Wednesday, March 10, 2010

कानूनी किताबों के बारे में


कानूनी किताबों के बारे में

जरा ऊंची देकर पटखनी दो तब कहीं जाकर कमाई होती है,कानूनी किताबों के भरोसे कमा खाना यहॉं असम्भव है। मुवक्किल ही तुम्हारा मुर्गा है और मुवक्किल ही तुम्हारी मुर्गी तुम चाहो तो मुर्गा काट लो और तुम चाहो तो मुर्गी के अण्डे खाते रहो ,जैसा उचित समझो।

एफ.आई.आर दर्ज होते ही या गिरफतारी होते ही मुजरिम वकील की टोह लेता आपके पास आयेगा,आपका फर्ज है कि उसे बैठने को कहे,उसे पीने को पानी दें,साथ ही तसल्ली दें आवश्वस्त करें की घबराने की बात नहीं है,अभी निपटा देते है।

जैसे ही वह आस्वस्त हो उसे आई .पी .सी.के प्रावधान बताएं और तफसील से बताए,कि इस जुर्म में कम से कम तीन साल की जेल होगी हाकिम के कर्रा होने के किस्से सुनाएं। डी.वाई.एस.पी. के ईमानदार होने के वाकिए बताए। और बताए कि यह काम बहुत मुश्किल है,पुलिस पर राजनैतिक दबाव लाना होगा,हथकड़ी तो लगेगी,पुलिस रिमांड मांगेगी,हाकिम जे.सी. देगा और चार्जशीट भी पुखता तय करेगी पुलिस।

लेकिन चिंता करें,मैं जो हूं,आप निश्चिंत रहे आखिर वकालात कर रहे हैं भाड़ नहीं झौंक रहे है। फिर उसे चाय पिलाए,पीने को सिगरेट दें और उसके साथ आए लोगों को आश्वस्त करें कि आपने किस तरह इससे भी कठिन केस मुजरिम के हक में हल करवाएं है।

स्टडी में रखी हजारों किताबों की तरफ इशारा करे,एक दो खोल कर देख लें और कहें कि आपको रिलीफ मिलेगा। हालांकि कोई वकील गारंटी नहीं देता,लेकिन आप आश्वस्त रहें, मुझे पूरा विश्वास है आपको रिलीफ मिलेगा।

इतनी सुनने पर वह उबने लगेगा, उसे जल्दी है, उसे तुरन्त मुद्‌दे पर आने की जरूरत है, वह पूछेगा इसमें कितना पैसा लग जायगा। आप पूछें कि केस थाने में सलटाना है या कोर्ट में।

वकील साहब,आप थाने चलिए,पुलिस ने उसे अपनी कस्टडी में ले रखा है,पुलिस बेरहमी से मारती है वह घबड़ा जायेगा , पहले उसे देखिए बाद की बात बाद में देखेंगे। आप तुरन्त रवाना हो फोन पर थानेदार से बात करें और बताएं कि आप रहे हैं। पूछें कितने रूपये लेकर आये हो वे एक -दूसरे की तरफ देखेंगे,एक आध अपनी अंटी की तरफ देखेगा तगड़ी पार्टी होगी तो बोलेगी कितना लगेगा,आप कहें अभी पॉंच हजार दे दें बाकि की बात बाद में कर लेगें।वे तीन निकाल कर देंगे।

थाने जाएं,थानेदार से बात करें,मुजरिम के सगे से कहे,साहब के लिये ठण्डा लायें,सिगरेट का पेकेट लायें, थानेदार कर्रा पड जायेगा।मैं कुछ नहीं कर सकता आप साब से बात कर लें।

आप डी.वाई.एस.पी.की चेम्बर में जाएं कुछ और बात करें बाहर निकल कर अपने मुवक्किल के हमदर्द को बताएं ,वह बात थानेदार की पहुंच से बाहर चली गई है।इस तीन हजार से आपका काम नहीं होगा।और जेब से तीन निकालकर उनके हाथ में रख दें। वे नहीं नहीं कर ्पैसे आपको लौटा देंगे और अन्टी से दो हजार निकाल कर आपके हाथ में दे देंगे उनसे कहें आप बाहर बैठें,मैं मुजरिम से बात करूंगा,कॉंपते मुजरिम को तसल्ली दें। अभी बाहर निकलवाता हूं घर वाले खाना लेकर आएं है लेकिन पुलिसवाला उन्हें खाना नहीं देने देता है।कस्टडी में जहॉं हे वही कोने में मूत रहा हे,दुर्गन्ध रही है फिर मिलें थानेदार से चुपके से,दो हजार उन्हें दे,फिर मुजरिम को छुड़ा कर,उसके हमदर्द के हवाले कर दें,और ताकिद कर दे कि सुबह सात बजे के पहले मुजरिम फिर थाने में हाजिर हो जाएं यहॉं से पुलिस उसे कोर्ट में पेश करेगी। जब पक्की हामी भरें तो उसे जाने दे।

कस्टडी में पिटाई नहीं होती है तो उसकी रेट है,आरोपी से मिलने का भी रेट है,थाने के परिसर में घूमने की रेट चाय समोसे,सिगरेट मंगा कर खा पी सके इसके लिए जेब में पैसे रखने की छूट है मगर चार्ज है कि थाने के सभी कर्मचारी /सिपाही चाय वगैरह पीयेंगे।बिना हथकडी लगे कोर्ट में पेश होना है या हथकडी लगाकर गली - घूमाकर थाने ले जाने में जो भी पसन्द है इसकी छूट भी पुलिस देती है

कोर्ट परिसर में पॉंव रखते ही हाकिम, पी.पी.,पेशकार,बाबू,मुंशी और चपरासी सबके नाम के पैसे प्राप्त करें फिर अपनी फीस भी प्राप्त करें सबके नाम का पैसा लेने से एक फायदा यह होता है कि मुवक्किल को तसल्ली हो जाती है कि अब यह काम होगा।बताइये यह कमाई कानूनी किताबों से हो सकती है।क्या कानूनी किताबों में इस कमाई की तरफ कोई ईशारा किया गया है।

बेहतर तो यह है कि किसी न किसी हाकिम से आपकी सेटिंग हो तब प्रेक्टीस ऐसी दौड़ेगी कि ब्रेकर लगाने पर भी नहीं रूकेगी।

संगीन मामला अगर महीने में एकाध भी हाथ लग जाये तो महीनों की कमाई खरी हो जाती है। हाकिम,पी.पी और पेशकार से सेटिंग रखने के लिए मोटी पुस्तके काम नहीं आती है ही कानूनी दलीलें हकिम की त्यौहार पर भेंट पूजा करें,दावत आदि पर बुलाते रहें रोज कुछ कुछ कमाई करवायें तब आपका दबदबा और रूआब बनेगा। इतना ही नही कि आप थाने और कचहरी तक ही अपने आप को सीमित कर ले,आजकल मुखय राजनैतिक पार्टियों में आपके टाउट होने चाहिए जो आपकों केस ही लाकर नहीं देंगे बल्कि वक्त जरूरत राजनैतिक दबाव लाने में भी आपकी मदद करेंगे, राज किसी पार्टी का हो,आपको हर पार्टी अपना समझे।कई काम तों मेल मिलाप से ही निपट जाते है। खासतौर से समझोते करवानें में यह कला काम आती है और केस के फैसले तक आपको इन्तजार नहीं करना पडता,पता नहीं ऊँट किस करवट बैठे अतः समझौते करवा लो कोर्ट भी हमेशा समझोते के हक में रहती है हाकिम को फ़ैसले नहीं लिखने पडते और फाईल निपट जाती है टारगेट पूरे हो पाते और प्रमोशन लेकर उपर की कोर्ट में चले जाते है।

कानूनी पुस्तके वकील का गहना है जो मुवक्किलों पर रौब मारने के काम आता है या यू कहें उन्हें फॉंसने के काम में आता है अब मुवक्किल भी बेवकूफ नहीं रह गये है वे तहकीकात करते हैं कि कौनसे वकील की सबसे अच्छी सेटिंग है और कौन उन्हें रिलिफ दिलवा सकता है।

 

 

 

 

 

 

Wednesday, January 20, 2010

डॉ कुमार विनोद की गज़लें

कुमार विनोद

डॉ कुमार विनोद की गज़लें

हाल ही के वर्षों में जिन ग़ज़लकारों ने हिंदी ग़ज़ल के राष्ट्रीय परिदृश्य पर बेहद प्रभावी ढंग से अपनी सार्थक उपस्थिति दर्ज की है - युवा ग़ज़लकार कुमार विनोद उनमें से एक हैं। कुमार विनोद की ग़ज़लें हंस, नया ज्ञानोदय, वागर्थ, कथन, कथादेश, कथाक्रम, कादम्बनी, उद्भावना, बया, अन्यथा, प्रगतिशील वसुधा, वर्तमान साहित्य, हरिगन्धा, समावर्तन, समकाकलीन भारतीय साहित्य, आजकल, अक्षर पर्व इत्यादि पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। लेखन कर्म में पूरी गम्भीरता और मनोयोग से लगातार सक्रिय, कुमार विनोद की कविताओं का एक संग्रह कविता ख़त्म नहीं होती 2007 में प्रकाशित हो चुका है और अभी हाल ही में आधार प्रकाशन से इनका पहला ग़ज़ल-संग्रह बेरंग हैं सब तितलियाँ प्रकाशित हुआ है। कुमार विनोद के इसी संग्रह बेरंग हैं सब तितलियाँ से कुछ गज़लें...

1

अनकहे शब्दों से मुझको प्यार है

जिनसे खुलने को नया संसार है

पूछ मत, मेरी उदासी का सबब

देख, मेरे हाथ में अख़बार है

रंग ख़ुशियों का किसे मालूम है?

दर्द का भी क्या कोई आकार है?

मैं कहाँ ख़ुद से मिला हूँ दोस्तो!

बीच में शायद कोई दीवार है

पेट भूखे का भरे जिस दिन कभी

दिन वही उसके लिए त्योहार है

लोमड़ी के गुण सभी क्यों गा रहे?

शेर का उजड़ा-सा क्यों दरबार है?

ख़ौफ़ की बारिश मुसलसल हो रही

भीगता-सा हर बशर लाचार है

2

धड़कनो को छेड़ता है साज़ रह-रह कर

कौन मुझको दे रहा आवाज़ रह-रह कर

क्या परिंदों को नहीं लगता ज़रा भी डर

खोलते हैं क्यों हवा के राज़ रह-रह कर

नासमझ कितनी है देखो, बेपरों से भी

माँगती है जिन्दगी परवाज़ रह-रह कर

पाँव मंजिल तक वो पहुँचे, जो सफ़र में थे

एक हम करते रहे आग़ाज़ रह-रह कर

मॉल कल्चर में हर इक छोटी दुकाँ को अब

सीखने होंगे नए अंदाज़ रह-रह कर

3

ख़्वाब आँखों में हमारी इस तरह हँसते हुए

जैसे अँधियारे में दीपक दूर तक जलते हुए

याद उनकी जब कभी आए, हमें ऐसा लगे

धड़कनों की रहगुज़र में, साज़ हों बजते हुए

घर मेरा अपनी जगह है अब भी क़ायम दोस्तो

उम्र गुज़री इस ज़मीं को घूमते-फिरते हुए

वक़्त के दामन को जो ना ठीक से पकड़ा किए

हम उन्हें देखा किए हैं हाथ फिर मलते हुए

इक यही बस बात अपनी दूसरों से है अलग

भीड़ में सबसे अलग हैं, भीड़ में रहते हुए

Friday, January 8, 2010

प्रश्न पत्र


प्रश्न पत्र
कक्षा - दशम विषय - राजनीतिशास्त्र
निर्देश - उत्तर व्यवहारिक ज्ञान पर आधारित है न कि किताबी ज्ञान पर।
प्रश्न 1)मक्खियाँ गुड पर इकट्ठी होती है इसी तर्ज पर बताइये कि विधायक कहाँ इकट्ठे होते है ? गलत पर टिकमार्क करो
अ)जहाँ सत्ता हो। ब)जहाँ धन हो। स)जहाँ पद हो। द)जहां सिध्दाँत हो।
प्रश्न 2)एक पार्टी से डरकर विधायक दूसरी ्पार्टी में कब जाते है ?गलत पर टिकमार्क करो
अ)जब अपनी पार्टी मलाई नहीं दे पा रही हो ।
ब)जब दूसरी पार्टी मंत्रीपद का आँफ़र दे रही हो ।
स)जब दूसरे की थाली में घी ज्यादा नजर आता हो ।
द)जब अपनी पार्टी आपको सिध्दाँत विरुध्द व्यवहार करती नजर आती हो ।
प्रश्न3) विरोधी दल का नेता सत्तापक्ष में कब काँटा डालता है? गलत पर टिकमार्क करो
अ)जब उसे मुख्यमंत्री की कुर्सी स्पष्ट नजर आती हो ।
ब)जब सत्तापक्ष के कुछ विधायक बिक्री के लिए उपलब्ध हो ।
स)जब सिध्दाँतों की आड लेकर सत्ता पक्ष को पटखनी देनी हो।
द)जब जनता की सेवा करने की भावना उमड पडी हो ।
प्रश्न 4) विधायक या सांसद की बिक्री के विनिमय में क्या आफ़र किया जाता है ? गलत पर टिकमार्क करो
अ)मंत्री पद ब)निगम की अध्यक्षता स)एक करोड़ की थैली द)सामाजिक न्याय
प्रश्न 5) जो विधायक विरोधी दल के नेता या सत्तापक्ष के नेता के जाल में नहीं फ़ँस पाते उन्हें कैसा महसूस होता है? गलत पर टिकमार्क करो
अ)तड्फ़डाते है कि हाय मैं क्यों नहीं फ़ँसा ?
ब)कोई बात नहीं भविष्य में फ़िर ऐसे अवसर आएँगे
स)अच्छा हुआ नहीं गये , नही तो पब्लिक थू-थू करती
द)सार्वजनिक जीवन में स्वच्छता और नैतिकता भी कोई चीज होती है
प्रश्न 6) कौनसी परिस्थिति दल बदल करने वाले विधायक को रास नहीं आयेगी
परिस्थिति नंबर 1 - दल बदल के बाद अगर सरकार बन जाए और मंत्री पद से नवाजा जाय, तो समझो सात पीढी तर गई।
परीस्थिति नंबर 2 - राष्ट्र्पति शासन लग जाए ,न माया मिली न राम तो समझों फ़ँस गये ।
परिस्थिति नंबर 3 - अपनी पार्टी अलग बनाकर तीन-चार विधायक कों जीता दो फ़िर मगरमच्छों को फ़ाँसते फ़िरों ।
प्रश्न 7) इस रहस्य से पर्दा उठाइयें कि चुनाव के पहले उम्मीदवार हाथ जोडे वोटर के पास जाता है और दयनीय मुद्रा में वोट मांगता है और चुनाव जीतने के बाद लोग उसके घर / आफ़िस के आगे हाथ जोडे खडे रहते है क्यों ? इसमें जनतंत्र का कौन - सा सिध्दांत लागू है ? बताइये
प्रश्न 8) इन्कमटेक्स विभाग या सी बी आई सरकार के किस काम आती है - कामनसेंस से उत्तर दो ,गलत पर टिकमार्क कीजिए।
1)इन्कमटैक्स वसूल करने के लिए ।
2)अपराधियों का पता लगाने के लिए ।
3)राजनैतिक विरोधियों के यहाँ छापा डलवाने के लिए ।
4) सरकार की पोल खोलने वाले पत्रकारों एवं मिडिया संगठन पर छापा डलवाने के लिए या जेल की हवा खिलवाने के लिए ।
5) अपनी ही पार्टी के विरोधियों की बोलती बंद करने के लिए ।
प्रश्न 9) कुत्ता भौंकना कब बंद करता है ?
1)जब हड्डी डाली जाती है ।
2)फ़िर भी बीच - बीच में चिल्लाए तो बोटी डाली जाती है
कृपया बताइये कि विधायक के लिए हड्डी क्या है और बोटी क्या फ़िर भी (हड्डी/बोटी से)न माने तो बताइये किस अस्त्र का उपयोग किया जाता है ।
प्रश्न10) रथ यात्रा के फ़ायदे बताइये -(गलत पर टिकमार्क कीजिए)
अ) वोटरों की निगाह में महारथी हो जाते है।
ब)अखबार ,टी वी में छाये रह सकते है।
स) देश सेवा कर सकते है ।
द) जनजागृति से जनसमर्थन जुटा कर वोट बैंक बढा सकते है ।
प्रश्न 11)हिन्दु धर्म की राजनीति अर्थात हिन्दुत्व की राजनीति के फ़ायदे बताइये
1) हिन्दुओं को कट्टर और मिलिटेंट बनाया जा सकता है ।
2) हिन्दुओं को एक जुट करने के लिए मुस्लिम विरोध कार्ड खेल कर , हिन्दुओं को अपना वोट बैंक बनाया जा सकता है जिससे सत्ता पर काबिज होना आसान होगा ।
3) धृणा की राजनीति के दौर में , जनता के एक हिस्से से कहो हम तुम्हारे साथ है , असुरक्षा की कोई बात नही ।
4)बेरोजगारी,गरीबी व विकास के मुद्दे पृष्ठभूमि में चले जाते है जो राजनैतिक दल को चुनाव हरा सकते है।
5) हिन्दु बहुसंख्यक है , लोकतंत्र में बहुमत की जीत होती है , अत: लोकतंत्र का ढोल जोर से बजाकर हमेशा के लिए सत्ता पर काबिज होने का सपना पाल सकते है।
प्रश्न 12)जाति की राजनीति के फ़ायदे (गलत पर निशान लगाओ)
1) मंडल से कमंडल का मुकाबला किया जा सकता है ।
2)जातिगत वोटों को एक जुट किया जा सकता है ।
3) जाति के नेता राजनेता बन सकते है ।
4) दलित और पिछडी जातियों के साथ चुनावी गणित बैठा कर, सीटे जीतकर राज्य सत्ता पर कब्जा सम्भव है
5)सवर्ण-पिछडों,सवर्ण-दलितों,पिछडे-दलितों को आपस में लडा कर ,बंदर बाट कर सकते है ।
6)जात की राजनीति वास्तव में उनके आर्थिक-सामाजिक-राजनैतिक स्तर में सुधार लाती है।

Monday, December 21, 2009

प्रत्याशी से पूछताछ

एक एम.एल. उम्मीदवार से चुनाव समिति ने निम्न प्रश्न पूछे ! अब आप बताएंगे कि चुनाव समिति ने सवाल क्यों पूछे - और इनकी प्रासंगिकता क्या है ?
जिला प्रमुख सुजीत जायसवाल ने पार्टी से एम.एल.ए. का टिकट मांगने का निश्चय कर , चुनाव समिति के समक्ष साक्षात्कार के लिए उपस्थित हुए ।
जो प्रश्नावली उनसे पूछी गई वह निम्न क्रम में थी
- आपका पूरा नाम
- किस विधान सभा क्षेत्र से चुनाव लड़ोगे ?
- किस जाति के हो ?
- आपके जाति के मतदाताओं की विधानसभा क्षेत्र में संख्या तथा
कुल मतदाताओं इनका कितना प्रतिशत है
- उक्त मतदाताओं का पार्टी की ओर रूझान
- आपका उन मतदाताओं पर प्रभाव / पकड़ कितनी है ?
- किन जातियों के समीकरण से चुनाव जीता जायगा ?
- आपकी आर्थिक हैसियत ? पार्टी फंड में कितना दे सकते हैं ?
- चुनाव में कितना खर्च कर लेंगे ?
- चुनाव फंड इकठ्ठा करने की सामर्थ्य ?
- पहले कोई चुनाव लड़ा हो तो वोटों की संख्या, जीते या हारे ।
- अल्पसंख्यकों का झुकाव , पार्टी की ओर है ?
- आपका अल्पसंख्यकों के नेताओं पर प्रभाव एसटी एस सी ओबीसी के नेताओं पर आपका प्रभाव
- अपनी पार्टी के किन - किन नेताओं से आपके घनिष्ठ संबन्ध है ?
- क्या जिला कमेटी व ब्लॉक कमेटी के सदस्य आपको सर्पोट करेंगे ?
- स्थानीय मुद्दे जिन पर चुनाव लड़ा जाएगा ।
- पार्टी के विभिन्न संगठनों (जिला व ब्लॉक स्तर पर ) पर आपकी पकड़
- कितने मुकदमें चल रहे हैं आपके विरूद्ध क्या हत्या/अपहरण/ व बलात्कार का कोई कैस है ?
- संगठन में किन - 2 पदों पर कार्य किया ?
- रैली के लिए अपने क्षेत्र से कितनी बसें भर कर ला सकते हो ? उनका भुगतान पार्टी नहीं करेगी
- प्रत्येक ब्लॉक से कितने समर्थक जुटा सकते हो ?
- क्या लोग आपसे खौफ खाते हैं ?
- क्या क्षेत्र के लोग ठीक से पहचानते हैं? थाना , कचहरी , कलेक्ट्रेट में पहचान है
- कोई आन्दोलन का नेतृत्व किया ? क्या क्या तोड़ा -फोड़ा - जलाया । पुलिस ने केस असली अपराधी पर बनाये या भोले भाले लोगों को फांसा । क्या आपने उन्हें छुडा़कर वाह - वाही लूटी, अखबार में फोटो आया । इसकी गूंज प्रदेश स्तर पर सुनाई पड़ी या नहीं ।
- आपकी छवि दबंग नेता की है या दब्बू नेता की ।

Wednesday, December 2, 2009

उदारह्दय



उदारह्दय
आप बहुत उदार है, इसलिए आपका समय उदारवादी कहलाता है आप उदार है निजी हितों के लिए ,निजी लाभ के लिए। तमाम प्रतिबन्ध हटाओ कि निजी क्षेत्र विस्तार चाहता है, कि बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ अपना साम्राज्य विस्तार चाहती है। अब सरकार हमारी नहीं रह गई , यह तो चेम्बर आँफ़ कामर्स एवं ईंडस्ट्रीज , बहुराष्ट्रीय निगमों और उनकी वकालत करने वाली अन्तराष्ट्रीय संस्थाओं की हो गई है । आपके वित्तमंत्री अपनी नीतियों के अनुमोदन के लिए उद्योगपतियों की संस्थाओं पर कितने निर्भर है ! बार-बार उनसे बैठके की जाती है, उन्हें समझाया जाता है बल्कि उनसे समझा जाता है ,किसानों -मजदूरों के साथ बैठके करते है? उनसे अपनी नीतियों का अनुमोदन करवाते हैं ? मजदूर किसान क्या जाने! वे तो निपट अपढ और अज्ञानी हैं । क्या उद्योगपतियों को अपने हित की नीतियां मनवाने के लिये किसान -मजदूर की तरह सड़क पर उतरना पड्ता है ?क्या कभी उद्योगपतियों व कोर्पोरेट घरानों पर लाठी-गोली चली?
जब भी कुल्हाडी गिरनी होती है इन जैसे गरीबों पर ही क्यों गिरती है?
सरकार को मार्ग निर्देश कहाँ से मिलते हैं ? विश्व बैंक , अन्तरराष्ट्रीय मुद्रा कोष , विश्व व्यापार संगठन आपको मुफ्त की सलाह क्यों देते हैं ? सलाह मानिए , नहीं तो उनकी फैंकी बोटियाँ आपको नहीं मिलेगी । सरकार लपकेंगी फैंकी बोटियाँ की ओर क्योंकि विकास के लिये पूंजी चाहिए,हेमामालिनी के गाल जैसी सडकें चाहिए बडे -बडे माँल चाहिए सेज़ चाहिए,इस पूंजी का 15% विकास पर और 85% नेताओं,सरकारी अफ़सरों,ठेकेदारों,एन्जिनियर,सप्लायरों,
उद्योगपतियों व कोर्पोरेट घरानों की तिजोरियों में जाकर काला धन बन जाता है।काला धन बेईमानी से इकट्ठा किया जाता है इसलिये वह काले कारनामे करता है।
पूंजी निवेश बढेगा तो रोजगार बढेगा। अरे पूँजी तो पूरे विश्व में अपना नंगा नाच नाचने के लिए तैयार है । यह वह नर्तकी है जिसके नाच पर सभी देशों की सरकारे फ़िदा है ।देशी दलाल पूंजी, विदेशीपूंजी के साथ ताल मिलाकर नाचेगी
सरकार फ़िर मुज़रे देखने का काम करेगी या विदेश यात्रा मे डिस्को व केसिनो देखेगी।
अभी बहुराष्ट्रीय कम्पनिया गर्वनेस मे भी उतर रही है तब हमारी सरकारों को प्रशासन कि जिम्मेदारी से भी मुक्ति मिल जाएगी। सरकारे केवल वे नितीगत फ़ैसले लेगी जो उसे तश्तरी में परोस कर दिये जाएंगे। संसद केवल बहस
करेगी, बहुमत न हो तो खरीद लिया जायगा।परमाणु करार में यही तो हुआ।
अब देखिये ये टेंडर किसको मिलता है ?

Monday, November 16, 2009

देवेन्द्र रिणवा की कविताएं

देवेन्द्र रिणवा
इन्दौर के पास महूगांव में जन्म
स्नातकोत्तर तक औपचारिक शिक्षा
विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं एवं आकाशवाणी से रचनाएँ प्रकाशित - प्रसारित
1
हाँ-नहीं

हाँ बोलने में
जितनी लगती है
ठीक उससे दुगुनी ताक़त लगती है
नहीं बोलने में

हाँ बोलना यानि
शीतल हवा हो जाना
नहीं बोलना यानि
गरम तवा हो जाना

हाँ बोलने के बाद
कुछ भी नहीं करना होता है
बस मरना होता है
नहीं बोलने के बाद
लड़ना और भिड़ना होता है
-0-

2
कुरेदा नहीं जाता जब अलाव

दो या तीन लोग
जमा करते हैं
घास-फूस, रद्दी कागज़,
टूटे खोखे, गत्ते, छिलपे
घिसे टायर
और तमाम फालतू चीज़ें
जलाया जाता है अलाव

एक एक कर जुटते हैं लोग
जमता है कोई इंर्ट पर
पत्थर पर कोई
आसपास हो तो
मुड्ढ़ा या कुर्सी भी
कुछ न हो तो
पंजे के बल
थकने पर
जूते या चप्पल पर

हैसियत के मुताबिक
जगहें होती है
जिस और होता है
धुएँ का ज़ोर
अक्सर उधर
बैठता है कमज़ोर
जो बीच बीच में उठता है
लाता है बलीतन

खेती, गृहस्थी, धंधा,
निंदा, धर्म, राजनीति
एक एक कर सभी हाजिर होते हैं
बेशक चिन्ता भी
पर अलाव का ताप
खदेड़ देता है उसे

खोई छिलपे को
खड़ा करता है
तोड़ने लगता है कोई अंगारे
ऊपर की जलती हुई लकड़ी को
नीचे घुसेड़ता है कोई
लपट उठाने के लिए
फ़ूंकता है कोई
आंसू आ जाने तक

गऱज़ ये कि
कुरेदे बगैर कोई बैठा नहीं होता
अलाव के आगे

कुरेदा नहीं जाता
जब अलाव
तो जमने लगती है राख
-0-

3
यह जो तरल है

यह जो तरल है
इसमें गति भी है, शक्ति भी
बहता आया है यह सदियों से
हमारे मन, मस्तिष्क में

सींचता आया है सम्बन्धों को
जरूरत पड़ने पर तोड़ा है इसने
बन्धनों को

बहा ले जाता है
कूड़ा-करकट और गन्दगी
अनावश्यक संग्रह और
ख़तरनाक होती बन्दगी

सभ्यताएँ इसके किनारे पर
हुई हैं विकसित और ध्वस्त
इतिहास तैरता रहा है
इसकी धारा में
और यह बहता रहा है
दो किनारों के बीच
बनकर मध्यस्थ

इसके होने से ही होती है
आंख में भेदने की ताक़त
कलम में चीख़ने की
यह न होता तो आदमी
नहीं पहनता कपड़े
न तमीज़ सीखता
नहीं बोलने की

यह बहता है
तो पैदा होती है ऊर्जा
नृत्य करता है सृजन
कुलबुलाने लगती है कुंठाएँ
ठहरने लगता है जीवन

यह जो तरल है
गाढ़ा होता जा रहा है लगातार
इसे पिघलाने लिये
ज़रूरी है
सम्बन्धों की ऊष्मा
-0-

Monday, October 26, 2009

युगल की कथाएं

जात
युगल

छोटी जात वालों के कुएं में कुछ गिरा । जाग हो गयी । कई लोग कुएं पर जमा हो गए । कुएं में अंधेरा था । कुछ पता नहीं चल रहा था कि क्या गिरा है । एक आंशका थी कि शायद कोई आदमी गिरा हो । मजबूत रस्से में झग्गर बांध कर डाला गया । चार -पांच आदमियों ने खींच कर उस भारी बोरे को उपर किया । बोरे का मुहॅं खुला, तो सबों के मुहं खुले रह गये -‘‘अरे ! यह तो किसी बड़े घर का लगता है।’’
लोग उपचार में जुट गये । आग सुलगायी गयी । गरम तेल की मालिश होने लगी। उपचार के बाद वह आदमी होश में आया । एक आदमी ने पूछा-‘‘बाबू साहब, आपका घर?’’
‘‘रतनपुरा।’’
‘‘कौन जात हुए?’’
वह आदमी उस हाल में भी जात पूछे जाने पर तमक उठा-‘‘साले जात पूछते हो ? ये कड़कड़ाती मूंछे, ये चमकते रोएं और रंग नहीं देखते ? अंधे ! ये किस जात के होते हैं?’’
तब उन लोगों ने उस आदमी को उसी बोरे में कसा और फिर से उसी कुएं में डाल दिया । लोग उसकी जात जान गये थे ।



रास्ता

उसके सोते कई दिन गुजर गये थे । घर के लोग उठाकर थक गये थे और अंत में झुंझलाकर उठाना ही छोड़ दिया था । लेकिन जब वह उठा , तो उसे लगा कि दूर -दूर तक धुंध छाया हुआ है । हवा भारी और कड़वी है । उसने गहरी सांस ली , तो कलेजे में जलन होने लगी । बाहर आया, तो देखा, वादियों में कॅंटीली झाड़ियाँ उगी हैं, एक दूसरे में ऐसी गुंथी हैं कि राह खोजना मुहाल । उपर से गहराता मोटे पर्दे - सा धुंध ।
उसने एक निर्णय लिया और पांव आगे बढ़ाये । उसे ठोकर लगी और पांव में कांटे चुभ गये । उसने कांटे निकालने का प्रयास किया और देखा कि उसके पांव खून से भीग चुके हैं । खून से सने हाथ को दामन से पोंछना चाहा, तो पाया कि उसके दामन तार - तार हो चुके है। उसने आवाज लगायी - ‘‘लोगो, बाहर आओ , धुएं और धुंध के पार जाने के लिए , अंधेरे से लड़ने के लिए ।’’
उसे आश्चर्य हुआ कि लोगों ने आवाज सुनकर अपने - अपने दरवाजे बंद कर लिये । उसने दरवाजों पर दस्तक दी और पुकारा - ‘‘दरवाजा खोलो , तुम्हारे चारो ओर जहरीला रिसाव हो रहा है । तुम नहीं निकलोगे , तो तुम्हारे बच्चे घुट- घुट कर मंरेगे । अपने बच्चों के लिए , अगली पीढ़ी के लिए बाहर निकलो ।
लेकिन कोई नहीं निकला , तो उसने मुंडेरों पर चढ़कर देखा कि हर घर में ऊँट उकड़ू बैठे है और जहरीले रिसाव से अपने को बचाने के लिए बालुओं के ढेर में अपना थुथना गाड़े हैं । उस धुँध में वह निर्णय नहीं कर सका कि वे ऊँट ही थे या आदमी थे ।
फिर वह उस अंधेरे के पार जाने के लिए भागने लगा । वह रोना चाहता था , लेकिन उसकी रूलाई प्रार्थना बन गयी - भगवान ! प्रकाश दो ! अंधेरे से बचाओ ! हमें कांटो के पार ले चलो !
तब उसके सामने एक आकृति प्रकट हुई । उसके वस्त्र धवल थे । आकृति चिकनी थी और होठों पर मुस्कान थी । देवदूत की तरह वह बोला - मैं तुम्हें इस अंधेरे के पार ले चलूंगा । मेरे पीछे आओ !’’
और वह पत्थरों से टकराता, काटो से उलझता , रक्ताविल चरणों से उसके पीछे चलता रहा ....... चलता रहा ।
कि उसने एक चमकती हुई अट्टालिका देखी , जो बाहर - भीतर से जगमगा रही थी । सारा प्रकाश वहीं कैद था और उसके ऊपर की चिमनी से जहरीला रिसाव हो रहा था । जिस आदमी के पीछे वह चल रहा था , वह उस अट्टालिका के अंदर चला गया और दरवाजा स्वतः बंद हो गया ।
यद्यपि चलते - चलते उस आदमी के पांव थक चुके थे , फिर भी उसने उस बंद दरवाजे पर पांव से प्रहार करना शुरू किया । उसने किसी को पुकारा नहीं, किसी से प्रार्थना नहीं की । उस अट्टालिका में कैद प्रकाश की मुक्ति का उसके सामने वहीं रास्ता था।



Thursday, October 8, 2009

अन्तर्राज्यीय लघुकथा सम्मेलन 3 अक्टूबर 2009

अठारवां अन्तर्राज्यीय लघुकथा सम्मेलन 3 अक्टूबर 2009 , युवक साहित्य सदन, सिरसा , हरियाणा में आयोजित हुआ यह सम्मलेन पंजाबी त्रैमासिक ‘भिन्नी’ एवं हरियाणा साहित्य अकादमी के संयुक्त तत्वावधान में हरियाणा लेखिका मंच , के सहयोग से सम्पन्न हुआ ।
पहले सत्र के अध्ययक्ष मंडल में डा. मुक्ता अरोड़ा, निदेशक , हरियाणा साहित्य अकादमी , डा अनुपसिहं , उपाध्यक्ष, पंजाबी साहित्य एकादमी, सुकेश साहनी प्रसिद्ध लघुकथाकार , डा. आर. एस. सांगवान, व सुखवीर जैन थे
इस सत्र में डा कुलदीप ‘दीप’ व डा. रामकुमार घोटड ने अपने पत्र का वाचन किया जिस पर बाद में विचार विमर्श हुआ ।डा अनूपसिहं की पुस्तक ‘भिन्नी कहानी लेखकां नाल कुछ खरीआं खरीआं’,। डा. रामकुमार घोटड की पुस्तक ‘लघुकथा विमर्श व ‘मिन्नी’ के हरिशंकर परसाई विशेषांक का विमोचन किया गया।


(सम्मानित व्यक्तियों के साथ अध्यक्ष मंडल)

माता शरबती देवी स्मृतिसम्मान वरिष्ठ लघुकथाकार श्री भगीरथ , श्रीमती महादेवी कौशिक पुरस्कार - सुश्री अंजु दुआ जैमिनी, व चौधरी मोहरसिहं काम्बोज पुरस्कार डा. बलदेव सिहं खहिरा को प्रदान किया गया
द्धितीय सत्र ‘जुगनुओं दे अंग संग में 50 हिन्दी व पंजाबी के लेखकों ने लघुकथा पाठ किया तथा प्रत्येक रचना पर विचार विमर्श हुआ यह सत्र सुबह चार बजे समाप्त हुआ । इस सत्र का संचालन श्यामसुन्दर अग्रवाल व डा रमासुन्दर दीप्ति ने किया , चर्चा में मुख्यतः रामेश्वर हिमांशु कम्बोज , सुकेश साहनी, अशोक भाटिया , विक्रमजीत नूर हरभजन खेमकरनी , निरंजन बोहा ने भाग लिया।
डा. शील कौशिक व डा. रूपदेव गुण के अथक प्रयत्न से यह आयोजन सिरसा के लिए एक उपलब्धि बन गया ।

Wednesday, September 30, 2009

लोकार्पण

शिवराम के नाटक के लोकार्पण पर ली गई तस्वीरें । देर से प्राप्त

बाएँ से - महेंद्र नेह, मंजरी वर्मा , शिवराम , रविन्द्र कुमार रवि , नरेन्द्र नाथ चतुर्वेदी , शैलेश चौहान
दर्शक दीर्घा
लोकार्पण की पूरी रिपोर्ट पिछ्ली पोस्ट में पढ़े ।

Monday, September 21, 2009

शिवराम के नाटक - पुनर्नव , गटक चूरमा का लोकार्पण

शिवराम के नाटक - पुनर्नव , गटक चूरमा का लोकार्पण

20 सितम्बर 2009 को कोटा की कला दीर्घा में शिवराम के दो नाट्य संग्रहों पुनर्नव व गटक चूरमा का विमोचन डा. ‘रविन्द्र कुमार रवि’ , अध्यक्ष विकल्प अखिल भारतीय जनवादी , जनसांस्कृतिक - सामाजिक मोर्चा, डा. मंजरी वर्मा , शैलेश चौ
हान व नरेन्द्र नाथ चतुर्वेदी ने किया इस अवसर पर बोलते हुए डा. रवि ने कहा कि जिस तरह चन्द्रधर शर्मा गुलेरी मात्र एक कहानी ‘उसने कहा से ’ प्रसिद्ध हुई ठीक उसी तरह शिवराम ‘जनता पागल हो गई’ नाटक से लोकप्रिय हुए। शिवराम सन् 1973 से ही नुक्कड़ नाटक लिख
रहे हैं वे ‘नुक्कड़’ नाटक
के प्रणेता भी हैं और पुरोधा भी । विभिन्न नाट्य रूपों को शिवराम ने अपने नाटकों में सम्मिलित किया है। ये नाटक प्रकाशित होने से पहले सैकड़ों बार देश के विभिन्न क्षेत्रों में खेले जा चुके हैं
डा. मंजरी वर्मा ने कहा कि बिहार के सदूर गावों में इन नाटको का प्रभाव
देखने योग्य है। दुलारी बाई नाटक को देखकर गाँव के लोंगों ने यह निर्णय लिया कि अब कोई भी इस गाँव में शादी के अवसर पर न तो तिलक देगा न तिलक लेगा । शिवराम के नाटक जनता में चेतना जगाने में समर्थ हैं ।
समारोह सभा के अध्यक्ष डा. नरेन्द्र नाथ चतुर्वेदी ने कहा कि जब वे एडीएम थे तब उन्होनें एक नाटक लिखा था जिसे राजस्थान साहित्य एकादमी ने पुरस्कृत भी किया। इसके बावजूद मुझे कोई नाटककार के रूप में
नहीं पहचानता जबकि शिवराम को कोई भी एकादमी पुरस्कार नहीं मिला है फिर भी हिन्दी क्षेत्र में वे एक लोकप्रिय
नाटककार के रूप में जाने जाते हैं ।



शिवराम को हिंदी में नुक्कड़ नाटक आंदोलन के प्रणेताओं में माना जाता है। इनका नाटक ‘जनता पागल हो गई है’ हिंदी के शुरूआती नुक्कड़ नाटकों में शुमार किया जाता है यह हिन्दी का सर्वाधिक खेला जाने वाला नुक्कड़ नाटक है शिवराम के कई नाटक अन्य भाषाओं में अनूदित होकर भी खेले गए हैं। नाट्य लेखन के साथ वे एक कुशल निर्देशक और अभिनेता भी हैं।
हिन्दी साहित्य की महत्वपूर्ण पत्रिका ‘अभिव्यक्ति’ का , पिछले 33 वर्षो से सम्पादन ।
‘विकल्प’ अखिल भारतीय जनवादी सांस्कृतिक - सामाजिक मोर्चो के महासचिव


गटक चूरमा में संग्रहित नाटक

1 बोलो - बालो हल्ला बोलो , ढम ढमा ढम ढम , गटक चूरमा व हम लड़कियाँ शिवराम

पुनर्नव में संग्रहित कहानियों के नाट्य रूपान्तर

1 प्रेमचन्द की कहानियाँ - ठाकुर का कुँआ , सत्याग्रह , ऐसा क्यों हुआ

रिजवान जहिर उसमान की कहानी ‘खोजा नसरूद्दीन बनारस में’ व नीरज सिहं की कहानी ‘क्यों’ का नाट्य रूपान्तर , वक्त की पुकार इस संग्रह में संग्रहित है।

Monday, September 14, 2009

राष्ट्रपिता के सपने

एक देश हुआ हिन्दुस्तान अब इंडिया हो गया है , इसके एक राष्ट्रपिता थे , जिन्होने अपनी लाठी से अंग्रेजों को भारत छोड़ने पर मजबूर किया । वे अंहिसावादी थे उन्होने कभी लाठी चलाई नहीं , हाँ कभी - कभी दिखा देते थे । जैसे नमक आन्दोलन में ।
उनके तीन बन्दर बहुत प्रसिद्ध हुए, वास्तव में ये तीन बन्दर ही उनके सच्चे वारिस थे , जो न बुरा देखते थे न बुरा सुनते थे , न बुरा कहते थे ।
इसलिए राष्ट्रपिता के वारिसों ने न तो कभी गरीबी जैसी बुराई देखी , न उन्होने भ्रष्टाचार के किस्सों पर कान दिया । वास्तव में उन्हें ऐसी बातें सुनाई ही नहीं पड़ती थी , न ही कभी उन्होंने किसी को बुरा - भला कहा सिवाय कम्युनिस्टों को छोड़कर । बुरा - भला कहनें की उन्हें जरूरत कहाँ थी विपक्षी उनके दरबार में हाजरी दे जाते थे , अफसर , उद्योगपति , व्यापारी ठेकेदार , जमींदार उनकी सेवा में रहते और वे भी उनकी सेवा करते । जीओ और जीने दो का सिद्धांत या इसे कहें सहअस्तित्व की भावना ।
उनके वारिसों ने राष्ट्रपिता के सपनों को साकार करने के लिए पंचवर्षीय योजनाएं बनाई , जिससे इंजिनियरों , ठेकेदारों मंत्रियों , उद्योगपतियों और दलालों के विकास के साथ - साथ देश का थोड़ा बहुत विकास भी हुआ और इसी के चलते हम विकासशील देश की श्रेणी में आने लगे हैं देश को स्वावलम्बी करने के लिए विदेशों से कर्ज लिया , बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को न्योते दे देकर बुलाया ओर प्रार्थना की उनसे कि ‘आप हमारे राष्ट्रपिता के सपने साकार करें इस वास्ते नमक बनाने के हमारे अधिकार को हमने विदेशी कम्पनी ‘कारगिल’ को सौप दिये ।
खादी के विकास के लिए , बुनकरों के विकास के लिए उन्होनें बड़ी - बड़ी कपड़े की मिलें स्थापित की और कपडे का निर्यात कर विदेशी मुद्रा अर्जित करने लगे गोया विदेशी मुद्रा से प्यार हमारी देश भक्ति की सबसे बड़ी मिसाल है ।
राष्ट्रपिता की तीसरी या चौथी पीढ़ी के एक शख्स ने प्रधानमंत्री की कुर्सी से कहा कि जब भारत सरकार विकास में एक रूपया खर्च करती है तो पन्द्रह पैसे का विकास होता है । इतनी साफगोई थी इनमें । इतने सत्यवादी थे राष्ट्रपिता की तरह । कितने असहाय थे हमारे प्रधानमंत्री ।
राष्ट्रपिता ने शराबबन्दी का सपना देखा था उनके वारिसों में से एक ने गुजरात में पूर्णत: शराबबन्दी कर दी । जिससे राज्य सरकार को सालाना करोड़ो रूपयों का नुकसान होता था और शराब के धन्धों में लिप्त लागों को करोड़ों का मुनाफा होता था । इस मुनाफे को वे सद्कार्य में खर्च करते थे जैसे चुनाव फंड में पैसा देना , अस्पताल स्कूल खुलवाना , अनाथालय को दान देना जिससे उन्होनें खुब पुण्य कमाया वे रात -दिन बापूजी का गुणगान करते हैं और गांधी आश्रम को जम कर दान देते है।

Monday, August 31, 2009

मकड़ियाँ

'ज्ञानसिंधु' में आपका व्यंग्य 'क्रेडिट कार्ड' पढ़ा। बहुत बढ़िया लगा। बाज़ारवार के चलते क्रेडिट कार्ड की त्रासदी को झेलते आज के मध्यम-निम्न मध्यम वर्ग के आदमी की त्रासदी को रेखांकित करने का प्रयास दो तीन वर्ष पूर्व मैंने अपनी लघुकथा 'मकड़ियां' में किया था। इसे सबसे पहले पूर्णिमा बर्मन जी ने 'महानगर की लघुकथाएं' के अन्तर्गत अपनी वेब पत्रिका "अभिव्यक्ति" में "मकड़ी" शीर्षक से छापा था और अभी गत वर्ष 2008 में कमल चोपड़ा ने अपने वार्षिक संकलन "संरचना" भी इसे शामिल किया है। आपको यह लघुकथा भेज रहा हूँ। क्या आप इसे 'ज्ञानसिंधु' के पाठकों के सम्मुख रखना चाहेंगे ?
मकड़ियाँ
सुभाष नीरव
0अधिक बरस नहीं बीते जब बाजार ने खुद चलकर उसके द्वार पर दस्तक दी थी। चकाचौंध से भरपूर लुभावने बाजार को देखकर वह दंग रह गया था। अवश्य बाजार को कोई गलत-फहमी हुई होगी, जो वह गलत जगह पर आ गया - उसने सोचा था। उसने बाजार को समझाने की कोशिश की थी कि यह कोई रुपये-पैसे वाले अमीर व्यक्ति का घर नहीं, बल्कि एक गरीब बाबू का घर है, जहां हर महीने बंधी-बधाई तनख्वाह आती है और बमुश्किल पूरा महीना खींच पाती है। इस पर बाजार ने हँसकर कहा था, ''आप अपने आप को इतना हीन क्यों समझते हैं ? इस बाजार पर जितना रुपये-पैसों वाले अमीर लोगों का हक है, उतना ही आपका भी ? हम जो आपके लिए लाए हैं, उससे अमीर-गरीब का फर्क ही खत्म हो जाएगा।'' बाजार ने जिस मोहित कर देने वाली मुस्कान में बात की थी, उसका असर इतनी तेजी से हुआ था कि वह बाजार की गिरफ्त में आने से स्वयं को बचा न सका था। अब उसकी जेब में सुनहरी कार्ड रहने लगा था। अकेले में उसे देख-देखकर वह मुग्ध होता रहता। धीरे-धीरे उसमें आत्म-विश्वास पैदा हुआ। जिन वातानुकूलित चमचमाती दुकानों में घुसने का उसके अन्दर साहस नहीं होता था, वह उनमें गर्दन ऊँची करके जाने लगा।
धीरे-धीरे घर का नक्शा बदलने लगा। सोफा, फ्रिज, रंगीन टी.वी., वाशिंग-मशीन आदि घर की शोभा बढ़ाने लगे। आस-पड़ोस और रिश्तेदारों में रुतबा बढ़ गया। घर में फोन की घंटियाँ बजने लगीं। हाथ में मोबाइल आ गया। कुछ ही समय बाद बाजार फिर उसके द्वार पर था। इस बार बाजार पहले से अधिक लुभावने रूप में था। मुफ्त कार्ड, अधिक लिमिट, साथ में बीमा दो लाख का। जब चाहे वक्त-बेवक्त जरूरत पड़ने पर ए.टी.एम. से कैश। किसी महाजन, दोस्त-यार, रिश्तेदार के आगे हाथ फैलाने की जरूरत नहीं।
इसी बीच पत्नी भंयकर रूप से बीमार पड़ गई थी। डॉक्टर ने आप्रेशन की सलाह दी थी और दस हजार का खर्चा बता दिया था। इतने रूपये कहां थे उसके पास ? बंधे-बंधाये वेतन में से बमुश्किल गुजारा होता था। और अब तो बिलों का भुगतान भी हर माह करना पड़ता था। पर इलाज तो करवाना था। उसे चिंता सताने लगी थी। कैसे होगा? तभी, जेब मे रखे कार्ड उछलने लगे थे, जैसे कह रहे हों- हम है न ! धन्य हो इस बाजार का! न किसी के पीछे मारे-मारे घूमने की जरूरत, न गिड़गिड़ाने की। ए.टी.एम.से रूपया निकलवाकर उसने पत्नी का आप्रेशन कराया था।
लेकिन, कुछ बरस पहले बहुत लुभावना लगने वाला बाजार अब उसे भयभीत करने लगा था। हर माह आने वाले बिलों का न्यूनतम चुकाने में ही उसकी आधी तनख्वाह खत्म हो जाती थी। इधर बच्चे बड़े हो रहे थे, उनकी पढाई का खर्च बढ़ रहा था। हारी-बीमारी अलग थी। कोई चारा न देख, आफिस के बाद वह दो घंटे पार्ट टाइम करने लगा। पर इससे अधिक राहत न मिली। बिलों का न्यूनतम ही वह अदा कर पाता था। बकाया रकम और उस पर लगने वाले ब्याज ने उसका मानसिक चैन छीन लिया था। उसकी नींद गायब कर दी थी। रात में, बमुश्किल आँख लगती तो सपने में जाले ही जाले दिखाई देते जिनमें वह खुद को बुरी तरह फंसा हुआ पाता।
छुट्टी का दिन था और वह घर पर था। डोर-बेल बजी तो उसने उठकर दरवाजा खोला। एक सुन्दर-सी बाला फिर उसके सामने खड़ी थी, मोहक मुस्कान बिखेरती। उसने फटाक- से दरवाजा बन्द कर दिया। उसकी सांसे तेज हो गई थीं जैसे बाहर कोई भयानक चीज देख ली हो। पत्नी ने पूछा, ''क्या बात है ? इतना घबरा क्यों गये ? बाहर कौन है ?''
''मकड़ी !'' कहकर वह माथे का पसीना पोंछने लगा।
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Thursday, August 20, 2009

क्रेडिट कार्ड

फ्रीज खरीदना है ? पैसे नहीं है ? कोई बात नहीं , चिंता मत कीजिए , हम हैं न आपकी सेवा के लिए हमारा क्रेडिट कार्ड लीजिए, दुकानदार को दीजिए , एक साईन कीजिए और फ्रीज ले आइये । है न सरल तरीका । क्या कहा ? आपके पास आई.सी.आई.सी.आई का क्रेडिट कार्ड पहले से ही है । कोई बात नहीं , आप दूसरा लें, जरूरत आपको फिर भी पड़ सकती है । खुदा न करे बीमार हो जायें , आपरेशन कराना पड़ जाये , सीधे भरती हो जाइये , और निश्चित होकर इलाज कराएं और स्वस्थ होकर घर जायें। तब आप हमें धन्यवाद देंगे कि बंदे ने क्या चीज दी थी - क्या कहते है? , आपके पास तीन -2 क्रेडिट कार्ड हैं अच्छा है , चौथा भी लीजिए । चौथा लेने में कोई पाबंदी नहीं है ।
चले जाइए ! चले जाइए ! बहुत हो गया अभी सांस लेने की जगह बची है , चौथा देकर , तुम मुझे कर्जे में पूरा ही डूबा दोगे । एक दिन ऐसा आयेगा कि मेरी लाश पंखे से झूलती नजर आयेगी ।
क्यों ? क्या हुआ मैं तो तुम्हारी सहुलियत के लिए कह रहा हूँ कूज पर मजे करने हो , हवाई जहाज का सफर करना हो , विदेश यात्रा करनी हो । होटल में रूकना हो , विदेशों में खरीद - फरोख्त करना हो क्रेडिट कार्ड सब दुखों की रामबाण दवा है । रूपया पैसा ले जाने की झंझट नहीं । चोरी -चकारी का डर नहीं । बिंदास विदेशी यात्रा करो । हमारे कार्डधारी को 20 प्रतिशत डिस्काउन्ट मिलता है और हवाई कम्पनियाँ , होटल आदि बम्पर लाटरी भी निकालते है , कहीं आपकी लाटरी लग गई तो क्या कहने , सारे कर्जे दूर , जुहू बीच पर नया बंगला , मर्सडीज बेज गाड़ी इन्तजार करेगी ।
तब तो आप हमें अवश्य धन्यवाद देंगे
‘मेरे बाप , मैं डूब चुका हूँ क्रेडिट कार्ड वाले कई तरह के चार्ज लेकर , कर्ज की राशि पर 40 प्रतिशत तक ले लेते हैं बैंक में जमा कराओं तो साले 6 प्रतिशत देते है । हमें लूटने के क्या -2 इन्तजाम कर रखे है ।
मत लीजिए । बिल्कुल मत लीजिए । मैं नहीं चाहता कि आप क्रेडिट कार्ड लें
वे अपने बैग से दूसरा फार्म निकालते हैं
‘हमारी कम्पनी 0 प्रतिशत ब्याज दर कर्ज देती है मनचाही किश्तों में भुगतान कीजिए ।
लीजिए यहाँ साइन कीजिए पैसा उठाइये और कार ले आईये , एसी. ले आइये जो चाहो सो ले आओ ,
हम आपकी सेवा में हमेशा हाजिर है ।
अब सर यह मत कहिएगा कि 0 प्रतिशत से भी कम ब्याज लें ।
वे हैं हैं कर हॅंसने लगे । वह चिंतित सा सोचने लगा साइन करे या न करे एसी. तो लेना ही हैं सो फाइनेंस कम्पनी के कागजात पर हस्ताक्षर कर देता है ।
आखिर मछली जाल में फँस ही गयी ।

Sunday, August 9, 2009

डा. शकुंतला किरण की शोध पुस्तक ‘हिन्दी लघुकथा ’ का लोकार्पण

डा. शकुंतला किरण की शोध पुस्तक ‘हिन्दी लघुकथा ’ का लोकार्पण दिनांक 26 जुलाई 2009 , जवाहर आडोटोरियम, अजमेर में लघुकथा के वरिष्ठ कथाकार भगीरथ व बलराम अग्रवाल ने किया , साथ ही उनकी ही कविता की पुस्तक ‘ एहसासों के अक्स ’ का लोकार्पण कुमार शिव व ताराप्रकाश जोशी ने किया ।
इस अवसर पर बोलते हुए प्रो. अनन्त भटनागर ने कहा कि यह एक प्रामाणिक शोध प्रबंध है , जिसमें लेखिका का श्रम स्पष्ट झलकता है । हिन्दी लघुकथा के साथ - साथ अन्य भाषाओं की कथाओं का लेखा -जोखा भी लेखिका ने प्रस्तुत किया है । उन्होनें पुस्तक के पहले ,चौथे और पांचवे अध्याय का विशेष उल्लेख करते हुए कहा कि पहले अध्याय में उन राजनैतिक , सामाजिक , आर्थिक परिस्थितियों का वर्णन किया गया है जो लघुकथा के उदय में महत्वपूर्ण साबित हुई है लघुकथा के तात्विक विवेचन में उन्होने परिभाषा , बोधकथा , भावकथा , दंतकथा , लतीफा, कहानी आदि की अवधारणा को स्पष्ट किया है । पाँचवे अध्याय में लघुकथा की विशेषताओं और छठे में जीवन मूल्यों पर चर्चा की है ।
‘हिन्दी लघुकथा ’ पर आगे चर्चा करते हुए बलराम ने कहा कि शोध का विषय सन् 1975 में ही स्वीकृत हो गया था और 1981 तक थिसिस स्वीकृत भी हो गई थी लेकिन प्रकाशन करीब तीन दशक बाद हुआ । इस महत्वपूर्ण पुस्तक को प्रकाशन के प्रति लेखिका उदासीन ही रही । लेकिन जब इन्दौर के डा. सतीश दुबे ने बताया कि आपकी शोध के अंशों की चोरी होती जा रही है तो मित्रों के आग्रह पर उन्होने इसे अन्ततः प्रकाशित करने का मन बनाया ,
सौभाग्य का विषय है कि प्रथम लघुकथा संग्रह ‘गुफाओं से मैदान की ओर’ के सम्पादक भगीरथ व ‘हिन्दी लघुकथा’ की पहली शोध पुस्तक की लेखिका डा. शकुन्तला किरण आज दोनों मंच पर विराजमान है और दोनों राजस्थान से है । हमारे लिए यह गर्व का विषय है । इस पुस्तक की सबसे महत्वपूर्ण बात है कि जो मानदंड डा. शंकुतला किरण ने दिये वे आज भी लघुकथा में मान्य है ।
चर्चा को आगे बढ़ाते हुए भगीरथ ने कहा कि यह पुस्तक गहन अध्ययन , मनन , चिंतन व विशलेषण का परिणाम है । ऐसे समय जब लघुकथा आकार ग्रहण कर रही थी , जब साहित्यकार इसका नाम आते ही नाक - भौं सिकोड़ते थे , विश्वविद्यालय द्धारा इस विषय को स्वीकृती देना निश्चय ही महत्वपूर्ण रहा । इसके लिए शोधार्थी एवं राज. विश्वविद्यालय धन्यवाद के पात्र है । इनका शोध काॅपी - पेस्ट या कट - पेस्ट नहीं है जैसे कि डाॅ भटनागर ने कहा यह एक प्रमाणिक ग्रन्थ है । लघुकथा जगत में इस पुस्तक का जबरदस्त स्वागत हो रहा है और आगे के शोधार्थी इस पुस्तक के सन्दर्भ के बिना अपना शोध पूरा न कर पायेंगे । यह आलोचना की सबसे महत्वपूर्ण पुस्तक है जिसका आने वाले कई वर्षो तक लघुकथा विमर्श में विशिष्ट स्थान रहेगा ।
डा. शंकुतला किरण ने अपने वक्तव्य में कहा कि वह लघुकथा की तरफ तेजी से आकृष्ट हुई और लघुकथा लेखन में संलंग्न हो गई । जब शोध के विषय के चयन की बात आई तो सबसे पहले मानस पर लघुकथा का विषय ही रहा । वह लघुकथा जगत से जुड़ी हुई थी इसलिए संदर्भ सामग्री के लिए ज्यादा मुश्किल नहीं पड़ी , जब आपातकाल के दौरान ‘सारिका’ के लघुकथा विशेषांक की कई रचनाओं पर सेंसर ने काली स्याही पोत दी तब उन्हें लगा कि यह एक शक्तिशाली विधा है , और वह इस शोध पर जुट गई । व्यवस्था के विकृत रूप देखने हो और उनके प्रति आक्रोश व्यक्त करना हो तो लघुकथा एक सशक्त विधा है। प्रकाशन में देरी के कारण बताते हुए कहा कि सक्रिय राजनीति और फिर आध्यात्म की ओर झुकाव ने उन्हें साहित्य के प्रति उदासीन बना दिया था लेकिन अब ‘ अहसासों के अक्स ’ कविता संग्रह और ‘ ‘हिन्दी लघुकथा ’ के प्रकाशन के साथ ही पुनःसाहित्य में प्रवृत हूँ क्योंकि अध्यात्म की तरह साहित्य भी सुकून देता है