Showing posts with label साहित्य समाचार. Show all posts
Showing posts with label साहित्य समाचार. Show all posts

Sunday, October 3, 2010

नाटककार शिवराम नहीं रहे




एक अक्टूबर
को अचानक हृदयाघात से उनकी मृत्यु हो गई । वे 61 वर्ष के थे और उर्जा से भरपूर , जन - जन के लिए संघर्ष करने को तत्पर वे एक कुशल संगठनकर्ता , वक्ता और नाटककार थे । सीटू और सी.पी.एम. से आरम्भ कर राजस्थासीटू और एम. सी.पी. आई की यात्रा पूरी की वे एम.सी. पी. आई . के पोलतब्यूरों के सदस्य थे। विकल्प जनवादी सामाजिक सांस्कृतिक मोर्चा के वे राष्ट्रीय अध्यक्ष थे , उनके जीवन काल में उनकी ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित हुई । साहित्य में वामपंथी रूझान वाले सभी संगठनों को साझा मंच पर लाने का वे अथक प्रयास करते रहे।
वे नाटककार तो अच्छे थे ही, कुशल अभिनेता भी थे । वे अपने परिवार में भी प्रिय थे उनका व्यवहार पारावारिक सदस्यों से मित्रता का था ऐसे आत्मीय जन का बिछुड़ना हृदय को दुख से भर देता है। मैं उन्हें हार्र्दिक श्रृद्धांजली अर्पित करते हुए उनके परिवार के प्रति आत्मीय संवेदना प्रकट करता हूW।
नाट~य संस्था ‘पलाश’ और ज्ञानसिंधु अपने श्रृद्धा सुमन उन्हें अर्पित करता है।




Wednesday, September 15, 2010

गोविन्द गौड नहीं रहे ।


गोविन्द गौड ने यूं तो कविता से ही लेखन प्रारम्भ किया , किन्तु वास्तविक पहचान कथाकार के रूप में ही बनाई। दैनिक मिलाप, वीर प्रताप, सारिका, समांतर, आघात, दिव्य आहूति, सूजन, युवा हस्ताक्षर , आत्मविश्लेषण, आगामी , राजस्थान पत्रिका, लोकशासन आदि देश की कई पत्र पत्रिका , लोकशासन आदि देश की कई पत्र. पत्रिकाओं इनकी रचनाए प्रकाशित हुई है।
लघुकथा एवं लघुपत्रिका आंदोलन से सम्बद्व रह कर, रावतभाटा, स्लापर हि.प्र. पानीपत, कोटा से क्रमश: चन्दिका, संवाद, हिमस्नेह, राकेश दीप तथा कदम्बगंध पत्रिकाओं का सम्पादन किया ।
इनका एक कहानी सन्ग्रह असमांतर व लघुकथासंगह ‘प्रहार प्रकाशित हो चुका है । यह सन्ग्रह प्रहार लघुकथा के कारवां को आगे बढ़ाने में निश्चत ही मूल्यवान साबित होगा।
अन्तिम दिनों में परिवारजनों विशेषत: पत्नी से प्रताड़ित थे, और रात दिन उनके षड़यंत्रों से वे चिंतित रहते थे, कि वे अति मानसकि तनाव के शिकार हो गये , जब भी मिलते इसकी विषय पर वे घंटो बोलते रहते । समस्या सुलझाने के प्रयत्न मित्रों ने किये भी लेकिन वे सब असफल रहे । वे शारीरिक व मानसिक रूप से कमजोर होते गए व 18 अगस्त 2010 को इस जग से विदा हो गये।
दिवंगत आत्मा को हमारी ओर से व मित्र लेखकों की हार्दिक श्रद्धांजलि।

Friday, May 21, 2010

श्याम कुमार पोकरा के कहानी संग्रह 'माँ का आँचल' का लोकार्पण

(दाएं से बाएं दिलीप भाटिया , मनोज कुमार शर्मा , राधेश्याम मेहर , विजय जोशी,भगीरथ, हंसराज चौधरी)








श्याम कुमार पोकरा के कहानी संग्रह "माँ का आँचल " का लोकार्पण दिलीप भाटिया , मनोज कुमार शर्मा, राधेश्याम मेहर , विजय जोशी, भगीरथ, हंसराज चौधरी ने किया इस अवसर पर बोलते हुए भगीरथ ने कहा कि श्याम पोकरा ग्रामीण अँचल के कथाकार हैं । इनकी कहानियों के परिवेश व भाषा में गांव बसा है । सामाजिक सरोकारो से ओतप्रोत होती 'आम का पेड़ , दादी माँ , भ्रूण रक्षा , व माँ का आँचल इस संग्रह की विशिष्ट कहानियाँ हैं 'दाढ़ देवी' कहानी की अपेक्षा सिने पटकथा ज्यादा लगती है 'खप्पर' जबरदस्त कथा है जो अंधविश्वास को उघाड़ते - उघाड़ते उसे पुख्ता कर देती है । लेखक को ऐसे मौको पर सचेत रहने की जरुरत है । वरिष्ठ कथाकार राधेश्याम मेहर ने श्यामकुमार पोकरा से अपने सबंधों का खुलासा करते हुए उनके सरल और आत्मीय स्वभाव से सभी को परिचित कराया । युवा कथाकार विजय जोशी ने प्रतिभावान रचनाकार श्याम पोकरा को बधाई देते हुए कहा कि हर वर्ष कम से कम इनकी एक पुस्तक अवश्य प्रकाशित होती है इनकी सर्जना को सलाम करते हुए आशा व्यक्त की कि उनकी सर्जनात्मकता और आगे तक जायेगी।

Thursday, October 8, 2009

अन्तर्राज्यीय लघुकथा सम्मेलन 3 अक्टूबर 2009

अठारवां अन्तर्राज्यीय लघुकथा सम्मेलन 3 अक्टूबर 2009 , युवक साहित्य सदन, सिरसा , हरियाणा में आयोजित हुआ यह सम्मलेन पंजाबी त्रैमासिक ‘भिन्नी’ एवं हरियाणा साहित्य अकादमी के संयुक्त तत्वावधान में हरियाणा लेखिका मंच , के सहयोग से सम्पन्न हुआ ।
पहले सत्र के अध्ययक्ष मंडल में डा. मुक्ता अरोड़ा, निदेशक , हरियाणा साहित्य अकादमी , डा अनुपसिहं , उपाध्यक्ष, पंजाबी साहित्य एकादमी, सुकेश साहनी प्रसिद्ध लघुकथाकार , डा. आर. एस. सांगवान, व सुखवीर जैन थे
इस सत्र में डा कुलदीप ‘दीप’ व डा. रामकुमार घोटड ने अपने पत्र का वाचन किया जिस पर बाद में विचार विमर्श हुआ ।डा अनूपसिहं की पुस्तक ‘भिन्नी कहानी लेखकां नाल कुछ खरीआं खरीआं’,। डा. रामकुमार घोटड की पुस्तक ‘लघुकथा विमर्श व ‘मिन्नी’ के हरिशंकर परसाई विशेषांक का विमोचन किया गया।


(सम्मानित व्यक्तियों के साथ अध्यक्ष मंडल)

माता शरबती देवी स्मृतिसम्मान वरिष्ठ लघुकथाकार श्री भगीरथ , श्रीमती महादेवी कौशिक पुरस्कार - सुश्री अंजु दुआ जैमिनी, व चौधरी मोहरसिहं काम्बोज पुरस्कार डा. बलदेव सिहं खहिरा को प्रदान किया गया
द्धितीय सत्र ‘जुगनुओं दे अंग संग में 50 हिन्दी व पंजाबी के लेखकों ने लघुकथा पाठ किया तथा प्रत्येक रचना पर विचार विमर्श हुआ यह सत्र सुबह चार बजे समाप्त हुआ । इस सत्र का संचालन श्यामसुन्दर अग्रवाल व डा रमासुन्दर दीप्ति ने किया , चर्चा में मुख्यतः रामेश्वर हिमांशु कम्बोज , सुकेश साहनी, अशोक भाटिया , विक्रमजीत नूर हरभजन खेमकरनी , निरंजन बोहा ने भाग लिया।
डा. शील कौशिक व डा. रूपदेव गुण के अथक प्रयत्न से यह आयोजन सिरसा के लिए एक उपलब्धि बन गया ।

Wednesday, September 30, 2009

लोकार्पण

शिवराम के नाटक के लोकार्पण पर ली गई तस्वीरें । देर से प्राप्त

बाएँ से - महेंद्र नेह, मंजरी वर्मा , शिवराम , रविन्द्र कुमार रवि , नरेन्द्र नाथ चतुर्वेदी , शैलेश चौहान
दर्शक दीर्घा
लोकार्पण की पूरी रिपोर्ट पिछ्ली पोस्ट में पढ़े ।

Monday, September 21, 2009

शिवराम के नाटक - पुनर्नव , गटक चूरमा का लोकार्पण

शिवराम के नाटक - पुनर्नव , गटक चूरमा का लोकार्पण

20 सितम्बर 2009 को कोटा की कला दीर्घा में शिवराम के दो नाट्य संग्रहों पुनर्नव व गटक चूरमा का विमोचन डा. ‘रविन्द्र कुमार रवि’ , अध्यक्ष विकल्प अखिल भारतीय जनवादी , जनसांस्कृतिक - सामाजिक मोर्चा, डा. मंजरी वर्मा , शैलेश चौ
हान व नरेन्द्र नाथ चतुर्वेदी ने किया इस अवसर पर बोलते हुए डा. रवि ने कहा कि जिस तरह चन्द्रधर शर्मा गुलेरी मात्र एक कहानी ‘उसने कहा से ’ प्रसिद्ध हुई ठीक उसी तरह शिवराम ‘जनता पागल हो गई’ नाटक से लोकप्रिय हुए। शिवराम सन् 1973 से ही नुक्कड़ नाटक लिख
रहे हैं वे ‘नुक्कड़’ नाटक
के प्रणेता भी हैं और पुरोधा भी । विभिन्न नाट्य रूपों को शिवराम ने अपने नाटकों में सम्मिलित किया है। ये नाटक प्रकाशित होने से पहले सैकड़ों बार देश के विभिन्न क्षेत्रों में खेले जा चुके हैं
डा. मंजरी वर्मा ने कहा कि बिहार के सदूर गावों में इन नाटको का प्रभाव
देखने योग्य है। दुलारी बाई नाटक को देखकर गाँव के लोंगों ने यह निर्णय लिया कि अब कोई भी इस गाँव में शादी के अवसर पर न तो तिलक देगा न तिलक लेगा । शिवराम के नाटक जनता में चेतना जगाने में समर्थ हैं ।
समारोह सभा के अध्यक्ष डा. नरेन्द्र नाथ चतुर्वेदी ने कहा कि जब वे एडीएम थे तब उन्होनें एक नाटक लिखा था जिसे राजस्थान साहित्य एकादमी ने पुरस्कृत भी किया। इसके बावजूद मुझे कोई नाटककार के रूप में
नहीं पहचानता जबकि शिवराम को कोई भी एकादमी पुरस्कार नहीं मिला है फिर भी हिन्दी क्षेत्र में वे एक लोकप्रिय
नाटककार के रूप में जाने जाते हैं ।



शिवराम को हिंदी में नुक्कड़ नाटक आंदोलन के प्रणेताओं में माना जाता है। इनका नाटक ‘जनता पागल हो गई है’ हिंदी के शुरूआती नुक्कड़ नाटकों में शुमार किया जाता है यह हिन्दी का सर्वाधिक खेला जाने वाला नुक्कड़ नाटक है शिवराम के कई नाटक अन्य भाषाओं में अनूदित होकर भी खेले गए हैं। नाट्य लेखन के साथ वे एक कुशल निर्देशक और अभिनेता भी हैं।
हिन्दी साहित्य की महत्वपूर्ण पत्रिका ‘अभिव्यक्ति’ का , पिछले 33 वर्षो से सम्पादन ।
‘विकल्प’ अखिल भारतीय जनवादी सांस्कृतिक - सामाजिक मोर्चो के महासचिव


गटक चूरमा में संग्रहित नाटक

1 बोलो - बालो हल्ला बोलो , ढम ढमा ढम ढम , गटक चूरमा व हम लड़कियाँ शिवराम

पुनर्नव में संग्रहित कहानियों के नाट्य रूपान्तर

1 प्रेमचन्द की कहानियाँ - ठाकुर का कुँआ , सत्याग्रह , ऐसा क्यों हुआ

रिजवान जहिर उसमान की कहानी ‘खोजा नसरूद्दीन बनारस में’ व नीरज सिहं की कहानी ‘क्यों’ का नाट्य रूपान्तर , वक्त की पुकार इस संग्रह में संग्रहित है।

Sunday, August 9, 2009

डा. शकुंतला किरण की शोध पुस्तक ‘हिन्दी लघुकथा ’ का लोकार्पण

डा. शकुंतला किरण की शोध पुस्तक ‘हिन्दी लघुकथा ’ का लोकार्पण दिनांक 26 जुलाई 2009 , जवाहर आडोटोरियम, अजमेर में लघुकथा के वरिष्ठ कथाकार भगीरथ व बलराम अग्रवाल ने किया , साथ ही उनकी ही कविता की पुस्तक ‘ एहसासों के अक्स ’ का लोकार्पण कुमार शिव व ताराप्रकाश जोशी ने किया ।
इस अवसर पर बोलते हुए प्रो. अनन्त भटनागर ने कहा कि यह एक प्रामाणिक शोध प्रबंध है , जिसमें लेखिका का श्रम स्पष्ट झलकता है । हिन्दी लघुकथा के साथ - साथ अन्य भाषाओं की कथाओं का लेखा -जोखा भी लेखिका ने प्रस्तुत किया है । उन्होनें पुस्तक के पहले ,चौथे और पांचवे अध्याय का विशेष उल्लेख करते हुए कहा कि पहले अध्याय में उन राजनैतिक , सामाजिक , आर्थिक परिस्थितियों का वर्णन किया गया है जो लघुकथा के उदय में महत्वपूर्ण साबित हुई है लघुकथा के तात्विक विवेचन में उन्होने परिभाषा , बोधकथा , भावकथा , दंतकथा , लतीफा, कहानी आदि की अवधारणा को स्पष्ट किया है । पाँचवे अध्याय में लघुकथा की विशेषताओं और छठे में जीवन मूल्यों पर चर्चा की है ।
‘हिन्दी लघुकथा ’ पर आगे चर्चा करते हुए बलराम ने कहा कि शोध का विषय सन् 1975 में ही स्वीकृत हो गया था और 1981 तक थिसिस स्वीकृत भी हो गई थी लेकिन प्रकाशन करीब तीन दशक बाद हुआ । इस महत्वपूर्ण पुस्तक को प्रकाशन के प्रति लेखिका उदासीन ही रही । लेकिन जब इन्दौर के डा. सतीश दुबे ने बताया कि आपकी शोध के अंशों की चोरी होती जा रही है तो मित्रों के आग्रह पर उन्होने इसे अन्ततः प्रकाशित करने का मन बनाया ,
सौभाग्य का विषय है कि प्रथम लघुकथा संग्रह ‘गुफाओं से मैदान की ओर’ के सम्पादक भगीरथ व ‘हिन्दी लघुकथा’ की पहली शोध पुस्तक की लेखिका डा. शकुन्तला किरण आज दोनों मंच पर विराजमान है और दोनों राजस्थान से है । हमारे लिए यह गर्व का विषय है । इस पुस्तक की सबसे महत्वपूर्ण बात है कि जो मानदंड डा. शंकुतला किरण ने दिये वे आज भी लघुकथा में मान्य है ।
चर्चा को आगे बढ़ाते हुए भगीरथ ने कहा कि यह पुस्तक गहन अध्ययन , मनन , चिंतन व विशलेषण का परिणाम है । ऐसे समय जब लघुकथा आकार ग्रहण कर रही थी , जब साहित्यकार इसका नाम आते ही नाक - भौं सिकोड़ते थे , विश्वविद्यालय द्धारा इस विषय को स्वीकृती देना निश्चय ही महत्वपूर्ण रहा । इसके लिए शोधार्थी एवं राज. विश्वविद्यालय धन्यवाद के पात्र है । इनका शोध काॅपी - पेस्ट या कट - पेस्ट नहीं है जैसे कि डाॅ भटनागर ने कहा यह एक प्रमाणिक ग्रन्थ है । लघुकथा जगत में इस पुस्तक का जबरदस्त स्वागत हो रहा है और आगे के शोधार्थी इस पुस्तक के सन्दर्भ के बिना अपना शोध पूरा न कर पायेंगे । यह आलोचना की सबसे महत्वपूर्ण पुस्तक है जिसका आने वाले कई वर्षो तक लघुकथा विमर्श में विशिष्ट स्थान रहेगा ।
डा. शंकुतला किरण ने अपने वक्तव्य में कहा कि वह लघुकथा की तरफ तेजी से आकृष्ट हुई और लघुकथा लेखन में संलंग्न हो गई । जब शोध के विषय के चयन की बात आई तो सबसे पहले मानस पर लघुकथा का विषय ही रहा । वह लघुकथा जगत से जुड़ी हुई थी इसलिए संदर्भ सामग्री के लिए ज्यादा मुश्किल नहीं पड़ी , जब आपातकाल के दौरान ‘सारिका’ के लघुकथा विशेषांक की कई रचनाओं पर सेंसर ने काली स्याही पोत दी तब उन्हें लगा कि यह एक शक्तिशाली विधा है , और वह इस शोध पर जुट गई । व्यवस्था के विकृत रूप देखने हो और उनके प्रति आक्रोश व्यक्त करना हो तो लघुकथा एक सशक्त विधा है। प्रकाशन में देरी के कारण बताते हुए कहा कि सक्रिय राजनीति और फिर आध्यात्म की ओर झुकाव ने उन्हें साहित्य के प्रति उदासीन बना दिया था लेकिन अब ‘ अहसासों के अक्स ’ कविता संग्रह और ‘ ‘हिन्दी लघुकथा ’ के प्रकाशन के साथ ही पुनःसाहित्य में प्रवृत हूँ क्योंकि अध्यात्म की तरह साहित्य भी सुकून देता है