काफी है हम दोनो नौकरी - पेशा है। बच्चे पालने आजकल बड मुश्किल है ...''
''जो आयेगा, वह पल भी जायेगा... हमे क्या कमी है? ''
सुनकर रमा पल - भर सोच में डूब गई .... फिर मुस्कान और गम्भीरता को जोड कर बोली -''अच्छा एक बात बताओ... अगर हमारा पहला बच्चा लड का होता, तो भी क्या दूसरे के बारे में सोचते ? ''
''तो क्या तू यह कहना चाहती है , कि मैं लड के की चाह में ही , दूसरा बच्चा कह रहा हूँ !'' विशाल ने अपने मन पर प्रश्न -चिन्ह को तुरंत हटाना चाहा ।
''आदमी लाख लबादा ओड कर आ जाये , औरत उसका मन ताड ही लेती है!'' यह सुनकर विशाल मानो हिल गया। उसने सोचा -''इसे आज क्या हो गया है! '' और सहज होने की कोशिश करते हुए उसने कहा -''तो चलो , इसमें बुराई क्या है? लडकी तो है ही लड का भी हो जायेगा , तो जिंदगी में दोनो तरह का ऐक्सपीरियंस हो जायेगा.......''
''लेकिन यह तो किसी के बस का नहीं , कि क्या होगा ? कार्नर वाले देसराज ने इसी चक्कर में पॉच लड कियॉं पैदा कर ली। अब पछता रहे हैं!'' विशाल के मर्म पर चोट पड़ी थी , ''क्यों नहीं किसी के बस का ..?'' तिलमिलाते हुए वह बोला -''कई औरतें तो लड कियों का ठप्पा लेकर आती हैं!''
''ऐसी बात नहीं!'' रमा ने थोड़ा खिसकते हुए कहा- ''औरत तो मर्द का ही सूक्ष्म रूप होती है।''
''मर्द तो सप्लाई ही कर सकता है ग्रहण तो औरत को करना होता है वह क्या ग्रहण करती है। इसी पर सब कुछ है!'' विशाल रौ में कह गया।
सहसा दोनों के बीच एक सन्नाटा पसर गया रमा दीवार पर टंगे, अर्द्ध नारीश्वर का चित्र देखने लगी उसने सोचा-''औरत तो सिर्फ सॉंचा है।''
थोड़ी देर बाद विशाल की ओर मुड कर वह बोली -''सांइस तो आपने भी पढी है। औरत के पास तो सिर्फ एक्स गुण होते हैं । मर्द के पास एक्स और वाई दोनों होते हैं'' वह गम्भीर हो गई थी,
विशाल ने उसकी बात नहीं सुनी। वह अभी उसका पिछला तर्क ही पचा नहीँ पाया था वह बोला - ''हो सकता है वाई गुण तूने लिए ही न हो....''
''ऐसे तो मैं भी कह सकती हूँ कि हो सकता है आपसे सिर्फ ऐक्स गुण ही आये हों.... ''रमा भी रौ में कह गई,
यह सुनकर विशाल पूरी तरह जल - भुन गया ,उसेन मूँह दूसरी तरफ घुमा लिया रमा ने उसके हाथ में हाथ रखते हुए कहा-''यह सब तो संजोग होता है , इसमें कोई कुछ नहीं कर सकता न आप, न मैं....''
विशाल का मन अभी बड़ा नहीं हो पा रहा था, हालांकि बात उसे जॅंच जरूर गई थी।
(अंधेरे की ऑंख पुस्तक से)

Monday, October 26, 2009

युगल की कथाएं

जात
युगल

छोटी जात वालों के कुएं में कुछ गिरा । जाग हो गयी । कई लोग कुएं पर जमा हो गए । कुएं में अंधेरा था । कुछ पता नहीं चल रहा था कि क्या गिरा है । एक आंशका थी कि शायद कोई आदमी गिरा हो । मजबूत रस्से में झग्गर बांध कर डाला गया । चार -पांच आदमियों ने खींच कर उस भारी बोरे को उपर किया । बोरे का मुहॅं खुला, तो सबों के मुहं खुले रह गये -‘‘अरे ! यह तो किसी बड़े घर का लगता है।’’
लोग उपचार में जुट गये । आग सुलगायी गयी । गरम तेल की मालिश होने लगी। उपचार के बाद वह आदमी होश में आया । एक आदमी ने पूछा-‘‘बाबू साहब, आपका घर?’’
‘‘रतनपुरा।’’
‘‘कौन जात हुए?’’
वह आदमी उस हाल में भी जात पूछे जाने पर तमक उठा-‘‘साले जात पूछते हो ? ये कड़कड़ाती मूंछे, ये चमकते रोएं और रंग नहीं देखते ? अंधे ! ये किस जात के होते हैं?’’
तब उन लोगों ने उस आदमी को उसी बोरे में कसा और फिर से उसी कुएं में डाल दिया । लोग उसकी जात जान गये थे ।



रास्ता

उसके सोते कई दिन गुजर गये थे । घर के लोग उठाकर थक गये थे और अंत में झुंझलाकर उठाना ही छोड़ दिया था । लेकिन जब वह उठा , तो उसे लगा कि दूर -दूर तक धुंध छाया हुआ है । हवा भारी और कड़वी है । उसने गहरी सांस ली , तो कलेजे में जलन होने लगी । बाहर आया, तो देखा, वादियों में कॅंटीली झाड़ियाँ उगी हैं, एक दूसरे में ऐसी गुंथी हैं कि राह खोजना मुहाल । उपर से गहराता मोटे पर्दे - सा धुंध ।
उसने एक निर्णय लिया और पांव आगे बढ़ाये । उसे ठोकर लगी और पांव में कांटे चुभ गये । उसने कांटे निकालने का प्रयास किया और देखा कि उसके पांव खून से भीग चुके हैं । खून से सने हाथ को दामन से पोंछना चाहा, तो पाया कि उसके दामन तार - तार हो चुके है। उसने आवाज लगायी - ‘‘लोगो, बाहर आओ , धुएं और धुंध के पार जाने के लिए , अंधेरे से लड़ने के लिए ।’’
उसे आश्चर्य हुआ कि लोगों ने आवाज सुनकर अपने - अपने दरवाजे बंद कर लिये । उसने दरवाजों पर दस्तक दी और पुकारा - ‘‘दरवाजा खोलो , तुम्हारे चारो ओर जहरीला रिसाव हो रहा है । तुम नहीं निकलोगे , तो तुम्हारे बच्चे घुट- घुट कर मंरेगे । अपने बच्चों के लिए , अगली पीढ़ी के लिए बाहर निकलो ।
लेकिन कोई नहीं निकला , तो उसने मुंडेरों पर चढ़कर देखा कि हर घर में ऊँट उकड़ू बैठे है और जहरीले रिसाव से अपने को बचाने के लिए बालुओं के ढेर में अपना थुथना गाड़े हैं । उस धुँध में वह निर्णय नहीं कर सका कि वे ऊँट ही थे या आदमी थे ।
फिर वह उस अंधेरे के पार जाने के लिए भागने लगा । वह रोना चाहता था , लेकिन उसकी रूलाई प्रार्थना बन गयी - भगवान ! प्रकाश दो ! अंधेरे से बचाओ ! हमें कांटो के पार ले चलो !
तब उसके सामने एक आकृति प्रकट हुई । उसके वस्त्र धवल थे । आकृति चिकनी थी और होठों पर मुस्कान थी । देवदूत की तरह वह बोला - मैं तुम्हें इस अंधेरे के पार ले चलूंगा । मेरे पीछे आओ !’’
और वह पत्थरों से टकराता, काटो से उलझता , रक्ताविल चरणों से उसके पीछे चलता रहा ....... चलता रहा ।
कि उसने एक चमकती हुई अट्टालिका देखी , जो बाहर - भीतर से जगमगा रही थी । सारा प्रकाश वहीं कैद था और उसके ऊपर की चिमनी से जहरीला रिसाव हो रहा था । जिस आदमी के पीछे वह चल रहा था , वह उस अट्टालिका के अंदर चला गया और दरवाजा स्वतः बंद हो गया ।
यद्यपि चलते - चलते उस आदमी के पांव थक चुके थे , फिर भी उसने उस बंद दरवाजे पर पांव से प्रहार करना शुरू किया । उसने किसी को पुकारा नहीं, किसी से प्रार्थना नहीं की । उस अट्टालिका में कैद प्रकाश की मुक्ति का उसके सामने वहीं रास्ता था।



Monday, August 31, 2009

मकड़ियाँ

'ज्ञानसिंधु' में आपका व्यंग्य 'क्रेडिट कार्ड' पढ़ा। बहुत बढ़िया लगा। बाज़ारवार के चलते क्रेडिट कार्ड की त्रासदी को झेलते आज के मध्यम-निम्न मध्यम वर्ग के आदमी की त्रासदी को रेखांकित करने का प्रयास दो तीन वर्ष पूर्व मैंने अपनी लघुकथा 'मकड़ियां' में किया था। इसे सबसे पहले पूर्णिमा बर्मन जी ने 'महानगर की लघुकथाएं' के अन्तर्गत अपनी वेब पत्रिका "अभिव्यक्ति" में "मकड़ी" शीर्षक से छापा था और अभी गत वर्ष 2008 में कमल चोपड़ा ने अपने वार्षिक संकलन "संरचना" भी इसे शामिल किया है। आपको यह लघुकथा भेज रहा हूँ। क्या आप इसे 'ज्ञानसिंधु' के पाठकों के सम्मुख रखना चाहेंगे ?
मकड़ियाँ
सुभाष नीरव
0अधिक बरस नहीं बीते जब बाजार ने खुद चलकर उसके द्वार पर दस्तक दी थी। चकाचौंध से भरपूर लुभावने बाजार को देखकर वह दंग रह गया था। अवश्य बाजार को कोई गलत-फहमी हुई होगी, जो वह गलत जगह पर आ गया - उसने सोचा था। उसने बाजार को समझाने की कोशिश की थी कि यह कोई रुपये-पैसे वाले अमीर व्यक्ति का घर नहीं, बल्कि एक गरीब बाबू का घर है, जहां हर महीने बंधी-बधाई तनख्वाह आती है और बमुश्किल पूरा महीना खींच पाती है। इस पर बाजार ने हँसकर कहा था, ''आप अपने आप को इतना हीन क्यों समझते हैं ? इस बाजार पर जितना रुपये-पैसों वाले अमीर लोगों का हक है, उतना ही आपका भी ? हम जो आपके लिए लाए हैं, उससे अमीर-गरीब का फर्क ही खत्म हो जाएगा।'' बाजार ने जिस मोहित कर देने वाली मुस्कान में बात की थी, उसका असर इतनी तेजी से हुआ था कि वह बाजार की गिरफ्त में आने से स्वयं को बचा न सका था। अब उसकी जेब में सुनहरी कार्ड रहने लगा था। अकेले में उसे देख-देखकर वह मुग्ध होता रहता। धीरे-धीरे उसमें आत्म-विश्वास पैदा हुआ। जिन वातानुकूलित चमचमाती दुकानों में घुसने का उसके अन्दर साहस नहीं होता था, वह उनमें गर्दन ऊँची करके जाने लगा।
धीरे-धीरे घर का नक्शा बदलने लगा। सोफा, फ्रिज, रंगीन टी.वी., वाशिंग-मशीन आदि घर की शोभा बढ़ाने लगे। आस-पड़ोस और रिश्तेदारों में रुतबा बढ़ गया। घर में फोन की घंटियाँ बजने लगीं। हाथ में मोबाइल आ गया। कुछ ही समय बाद बाजार फिर उसके द्वार पर था। इस बार बाजार पहले से अधिक लुभावने रूप में था। मुफ्त कार्ड, अधिक लिमिट, साथ में बीमा दो लाख का। जब चाहे वक्त-बेवक्त जरूरत पड़ने पर ए.टी.एम. से कैश। किसी महाजन, दोस्त-यार, रिश्तेदार के आगे हाथ फैलाने की जरूरत नहीं।
इसी बीच पत्नी भंयकर रूप से बीमार पड़ गई थी। डॉक्टर ने आप्रेशन की सलाह दी थी और दस हजार का खर्चा बता दिया था। इतने रूपये कहां थे उसके पास ? बंधे-बंधाये वेतन में से बमुश्किल गुजारा होता था। और अब तो बिलों का भुगतान भी हर माह करना पड़ता था। पर इलाज तो करवाना था। उसे चिंता सताने लगी थी। कैसे होगा? तभी, जेब मे रखे कार्ड उछलने लगे थे, जैसे कह रहे हों- हम है न ! धन्य हो इस बाजार का! न किसी के पीछे मारे-मारे घूमने की जरूरत, न गिड़गिड़ाने की। ए.टी.एम.से रूपया निकलवाकर उसने पत्नी का आप्रेशन कराया था।
लेकिन, कुछ बरस पहले बहुत लुभावना लगने वाला बाजार अब उसे भयभीत करने लगा था। हर माह आने वाले बिलों का न्यूनतम चुकाने में ही उसकी आधी तनख्वाह खत्म हो जाती थी। इधर बच्चे बड़े हो रहे थे, उनकी पढाई का खर्च बढ़ रहा था। हारी-बीमारी अलग थी। कोई चारा न देख, आफिस के बाद वह दो घंटे पार्ट टाइम करने लगा। पर इससे अधिक राहत न मिली। बिलों का न्यूनतम ही वह अदा कर पाता था। बकाया रकम और उस पर लगने वाले ब्याज ने उसका मानसिक चैन छीन लिया था। उसकी नींद गायब कर दी थी। रात में, बमुश्किल आँख लगती तो सपने में जाले ही जाले दिखाई देते जिनमें वह खुद को बुरी तरह फंसा हुआ पाता।
छुट्टी का दिन था और वह घर पर था। डोर-बेल बजी तो उसने उठकर दरवाजा खोला। एक सुन्दर-सी बाला फिर उसके सामने खड़ी थी, मोहक मुस्कान बिखेरती। उसने फटाक- से दरवाजा बन्द कर दिया। उसकी सांसे तेज हो गई थीं जैसे बाहर कोई भयानक चीज देख ली हो। पत्नी ने पूछा, ''क्या बात है ? इतना घबरा क्यों गये ? बाहर कौन है ?''
''मकड़ी !'' कहकर वह माथे का पसीना पोंछने लगा।
00

Wednesday, March 25, 2009

युगल की लघुकथा' जूते

जूते
0 युगल
चैतू राजमिस्त्री के साथ का काम करता था । एक दिन सिर पर से ईंट उतारते समय एक ईंट पाँव पर आ गिरी । उँगलियॉ कुचल गई । पत्नि बोली - पाँव मे जूते होते तो उँगलियों नहीं कुचलती ।'' चैतू ने उँगलियॉ में उठती बिच्छु के डंक के समान टीस को दाँत पर दाँत रखकर बर्दाश्त करने की कोशिश की और बोला - "तुम्हें क्या पता कि जूते कितने महंगे हो गये हैं जब पेट चलाना ही दुशवार हो, तो जूते ……… "
पत्नी हल्दी का गरम लेप उसके पाँव पर चुपचाप लगाती रही । पेट चलाना तो सचमुच दुशवार हो रहा था । बेटा पारस बीस साल का था । बडे अरमान से पढ़ाया था । मैट्रिक पास कर गया था । इसलिए उसे मजदूरी करना अच्छा नहीं लगता था । किसी और काम की तलाश भी नहीं करता था ! गाँव के अबंडों के साथ ताश के अड्डे पर जमा रहता । चैतू को जिस दिन काम नहीं मिलता , वह नीम-बबूल के दँतवन तोड कस्बे में बेच आता। आठ -दस रूपये आ जाते । एक दिन वह जूतों की दुकान में गया था । बहुत मामूली जूतों की कीमत इतनी थी कि दो दिनों की मजदूरी सर्फ़ हो जाती । अपने जूते के लिए परिवार के लोगों को दो दिनों तक भूखे रखना………अरे, छोडो, जब इतने दिन कट गये ,तो बाकी भी कट जायेंगे । लेकिन कई रात जूते उस के सपने में आते रहे।सपने में वह अपने पाँवों में जूते डाले चल रहा होता कि उस के पाँव दूसरों के पाँवो में बदल जाते ।उन जूतों को हसरत भरी नजरों से देखता वह चलता रहता कि उस के पाँवों पर ईंट आ गिरती और आंखें खुल जाती।
चैतू की उँगलियों को कुचले दो महीने भी नहीं गुजरे थे कि एक दिन उस के तलवे में शीशे की किरच घुस गयी। खून का बहना रूकते नहीं देख पारस विचलित हो उठा । बाप को कस्बे के अस्पताल में ले गया । उस दिन उस ने शिद्दत के साथ सोचा कि बापू के पाँवो में जूते होने चाहिए । दूसरे दिन ही वह पडोसी के साथ उसी के खर्च से पंजाब चला गया। लौटा दस महीने बाद । बाप के लिए जूते ले आया था। चैतू आँगन में खाट पर लेटा था। बेटे को देख कर माँ हर्षित हुई - "इतने दिनों कहाँ रहे बेटा ! न कोई चिट्ठी ,न कोई पता -ठिकाना।" पारस ने उत्साह के साथ बाप के लिए लाये जूते निकाले । चैतू की आँखें डबडबा आयीं । माँ कुछ क्षणों तक जूते को देखती रही ।फ़िर उसने चैतू के पाँव पर से चादर हटा दी । गैंग्रिन हो जाने के कारण डाक्टर ने वह पाँव काट दिया था ।"

Monday, September 15, 2008

जूते की जात

विक्रम सोनी

उस दिन अचानक धर्म पर कुण्डली मारकर बैठे पण्डित सियाराम मिसिर की गर्दन न जाने कैसे ऐंठ गयी और उन्हें महसूस हुआ कि उनकी गर्दन में 'हूल' पैदा हो गया है। पार साल लखमी ठाकुर के भी 'हूल' उठा था।
अगर रमोली चमार उसके हूल पर जूता न छुआता तो… कैसा तड़पा था। यह सोचकर उन्हें झुरझुरी लगने लगी, तो क्या उन्हें भी रमोली चमार से अपनी गर्दन पर जूता छुवाना होगा। हुँ! वह खुद से बोले ,''उस चमार की यह मजाल!" तभी उनकी गर्दन में असहनीय झटका सा लगा और वे कराह उठे।
"अरे क्या है- बस जरा जूता ही तो छुवाना है। उसके बाद तो गंगा जल से स्नान कर लेंगे । जब शरीर ही न रहेगा चंगा तो काहे का धर्म पुण्य?"
रमोली को देखते ही मिसिरजी ने उसे करीब बुलाकर कहा,"अरे रमोलिया, ले तू हमारा गरदनियाँ में तनिक जूता छुवा हूल भर गइलबा ।"
"ग्यारह रुपया लूँगा मिसिरजी ।"
" का कहले? हरामखोर , तोरा बापो कमाइल रहलन ग्यारह रुपल्ली ?"
"मिसिरजी, इस जूते को कोई खरीदेगा नहीं न! और में झूठ बोल कर बेचूँगा नहीं!"
"खैर, चल लगा जूता, आज तोर दिन है। देख, धीरे छुआना तनिक, समझे!"
जब रमोली जूता लेकर टोटका दूर करने उठा तो उसकी आखों के आगे सृष्टि से लेकर इस पल तक निरन्तर सहे गये जुल्मोसितम और अपमान के दृश्य साकार हो उठे ।
उसने अपनी पूरी ताकत से मिसिरजी की गर्दन पर जूता जड़ दिया । मिसिरजी के मुख से एक प्रकार की डकराहट पैदा हुई, ठीक वैसी ही जब मिसिरजी ने उसके पिता पर झूठा चोरी का इल्जाम लगाया था और मिसिरजी के गुण्डे लाठी से उसे धुन रहे थे। तब बाप की दुहाई वाली डकराहट क्या वह भूल पायेगा ?
"अरे मिसिर देख, तोरा हूल हमार जुतवा मा बैठ गैइल।" और मिसिर की गर्दन तथा चाँद पर लाठियों के समान जूते पड़ने लगे। गाँव वाले हैरान थे, किन्तु विचित्र उत्साह से इस दृश्य को देख रहे थे।

आंधी


चित्रेश

ठाकुर रघुराज सिंह को रमेसरा का रग-ढ़ंग जरा भी न सुहाता था । ऐसा भी क्या हलवाहा कि बस काम से काम । बात - व्यवहार की दमड़ी भर अकल नहीं । ठाकुर अपनी तरफ़ से खेती- बाड़ी की चर्चा छेड़ते तो भी उस चढ़ती उम्र के लौंडे के चेहरे का भकुआपन न दरकता, जबकि रघुराज सिंह इस मौके पर उसके मुँहासों भरे गहरे सावँले चेहरे पर पालतूपन की तरलता देखने का प्रयास करते थे । वे अपना मन समझाने के लिए अक्सर सोचते - अभी जल्दी ही बाप मरा है। गम भूलते ही रास्ते पर आ जायेगा।
मगर रमेसरा ठहरा पक्का बागी। उस दिल हल बैल खूँटे से लगा वह पनपियाव की तैयारी कर रहा था कि सामने से रघुराज सिंह आ गए। उसने कौढ़ भर की डली दिखाते हुए उजब किया, "बाबू साहेब!ठ्कुराइन भखरी के अन्दर से इतना- सा गुड़ भेजकर बगदा देती है। इससे मुँह भी नहीं मिठाता।"
ठाकुर अवाक् ! ऐसी बात कभी नहीं उठी थी। खुद इसका बाप जगेसरा बीस बरस इसी देहरी की गुलामी करके चुपचाप मर गया, लेकिन ये कल का छोकरा कैसी आँखें तरेरे ताक रहा है। लिहाज का नाम - निशान नहीं। मन की कड़वाहट चेहरे की इक्का- दुक्का झुर्रियों को गहराती त्योरियाँ तान गई। इच्छा हुई आज कर ही दे मनहूस का पनहिया सराध! पर जमाने की हवा जरा- सी बात मसले में बदल सकती थी।
अब दीन - ईमान तो रहा नहीं,बस दूसरे को हड़प जाने की नीयत बाँधते बैठे हैं। तिस पर रमेसरा ठहरा अकेला, न बीवी , न बच्चे, माँ का क्या भरोसा, चालीस साल की चामारिन खाँ रंडापा भोगने यहाँ बैठी रहेगी! किसी का घर चोखट करेगी ही । ऐसे मे यह भी गुस्सा में भाग - वाग गया तो।
इस ऊहापोह के बीच उन्हें मरते समय जगेसरा पर बकाया अनाज का सवाई ड़ेढ़ी की बैसाखी पर निरन्तर बड़ा होता ढेर और बदले मैं मिला मजबूत और टिकाऊ हलवाहा गायब होता दिखने लगता है…वे क्षण भर में संभल गए। बनावटी प्रेम से बोले,"देख बेटा, गुड़ की थोड़ाई पर न जा। ईसकी मिठास का ख्याल कर। ऐसी चीजें कोई भर पेट खाई जाती हैं।"
रमेसरा खून का घूँट पीकर रह गया। दूसरी बेला में वह हल लेकर खेत पर पहुँचा और हर एक कुण्ड में कई- कई मरतबा हल चला, खूब गहरी जुताई करने लगा। शाम को टहलते हुए ठाकुर साहब खेत में पहुँचे। मन में दबी गुस्से की आग शोला बनकर बनकर लपक उठी," अरे अब क्या तमाशा देख रहा है? अब तक सारा खेत जुत जाता, मगर तू सिर्फ पन्द्रह -बीस कुंड…"
" बाबू साहेब कुंड काहे गिनते हैं, इसकी गहराई देखें, गहराई।" रमेसरा ने निर्भीक होकर उनकी आँखो में झाँकते हुए जवाब दिया था… और रघुराज सिंह एकदम सन्न रह गए। जमाने की हवा एक बार फिर उन्हें आंधी मे परिवर्तित होती दीख रही थी ।

रुतबा



माधव नागदा

गाँव में दो शादियाँ एक ही दिन थी । सौभाग्यकांक्षिणी ठाकुरपुत्री के बरात आ रही थी , जबकि चिरंजीव चमार की बरात जा रही थी । मह्त्व लगन का उतना नहीं था, जितना कि महारात्रि का । इस रात धूम - धड़ाके और बाजे - गाजे के साथ दुल्हा , दुल्हन की बन्दोली निकलने वाली थी। किसी ने ठाकुर साहब को सूचना दी , "इस बार चमारों की बन्दोली घोड़े पर निकलेगी ।"
ठाकुर साहब पहले ही से मूँछों को बट दे रहे थे । बट खा - खा कर जब मूँछें केकड़े के डंक की तरह हो गयी तो वे बोले , "लट्ठ बाजों को कह देना तैयार रहें ।"
"अरे नहीं ,हुजूर । कानून इन्ही का रखवाला है। आजकल तो सीधा गैरजमानती वारंट आता है । कुछ ऐसी तरकीब भिड़ाई जाय कि अपनी बंदौली का रुतबा ऊँचा रहे।"
"हम माइक वाला बैँण्ड लायेंगे ।"
"हुकुम ,चमार भी वही ला रहे हैं ।'
"तो हम साथ मैं जनरेटर भी लायेंगे। दोनों ओर दस-दस ट्युबलाईटें।"
"बड़ो हुकुम , वे बारह-बारह ला रहे हैं।"
"अच्छा ।" ठाकुर साहब की बायीं मूँछ फड़की । वे कुछ देर सोचते रहे । एकाएक उनकी आँखो में चमक दौड़ गयी, " अपने बाइसा की बंदोली कार में निकालेंगे । है हिम्मत चमारों की ?
" परंतु अन्न्दाता , रास्ता बहुत खराब है , सँकरा है । पिछ्ली बार अकाल राहत का पैसा आया, वह सब तो हवेली में…।"
ठाकुर साहब गाँव के सरपंच भी थे । अकाल राहत के धन ने उन्हें कितनी राहत दी , वे खूब अच्छी तरह जानते थे। इसलिए बोले कुछ नहीं , सिर्फ आँखें तरेरीं और फिर से सोचमग्न हो गये । सोचते -सोचते न जाने क्या बात सूझी कि जोर से हँस पडे। एक दीवारकम्प ठहाका। जब हँसी कुछ रुकी तो पेट थाम कर बोले , "अच्छा ही किया जो हमने मार्ग नहीं बनवाया, वरना ये चमारटे कार भी ले आते," फिर जरा तेज होकर बोले , "रुतबे की ही बात करते हो तो बोलो , हमारे मुकाबले की हवेली है, किसी चमार के पास? बोलो, है?"

Monday, September 8, 2008

चुनौती


भगीरथ
ठुकराई की ठसक रखने वाले सुमेरसिंह ने बादामी के बापू भैरा भांबी को बुलवाया । भैरा 'जै माता जी 'कह आंगन में उकडूँ बैठ गया।
सुमेरसिंह ने जमाने के तेवर भाँपते हुए अपनी ठसक छोड ,समझाईश करने लगे 'देख भैरा,जो हो गया सो तो हो गया, जवानी के जोश में होश कहाँ रहते हैं ,नादानी कर बैठा, नालायक कहीं का, चाहो तो हमारे जूते मार लो लेकिन हमारे बेटे को माफ़ कर दो।
तुम्हारा-हमारा पीढियों से व्यवहार चला आ रहा हैं । हमारें व्यवहार में आग लगाई का कोई फ़ायदा नहीं , आज जो तेरे पीछे खडे है न ,वे कल दिखाई नहीं देंगे
ये शब्द सुमेरसिंह की ठसक को चूर-चूर कर रहें थे , उसके अहंकार और श्रेष्ठता को आहत कर रहे थे ,लेकिन क्या करें ,समय ही ऐसा है।
बादामी का बापू चुप्प ,बोले तो क्या बोले ? हमेशा 'हाँ हुकुम ' कहता रहा है। ठाकुर कों गिडगिडाते देख उसे अच्छा लगा, उसके कलेजे में ठंडक पड गई । ह्र्दय कह रहा था बिचारा मांफ़ी माग रहा है, माफ़ कर दो। कैसे माफ़ कर दे सुमेरसिंह के बेटे को जिसने सरेआम हथियार बंद खुली जीप में बदामी को उठा लिया, कैसे माफ़ करें उस हरामी के पिल्ले को, जिसने उसकी इज्जत पर सरेआम हाथ डाला। कोई माफ़ी-वाफ़ी नहीं ।युगों से चला आ रहा यह अत्याचार और अपमान, अब यहीं रूकेगा। सोचते -सोचते उसका चेहरा सख्त हो गया ।ठाकुर ने बादामी के बापू का प्रतिक्रियाहीन सख्त चेहरा देख पेंतरा बदला । 'ठीक है, फ़िर यह जंग भी लड़ के देखलो। हाँ इतना जान लो कि चाकू और खरबूजे की जंग में , पेट खरबूजे का ही फटता है, बाप होकर बेटी की बदनामी करवा रहे हो, अब तो बात अखबारों तक पहुँच गई है , बदनामी तो गाँव की बेटी की हो रही है न ।
पूरा दलित समाज बदामी के बापू के पीछे खड़ा है। अब तो यह पूरे दलित समाज के मान-सम्मान की लडाई हो गई है। दलितों के जत्थे-के-जत्थे थाने के आगे धरने पर नहीं बैठते तो क्या पुलिस एफ़.आई.आर. लिखती ? उग्र रैली नहीं निकली होती तो क्या इस घटना को अखबार में जगह मिलती ?
इस आंदोलन को बढ़ते देख दलित मंत्री और विधायक भी बिन मांगे समर्थन दे रहे हैं । सरकार पर दबाव बन रहा है। गिरफ़्तारी तो हो ही गई, अब जमानत भी नहीं होगी । बिना लडें तो इनके अभिमान ,श्रेष्ठता और उच्चता की गांठे टूटेगी भी नहीं । सम्मान पाना है, तो लड़ना तो होगा ही । लड़ने के तमाम जोखिम उठाने ही पडेगे । यह सोचते हुए भैरा भांबी चुनौती की मुद्रा में खडा हो गया। ।
'