Saturday, January 29, 2011

एक ध्रुवीय विश्व में नाटो का औचित्य

नोम चोमस्की

तकरीबन २० साल पहले बर्लिन की दीवार के ध्वस्त होने के प्रतीक के साथ सोवियत संघ के पतन ने बहुत साफ तौर पर एकध्रुवीय विश्व  की स्थापना कर दी। जिसमें अमेरिका अब पहले की तरह एक प्रमुख महाशक्ति नहीं बल्कि एकमात्र महाशक्ति के रूप में रह गई थी ।
मौजूदा विश्व  व्यवस्था एक मामले में एकध्रुवीय बनी हुई है और वह है ताकत का मामला। अमेरिका अपनी सैन्य क्षमता पर लगभग इतना खर्च करता है जितना दुनिया के सारे देश  मिलजुल कर अपनी सैन्य क्षमता पर खर्च करता है। वह विध्वंस की टैक्नॉलोजी से अन्य देशो   के मुकाबले बहुत ही आगे है।
अमेरिका इस मामले में भी अकेला देश है जिसके दुनिया के विभिन्न देशो में सैकड़ों सैनिक अड्‌डे हैं और जिसने उर्जा का उत्पादन करने वाले दो क्षेत्रों को अपने नियंत्रण में रख रखा है।

अभी तक नाटो के अस्तित्व को न्यायोचित ठहराने के लिए सोवियत संघ को सामने रख दिया जाता था और कहा जाता था कि यह सोवियत आक्रमण से बचाव के लिए है। सोवियत संघ के विघटन के बाद यह बहाना भी खत्म हो गया। लेकिन नाटो को बचाकर रखा गया और उस नये सांचें में ढालकर अमेरिका की तरफ से हस्तक्षेप करने वाली विशेष ताकत के रूप में स्थापित किया गया । जाहिर है इसके साथ ही उर्जा पर नियंत्रण का विशेष सरोकार भी प्रकाशित  किया गया।


( समकालीन तीसरी दुनिया /अक्टुबर -दिसम्बर २०१० से साभार)

Monday, January 3, 2011

'बेलदार को स्पेनिन साहित्य गौरव सम्मान'

 झारखंड के प्रतिष्ठित शिक्षन संस्थान स्पेनिन रांची द्वारा हिन्दी साहित्य की समृद्धि में योगदान के लिए श्याम कुमार पोकरा के उपन्यास 'बेलदार' को स्पेनिन साहित्य गौरव पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। पिछले दस वर्षो में प्रकाशीत हिन्दी उपन्यासों में स्पेनिन द्वारा बेलदार को सर्वश्रेष्ठ कृति घोषित किया गया है।
दिनांक २७ नवम्बर २०१० को एक भव्य समारोह में रांची विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डॉ. शीन अखतर व रांची विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग की निदेद्गाक डॉ. ऋता शुक्ल ने ग्यारह हजार एक रूपये का चेक, , स्मृति चिन्ह, प्रद्गास्ति पत्र में स्पेनिन ने कहा कि प्राप्त कुल छत्तीस उपन्यासों में से बेदार को सर्वश्रेष्ठ कृति चुना गया है। निर्णायक मंडल की वरिष्ठ सदस्य डॉ. माया प्रसाद ने बेलदार पर अपना वक्तव्य देते हुए कहा कि यह उपन्यास राजस्थान की पत्थर की खदानों के मजदूरों की जीवन परिस्थतियों को बहुत ही सुक्ष्मता पूर्वक प्रस्तुत करता है।

Wednesday, December 29, 2010

भंवरी देवी : एक पब्लिक फिगर

 
 भंवरी देवी : एक पब्लिक फिगर



चैतन्य त्रिवेदी



अच्छा बताओ भवंरी देवी, जब वे तुम्हारा चीर खींच रहे थे, तब क्या तुमने सरकार को पुकारा था या गोपाल को याद किया था ?

भंवरी देवी, अच्छा यह बताओ , तुम्हारी जानकारी में यह बात तो होगी ही कि सरकार तो द्रोपदी के समय में भी कुछ न कर सकी थी तो अब क्या करेगी । घटना के दौरान तुम गोपाल को आवाज लगा लेती तो हो सकता है कि गोपाल चीर बढ़ा देते । जैसे द्रोपदी का बढ ाया था।

भंवरी देवी , जांच से पता चला कि तुमने घटना के दिन बहुत सस्ती साड ी पहन रखी थी। पता लगाने की बात यह है कि द्रोपदी के समय जो चीर बढ ाया गया था, वा कौन - सा कपड ा था? कितने पने का था ?

(यह बात संसद में विरोधी दलों को जवाब देने के सिलसिले में पूछी गई) हां तो भंवरी देवी , तुमने गोपाल को नहीं पुकारा पता नहीं, तुमने सरकार पर कैसे भरोसा कर लिया । पता नहीं गोपाल ने द्रोपदी के समय इतना कपड ा किसके थान में से चुराया होगा ? यहां तुम्हें अनावृत कर देने से ........ इस इलाके में कपड ों की कितनी दुकाने है ? वे साडि यां रखते हैं या नहीं । घटना के दिन उनके पास साडि यां थी या नहीं ।

अब आखिरी बात यह है कि टी.वी. पर हमने देखा था तुम्हें। तुम्हारा इंटरव्यू भी। देद्गा - भर ने तुम्हें देखा । अखबारों में पढा । रेडियो से जाना तुम्हारा नाम। तुम पब्लिक फिगर हो गई । मीडिया का यही काम है , पब्लिक फिगर बनाना । द्रोपदी भी आज तक पब्लिक फिगर है और बनी रहेगी।

कुछ पाने के लिए कुछ खोना तो पडता ही है । है ना भंवरी देवी!

Thursday, December 9, 2010

गरीब की वृद्धि दर


आंकड़े बताते हैं कि अब भारत में गरीबी २५ प्रतिद्गात ही रह गई है जबकि अन्य आंकडे बताते है कि भारत की ७० से ८० प्रतिशत जनसन्ख्या  २० रूपए से कम पर गुजारा करती है यह तो तब है जब हमारी अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर ८ से ११ प्रतिशत है अगर अर्थ व्यवस्था में वृद्धि हुई है तो गरीबी कम होनी चाहिए इस दृष्टि से देखे तो पहला वाला आंकड़ा सही लगता है लेकिन विद्वान लोग दूसरी दृष्टि से भी देखते हैं आर्थिक वृद्धि हुई , धन बढ़े लेकिन वह मलाई उड़ाने वालों की जेब में ही चला गया , इसलिए जो धन 7० प्रतिशत तक पहुंचना था वह पहले से ही पेट फुलाये , धापे लोगों की जेब में चला गया खैर देश का धन तो देश में रहा कम से कम राष्ट्र को तो नुकसान नहीं पहुंचा , चाहे ७० प्रतिशत गरीब को पहुंचा हो । लेकिन कुछ विद्धान कहते है इन २० प्रतिशत खाये - अघायें लोगों में ऊपर के ५ प्रतिशत लोगों ने इतना धन कमाया (लूटा) है कि उसे भारत में नहीं रख सकते सो उन्होनें स्वीस बैंक में जमा करा दिया है , लोग इसे कालाधन कहते हैं। धन कभी काला नहीं होता , उसकी चमक हमेशा बनी रहती है उसे तराशने के लिए जौहरी नहीं चाहिए , वे तो रेडियम की तरह चमकते रहते है , कुछ श्याणे लोगों ने विदेश में बडे - बडे फार्म खरीदे हैं , बंगले खरीदे हैं , होटल खरीदे हैं उद्योग खरीदे हैं , और यह सारा पैसा विदेशों में हवाले के तहत पहुंचा यानि काले धन को सुनहरा करने का विदेश में सुअवसर पाकर हमारे ५ प्रतिशत नागरिक धन्य हो गये हैं राष्ट्र को भी गर्व करने का सुअवसर दिया है कि भारतीय विदेशों में निवेश कर रहे हैं देखा! भारत की प्रगति और यहॉं हम एफ डी आई के लिए चिंतित है , क्या गणित है ! हमारा पैसा विदेश में और विदेश का पैसा भारत में , क्यों नहीं होगा , पूंजी तो वही जायेगी जहॉं उसे मुनाफा हो । उनके बच्चे विदेशों में पढ ते है उनकी छुटि्‌टयां लॉस वे गास में गुजरती है। और शाम को डिस्को , केसिनों और एक्सक्लूंसिव क्लबो में गुजारते है एक दिन का खर्च गरीब के दस साल के खर्च के बराबर , अब ये लोग हुए न राजे - महाराजे  , बेहतर से बेहतर वाइन और वूमेन क्योंकि अपने पास वेल्थ है अब इन तीन का संगम हो जाये तो स्वर्ग धरती पर है आखिर इन्द्र लोक में भी तो देवताओं के पास यही है लेकिन ७० प्रतिशत के लिए तो उन्होनें नरक की रचना कर ही दी है । नरक की रचना करने वालों में राजनेता, उद्योगपति , ठेकेदार कम्पनियां , बहुराष्ट्रीय कम्पनियॉं यानि कॉरपोरेट जगत सभी महारथी, बडे - बडे प्रशासनिक अधिकारी, सरकारी अमला जन जन के लिए नरक रच रहे हैं । सरकार आर्थिक वृद्धि का बाजा बजाती रहती है , 'भारत महाशक्ति' का शखंनाद करती है , ओर  नरक की ओर ध्यान दिलाने पर भी नहीं देखती , क्यों देखे कालापक्ष, देखे तो उजला पक्ष देखें। सो सरकार उजला पक्ष ही देखती है और जनता को भी दिखाती है । उजले पक्ष और पोजेटिव थिंकिंग के ऐसे - ऐसे किस्से सुनने को मिलते हैं कि सारे गरीब लोग इन किस्सों को सुनकर गरीबी की रेखा के पार कूद जायेंगे। इतिहास यह सिद्ध नहीं करता लेकिन सरकार है कि इसे सिद्ध करने पर तुली है।

Thursday, November 18, 2010

तीन कविता

शैलेन्द्र

हिन्दी के सुपरिचित कवि एव वरिष्ठ पत्रकार शैलेन्द्र के अब तक तीन काव्य संकलन प्रकाशित हो चुके हैं। बलिया के मनियार स्बे ५ अक्टूबर १९५६ को जन्मे शैलेन्द्रलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिन्दी में स्नातकोत्तर हैं। पत्रकारिता में एक लंबी संघर्षमय यात्रा पूरी करके इस समय जनसत्ता के कोलकाता संस्करण में प्रभारी संपादक पद पर कार्यरत हैं। कविताओं के साथ ही समय समय पर दिनमान, रविवार, श्रीवर्षा, हिन्दी परिवर्तन, जनसत्ता, कथादेश, पाखी,  आदि पत्र पत्रिकाओं में समाचार कथाएँ, लेख, टिप्पणियों, कुछ कहानियों का प्रकाशन भी होता रहा है

सम्पर्क: , किशोर पल्ली, बेलघरिया
फोन: 09903146990
1
सच के बारे में
आओ
थोड़ा छत पर टहल लें
मकान मालिक के
लौटने तक
चाँदनी तले
थोड़ा हँस-खिलखिलालें
तारों की और नज़र कर लें

कितना अच्छा लगता है
तुम्हारे हाथ में हाथ डालकर
थिरकता खुले आसमान के नीचे
अभी पड़ोस की इमारतें
ऊंचा उठने ही वाली हैं
और उस तरफ
बस रही बस्ती
उफ!
हर तरफ उठ रही हैं लाठियाँ
कमज़ोर जिस्मों को तलाशती
आओ
थोड़ा और करीब आओ
कदम-कदम पर हारते
सच के बारे में
थोड़ा बतिया लें

2
कोलकाता
ऐ मेरे प्यारे शहर
तू जिंदा आबाद रह
तुझको नहीं लगे
किसी दुश्मन की नज़र

न पड़े फिर कभी तुझ पर
किसी अकाल की छाया
दंगे-फसाद से बचा रह
तुझमें फूले-फले
ममता और माया
न लौटे युद्ध
तेरे इरादे
बने रहे
नेक और शुद्ध

करता रह तू
सबकी परवाह
लगे नहीं तुझे
किसी की आह

3
बचपन
एक बचपन
मांगता है
रोबोट राकेट
सुबह सुबह
दूसरा रोटी।

एक बचपन
सिर पर उठा लेता है
पूरे घर को
दूसरा बोझ।

एक बचपन
बनता है मदारी
दूसरा जमूरा।

एक बचपन
पढ़ता है पुस्तकें
दूसरा
कठिन समय को।

बचपन होता है
राष्ट्र का भविष्य ।

Sunday, November 7, 2010

नई परिभाषा

यशेंद्रा  भारद्वाज

‘‘देख रामकली तू परिवार की बडी बहू है इसलिए सर ढाँप कर रखना और  बड़ों के पाँव  छूकर आशीर्वाद लेना ।‘‘

सुहाग सेज पर पति द्वारा दी गई हिदायत को उसने पल्लू से बाँध  लिया था। अपने प्रेम और सेवाभाव से रामकली ने सभी का मन जीत लिया था। जिस देवर को उसने कभी गोद में खिलाया था आज उसकी सगाई की रस्म अदा करने लडकी वाले आ रहे थे।

मन में उठ रहे विचारों को झटक उसने काँजीवरम की साड़ी पहनी , नाक में नथनी पावों को लाल-लाल आलते से और चादी नगों वाले बिछुए  पहन  कर सजाया।

सोलह श्रृंगार कर अपना रूप दर्पण में निहारा और धीरे से साड़ी के पल्लू से अपना सर ढ़ाँप लिया था।

चालीस पार कर चुकने के बाद भी उसकी सुन्दरता ज्यों की त्यों कायम थी किसी नई नवेली दुल्हन की शर्माती सकुचाती वह पति के सामने चली गई थी।

‘‘कैसे लग रही हूँ जी , उसने इठलाते हुए पूछा । ‘‘बेजोड‘‘ परन्तु ये पल्लू सर से उतारो, जानती नहीं क्या तुम्हे इस रूप में देखकर लडकी वाले समझेंगे कि हम असभ्य है, गंवार हैं जो आजकल के जमाने के अनुसार नही चलतें।‘‘ कहते-कहते उसने पत्नी के सर से पल्लू खीच लिया था

उसे लगा था कि जैसे किसी ने उसे भरे बाजार में नंगा कर लिया हो । बडे-बूढ़ो के आगे बिना पल्लू के जाने की कल्पना मात्र से ही उसका मन काँप उठा था

अब उसका ड़रा सहमा सा मन ‘कुलवधु‘ की नई परिभाषा सीखने की कोशिश करने लगा था ।
अन्धा मोड़     सम्पादक  : - कालीचरण प्रेमी   , पुष्पा रघु

Sunday, October 31, 2010

बन्द दरवाजे

सुरेश शर्मा
श्यामलाल का परिवार सुखी परिवार में गिना जाता था रात को काम पर लौटने के बाद दोनो बेटों व बडी बहू के साथ खाना खाते समय टी वी आन कर लेते । सब मिल कर टी वी देखते हुए दिन भर के दुख-सुख व समाचारों का आदान-प्रदान देर तक करते रहते।श्यामलाल सेवानिवृति तथा पत्नी बिछोह के बावजूद कभी भी अकेलेपन का अहसास नही हुआ।
छोटे पुत्र की शादी हुई । दहेज में अन्य सामान के साथ रंगीन टी वी भी आया । श्यामलाल बच्चों के साथ चर्चा करने वाले थे कि दो टी वी का घर में क्या करेगें ? पुराना टी वी बेचकर नया टी वी रख लेंगे। उनका विचार बाहर आ पाता , उससे पूर्व ही छोटू के कमरे से नए टी वी की आवाज बाहर आ गई । खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग बदलता है। एक दिन बडा पुत्र अपने लिए नया टी वी ले आया । अब खाना भी उनके कमरे में जाने लगा।
एक रात अचानक श्यामलाल के सीने में जोर का दर्द उठा । शरीर पसीने से भीग गया । हाथ-पाव कापने लगे। घबराहट बढने लगी तो पानी पीने के लिए उठे । पैरों ने साथ नही दिया। लडखडा कर गिर पडे । दोनो पुत्रों को आवाज लगाई। बन्द दरवाजों से आती धारावाहिक तथा पाप संगीत की मिलीजुली तेज आवाजों में उनकी आवाज कहीं खो गई।
अन्धा मोड(सं-कालीचरण प्रेमी, पुष्पा रघु)-से साभार

Sunday, October 3, 2010

नाटककार शिवराम नहीं रहे




एक अक्टूबर
को अचानक हृदयाघात से उनकी मृत्यु हो गई । वे 61 वर्ष के थे और उर्जा से भरपूर , जन - जन के लिए संघर्ष करने को तत्पर वे एक कुशल संगठनकर्ता , वक्ता और नाटककार थे । सीटू और सी.पी.एम. से आरम्भ कर राजस्थासीटू और एम. सी.पी. आई की यात्रा पूरी की वे एम.सी. पी. आई . के पोलतब्यूरों के सदस्य थे। विकल्प जनवादी सामाजिक सांस्कृतिक मोर्चा के वे राष्ट्रीय अध्यक्ष थे , उनके जीवन काल में उनकी ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित हुई । साहित्य में वामपंथी रूझान वाले सभी संगठनों को साझा मंच पर लाने का वे अथक प्रयास करते रहे।
वे नाटककार तो अच्छे थे ही, कुशल अभिनेता भी थे । वे अपने परिवार में भी प्रिय थे उनका व्यवहार पारावारिक सदस्यों से मित्रता का था ऐसे आत्मीय जन का बिछुड़ना हृदय को दुख से भर देता है। मैं उन्हें हार्र्दिक श्रृद्धांजली अर्पित करते हुए उनके परिवार के प्रति आत्मीय संवेदना प्रकट करता हूW।
नाट~य संस्था ‘पलाश’ और ज्ञानसिंधु अपने श्रृद्धा सुमन उन्हें अर्पित करता है।




Sunday, September 19, 2010

क्या पता बेटा !


क्या पता बेटा !

बच्चे ने टी.वी. देखते हुए पिता से पूछा -
‘पापा , ये बुश अंकल ईराक पर बमबारी कर लोगों को क्यों मार रहे हैं ?
‘बेटा कहते हैं सददाम चाचा के पास जैविक व रासायनिक हथियार है जो अगर अलकायदा को दे दिए तो पश्चिमी राष्ट्रों को बरबाद कर देगा ।
‘ पापा ये जैविक - रासायनिक हथियार कैसे होते हैं ?
‘बीमारी के जीवाणुओं और जहरीली गैसों को वातावरण में छोड़कर , लोगों को बीमार कर मार डालते हे।
‘जहरीली गैसों से मारो चाहे बमों से, मरता तो आदमी ही है ’
‘ हा बेटा ! तुम तो अच्छा तर्क कर लेते हो
‘लेकिन बेटा अमेरिका का आदमी स्पेशल है वह पूरी दुनिया को अपनी मुठ~ठी में कर लेना चाहता है
‘पापा आज खबर है कि सद~दाम पकड़ा गया ।
‘हा बेटा , ईराक अमेरिका के अधीन हो गया है अमेरिका कह रहा है कि अब ईराक में प्रजातान्त्रिक सरकार चुनी जायेगी ।
‘क्या वास्तव में ऐसा ही होगा ?
‘होगा लेकिन वह सरकार अमेरिका के आर्थिक व राजनैतिक हित पूरे करेगी । तेल के कुओं पर तो उसने अपना आधिपत्य कर ही लिया है ।
‘पापा , वह जैविक व रासायनिक हथियार वाली बात सही साबित हुई क्या ?
‘ शत प्रतिशत झूठी थी । जिसके आधार पर बुश ने इराक पर हमला किया था ।
‘तो अब सद~दाम पर क्या आरोप लगेगा ।
‘ यही कि डिक्टेटर होते हुए कुर्दो व जनता पर जुल्म ठाने के आरोप ।
‘ इतनी तबाही के बाद बुश इराकियों को प्रजातंत्र का तोहफा देंगे ।
‘पता नहीं बेटा।

शरीफ लोग
एक सुन्दर शरीफ स्त्री , निपट अकेली बीच बाजार में भूल - भूलैया में पड़े चूहे सी भटकती , हर रास्ते और मोड़ पर बैठे शोहदे उसे दबोचने की फिराक में पीछा कर रहे थे । उनकी तत्परता देखने लायक थी ।
'चूहिया अंतत: दबोच ली जायेगी ' उस सुन्दर स्त्री ने सोचा , और मन ही मन कुछ निर्णय किया ।
देखा एक शरीफ अधेड़ आदमी बाजार से कुछ खरीद कर घर की ओर जा रहा था । वह उसके गले पड़ गई - आप कहाँ चले गये थे मुझे छोड़कर, कब से ढूँढ रही हूँ ' अधेड़ आदमी अवाक देखता रहा - मैं इतनी गई बीती तो नहीं, कसम खाती हूँ तुम्हारी दासी बनकर रहूँगी ।
शोहदे ठिठक गए - जैसे हाथ से शिकार निकल गया हो शरीफ आदमी ने , बीच बाजार में , लोगों को तमाशे का मजा लेते देख , कहा - यहाँ तमाशा मत बनाओ घर चल कर बात करेंगे ।

गर्मी
अप्रत्याशित ही मध्यावधि चुनाव का एलान हुआ जनवरी का महीना कड़ाके की ठण्ड हाथ - पाँव ठंडे हो गये ।
' वोट तो देना ही है , भाई किसे दें? क्यों दें ? और फिर ठंड में हाड कँपाने क्यों जाएँ ?
' आप उसकी फिक्र न करें , कार्यकर्ता ने आश्वस्त करना चाहा
' तो भई गरम कोट का इन्तजाम हो जाये ।
' हो जायेगा , तुम चलो तो सही , पिछ्ली बार कम्बल बाँटे थे कि नहीं ।
' सो तो ठीक है , मगर
' अच्छा - अच्छा चलो , कार्यकर्ता परेशान होकर बोला '
' वे जीप में बैठ गये । लाईन में खड़े , कोट पहने काँप रहे थे ,
हाथों को रगड़कर गर्मी लाने का उपक्रम कर रहे थे
' कार्यकर्ता से बोले भाई हाथ गरम करो , बड़ी ठंड पड़ रही है , कार्यकर्ता ने झुँझलाकर कुछ नोट रखे उसके हाथ पर , और हिदायत दी - ध्यान रखना ।
यह भी कोई कहने की बात है । उन्होंने दाँत निपोरते हुए कहा ।
अब वे पूरी तरह गरम हो चुके थे ।


दबाव
शासक पार्टी टूट रही थी राजधानियों मे भगदड़ मची हुई थी । दिल्ली में ब्रेक - अवे ग्रुप की बैठक चल रही थी । कुछ विधायक भोपाल से भी गए थे । मुख्यमंत्री पर दबाव डालने का इससे सुनहरा अवसर कौनसा हो सकता था ।
मुख्यमंत्री भी चौकन्ने थे ,
दिल्ली की बैठक से लौटे तो मुख्यमंत्री ने खबर ली ।
' तो आप हमारे घटक के मजबूत कार्यकर्ता हैं ?
वे बगलें झाँकने लगे ।
मंत्रीपद का आश्वासन मिला है '
' नहीं ऐसी बात नहीं है, …
' ठीक है एडजस्ट कर लेगें अगले महीने मंत्रीमण्डल का विस्तार कर रहे हैं । तब तक ये लो हवाई टिकट , अगले सप्ताह डेलीगेशन टोक्यो जायेगा घूम - फिर कर आइये । दर्द उठे तो हमे कहिए , क्यों सीधे दिल्ली भाग जाते हैं ?
जी - अच्छा , और लौटते समय वे आश्व्स्त और सतुष्ट थे ।


खदेड़ना
गांव के छोर पर , जहाँ नदी बहती है तथा जहाँ से जंगल आरंभ होता है , वहाँ सियार हूक रहे थे ।
एक पहर से ज्यादा रात निकल चुकी थी , सर्दी के दिन थे और लोग बिस्तरों में घुसने का इन्तजाम कर रहे थे , किंतु सियारों की हुँआ - हुँआ उन्हें नींद नहीं लेने दे रही थी ।
जैसे ही सियारों की हुँआ - हुँआ तेज हुई , गाँव की गलियों में रहने वाले कुत्ते भी भौंकने लगे । अब तो सोना मुश्किल हो गया गांव का एक कर्रा जवान उठा , लोहा जड़ी लाठी उठाई और कुत्तों के पास जाकर बोला क्यों भौंक रहे हो ?
- हम सियारों को खदेड़ रहे हैं, कुत्ते बोले ।
- अच्छा ! उसने अपनी लाठी उठाई और कसकर मारी , कुत्ते बैं - बैं कर दुम दबाये भागने लगे ।
वह चीखा - इसे कहते हैं खदेड़ना कुत्तों ।













Wednesday, September 15, 2010

गोविन्द गौड नहीं रहे ।


गोविन्द गौड ने यूं तो कविता से ही लेखन प्रारम्भ किया , किन्तु वास्तविक पहचान कथाकार के रूप में ही बनाई। दैनिक मिलाप, वीर प्रताप, सारिका, समांतर, आघात, दिव्य आहूति, सूजन, युवा हस्ताक्षर , आत्मविश्लेषण, आगामी , राजस्थान पत्रिका, लोकशासन आदि देश की कई पत्र पत्रिका , लोकशासन आदि देश की कई पत्र. पत्रिकाओं इनकी रचनाए प्रकाशित हुई है।
लघुकथा एवं लघुपत्रिका आंदोलन से सम्बद्व रह कर, रावतभाटा, स्लापर हि.प्र. पानीपत, कोटा से क्रमश: चन्दिका, संवाद, हिमस्नेह, राकेश दीप तथा कदम्बगंध पत्रिकाओं का सम्पादन किया ।
इनका एक कहानी सन्ग्रह असमांतर व लघुकथासंगह ‘प्रहार प्रकाशित हो चुका है । यह सन्ग्रह प्रहार लघुकथा के कारवां को आगे बढ़ाने में निश्चत ही मूल्यवान साबित होगा।
अन्तिम दिनों में परिवारजनों विशेषत: पत्नी से प्रताड़ित थे, और रात दिन उनके षड़यंत्रों से वे चिंतित रहते थे, कि वे अति मानसकि तनाव के शिकार हो गये , जब भी मिलते इसकी विषय पर वे घंटो बोलते रहते । समस्या सुलझाने के प्रयत्न मित्रों ने किये भी लेकिन वे सब असफल रहे । वे शारीरिक व मानसिक रूप से कमजोर होते गए व 18 अगस्त 2010 को इस जग से विदा हो गये।
दिवंगत आत्मा को हमारी ओर से व मित्र लेखकों की हार्दिक श्रद्धांजलि।

Tuesday, August 3, 2010

किस्सा स्थानीय पत्रकार का


किस्सा स्थानीय पत्रकार का
हमारे कस्बें में एक पत्रकार है जो राजधानी से प्रकाशित होने वाले एक प्रमुख हिन्दी अखबार में पत्रकार हैं । अखबार राज्य स्तर का है इसलिए पत्रकार का स्तर भी राज्य स्तर का है । उन्हें अखबार से कोई वेतन नहीं मिलता फिर भी ठाठ से रहते हैं , हजारों रूपये महीने का खर्चा है , आफीस है टेलीफोन है अब फैक्स भी है इज्जतदार लोगों से उनके ताल्लुक है । अखबार के मालिक बहुत होशियार, मुख्य समाचार तो समाचार एंजेंसी से लेते हैं और फी के स्थानीय पत्रकार रख लेते हैं जो गाहक बनाते हैं , पेपर बांटते हैं , विज्ञापन बुक करते हैं और स्थानीय खबरें भेजते हैं । स्थानीय खबरों में थाने - कचहरी की खबरें, कौन गिरफतार हुआ, कोर्ट ने किसको रिहा किया या सजा दी ; मन्त्रियों, अधिकारियो और राजनेताओं के दौरों की खबरें , उदघाटन - शिलान्यास की खबरें धार्मिक व जाति संगठनों की खबरे, दुर्घटना और हादसों की खबरें , कांगस व भारतीय जनता पार्टी की स्थानीय इकाईयों के छुटमयै नेताओं द्धारा मुख्यमंत्री, मन्त्री यहा तक की प्रधानमन्त्री को ज्ञापन चिठठी देकर स्थानीय समस्याओं का समाधान करने की अपील , जैसी खबरें होती हैं , जो अखबार के खाली कालमों को भरने के काम आती है , जिससे अखबार की बिक्री भी बढ़ती है पत्रकार को एक काWलम में चार इंच की न्यूज का पैसा मिल जाता है विज्ञापन पर भी कमीशन मिलता है लेकिन कमाइ 500 -700 से आगे नहीं बढ़ती । उन्हे अखबार की कमाई से मतलब नहीं है । उनके पास अखबार का दिया पहचान पत्र है जो सरकारी क्या निजी बसों में भी आने - जाने के काम आता है । किसी सरकारी डराना धमकाना हो तो भी पहचान पत्र काम आता है । थाने में तो इस पहचान पत्र की बहुत भूमिका है । कई मामले थाने में रफा दफा करवाकर अपना कमीशन प्राप्त करते हैं । ऐसे ही वे कभी तहसील चले जायेंगे , तहसील के कर्मचारियों पर हाथ रखेंगे , ट्रांसफर की धमकी देंगे , बड़े ही शिष्ट अंदाज में तब तहसीलदार पत्रकार की सेवा करने लगेगा । , वो तहसीलदार जो दूसरों की जेब काटता है , पत्रकार उसकी भी काट लेता है इस मामले में ये ठीक करता है कम से कम समाजवादी कार्य तो करता है । ऐसे कई ठिये हैं मसलन शराब का ठेकेदार , जुआघर के मालिक , नगरपालिका के चेयरमेन , पी.डब्लू डी के इन्जीनियर , सिंचाई विभाग व बिजली विभाग के ईंजीनियर । जैसे उनकी सब कोई सेवा करते हैं जो नही करते वे उनके बहमास्त्र के शिकार हो जाते हैं । उनका बहमास्त्र है आपके खिलाफ न्यूज लगा दूंगा । क्योंकि लोग बदनामी से डरते हैं । कुछेक शरीफ इसलिए डरते है कि नंगों से कौन पंगा ले । लेकिन अधिकतर तो दो नम्बर की कमाई वाले ही होते हैं , जिस पर वे इनकम टेक्स तक नहीं देते ऐसे में पत्रकार अपना चार्ज वसूल कर लेता तो बुरा क्या है । जो सेवा करने नहीं पहुचते उनके बारें में न्यूज लगा देते है, इस वास्ते पार्टियों के संगठन काम आते है। विरोधी लोग स्वयं पत्रकार को अधिकारी @ नेताओं की पोल पटटी मय सबूत देते हैं । पत्रकार महोदय उन सबूतों के फाटो स्टेट कापी संबधित अधिकारी के पहुचा देते है। फिर टेलीफोन पर उनके भले की बात कह देते हैं कि सच्चाई जानने के लिए वे दूसरे पक्ष से भी तथ्यों की जानकारी कर लेना जरूरी समझते हैं सो दूसरा पक्ष आतंकित हो सेवा करने पहुच जाता है ।
स्थानीय पत्रकार ने अधिशाषी अभियंता को फोन किया ‘हेलो एक्स.ई.एन. साब कहिए क्या ठाठ है ‘आपकी मेहरबानी है साहब बोले ’ ‘लेकिन आपकी तो मेहरबानी होती ही नहीं’ स्वर व्यंग्यपूर्ण था कहिए क्या सेवा करूं । सेवा का आपने अवसर दिया ही नहीं , सुना है से भरा एक ट्रक स्टोर से रवाना होकर सीधे साहब के बन रहे नये बंगले पर खाली हुआ है, अब यह लगायें कि ये बंगला कौन से साहब का बन रहा हैं ’ पत्रकार का सीधा लक्ष्य अधिशाषी अभियंता ही थे । परन्तु मजाल है एक बार में ही बात तय की जाकर सौदा पटाया जाये । अधिशाषी अभियंता भी कम घाघ नहीं था। सो उन्होनें पत्रकार महोदय को डिनर पर बुलाकर बताया कि देखों अगर पैसे में सौदा पटाओगे तो नुकसान में रहोगे , ज्यादा से ज्यादा पाच हजार , बस केवल एक बार की कमाई और फिर !पत्रकार हाथों पर चेहरा टिकाये उनकी ओर टुकुर टुकुर देख रहे थे । ‘फिर मेरी भी जेब खाली क्यों हो ! सरकारी तिजोरी लबालब भरी है , एक मुठठी मैने निकाली और अगर एक मुठठी आप निकाल लेंगें तो कौनसी तिजोरी खाली हो जायेगी। गंगोत्री से एक लोटा पानी पी लेने से गंगोत्री थोड़े ही सूख जायेगी । ‘तो कैसे क्या किया जाये ! पत्रकार लालायित हो बोले । ‘अभी बगीचों में मिट्टी डालने का टेन्डर निकला है ‘टेंडर मैं भरवा देता हू , काम भी मैं करवा दूंगा तुम तो अपना 20 प्रतिशत प्रोफिट ले लेना ।’ ‘ऐसा हो जायेगा ! ‘हां क्यों नहीं । फिर ऐसे टेंडर निकलते ही रहते है। जैसे देशी खाद लाने के , गडडा खोदने के पेड़ लगाने के , मेरे साथ रहे तो साल में डेढ़ दो लाख की कमाई करवा दूंगा । ‘सच’ उनकी आखें चमक उठी । इससे पत्रकार की स्थिति में सुधार हुआ और उन्हें भी अपराधियों की गेंग में शामिल कर हमेशा के लिए चुप कर दिया ।

Tuesday, July 6, 2010

गिनती’ व ‘बड़बोला’ ’ का मंचन












बड़बोला गिनती’


निर्देशक :- सविता शर्मा , निर्दे’शक :- आशा भारती
नन्हे-मुन्ने बच्चों के लिए कथाकार बलराम अग्रवाल द्वारा लिखी गई अभिनेय नृत्य-नाटिकाओं ‘गिनती का गीत’ तथा ‘हैं जंगल के राजा आप’ का मंचन ‘गिनती’ व ‘बड़बोला’ नाम से ‘पलाष’’ संस्था के तत्वाधान में माडर्न पब्लिक सीनियर सैकेंडरी स्कूल, रावतभाटा के वार्षिकोत्सव पर मई 2010 में किया गया। इन नाटिकाओं के मंचन का निर्देशन श्रीमती सविता शर्मा व सुश्री आशा भारती ने किया किंडर गार्डन के बच्चों ने इसे अभिनीत किया। ‘गिनती’ नाटिका में शीनम, गुनगुन, खुशी, ज्योति, मेघा, शाहिन, कुसुम, लक्षिता, मुस्कान व सुमन तथा ‘बडबोला’ नाटिका में अमन विशनोई, विजय, पीयूष, विकास गुप्ता, भरत, यश, रतन, भैरू व तनिष ने अभिनय किया । गीत-संगीत व नृत्य के माध्यम से अबोध बच्चों को गिनतियां कैसे सिखाई जायें यह ‘गिनती नाटिका में दर्शाया गया। ‘बड़बोला’ में प्रकृति सरंक्षा का संदेश है। छोटे बच्चों द्वारा अभिनीत इन नाटिकाओं को दर्शकों ने तो खूब सराहा ही नन्हें कलाकारों ने भी खूब मौज-मस्ती से अभिनय करके इनका मजा लूटा।

Monday, June 7, 2010

भगीरथ की कविताएं

पानी








पहाड़ों की विशालकाय चट्टानों से
रिसता पानी
‘ओस’ और फर्न के
कोमल पौधों
के बीच से
रेंगता पानी
पहाड़ी झरनों से
गिरता पानी
चट्टानों से टकराता
बर्फ सा ठंडा जल
पानी रिसता है , रेंगता है
गिरता है , पड़ता है
टकराता है
किंतु , टूटता नहीं
अपना वजूद
बरकरार रखता है
पानी









थोर

पहाड़ी चट~टानो के बीच
उगी लम्बी देहवाली
थोर
अभावों के बीच पली
कुरूप, कांटो भरी
किंतु ,हरित देह की
संवेदनशीलता
कितनी गहन है
खरोंच भर से ही
दूध की तरह उफन कर
बह निकलती है।







नागफनी
उंचे कंकरीले टीले पर
किसने जड़ दिये हैं
मोटे , मोटे
नुकीले कांटो से भरे
हाथ
तमाम भदेसपन के बावजूद
कंकरीले टीले की रेतीली माटी से
जल के बूदों से प्राण ग्रहण करता
जीवन
जीने के संघर्ष की प्रक्रिया में
नागफनी के सूर्ख फूल सा
खिल उठता है।


पकड़
चिड़िया फुद की और
पेड़ पर बैठ गई
आंधी आई
पेड़ हिलता रहा
चिड़िया की पकड़
मजबूत होती रही,


Friday, May 21, 2010

श्याम कुमार पोकरा के कहानी संग्रह 'माँ का आँचल' का लोकार्पण

(दाएं से बाएं दिलीप भाटिया , मनोज कुमार शर्मा , राधेश्याम मेहर , विजय जोशी,भगीरथ, हंसराज चौधरी)








श्याम कुमार पोकरा के कहानी संग्रह "माँ का आँचल " का लोकार्पण दिलीप भाटिया , मनोज कुमार शर्मा, राधेश्याम मेहर , विजय जोशी, भगीरथ, हंसराज चौधरी ने किया इस अवसर पर बोलते हुए भगीरथ ने कहा कि श्याम पोकरा ग्रामीण अँचल के कथाकार हैं । इनकी कहानियों के परिवेश व भाषा में गांव बसा है । सामाजिक सरोकारो से ओतप्रोत होती 'आम का पेड़ , दादी माँ , भ्रूण रक्षा , व माँ का आँचल इस संग्रह की विशिष्ट कहानियाँ हैं 'दाढ़ देवी' कहानी की अपेक्षा सिने पटकथा ज्यादा लगती है 'खप्पर' जबरदस्त कथा है जो अंधविश्वास को उघाड़ते - उघाड़ते उसे पुख्ता कर देती है । लेखक को ऐसे मौको पर सचेत रहने की जरुरत है । वरिष्ठ कथाकार राधेश्याम मेहर ने श्यामकुमार पोकरा से अपने सबंधों का खुलासा करते हुए उनके सरल और आत्मीय स्वभाव से सभी को परिचित कराया । युवा कथाकार विजय जोशी ने प्रतिभावान रचनाकार श्याम पोकरा को बधाई देते हुए कहा कि हर वर्ष कम से कम इनकी एक पुस्तक अवश्य प्रकाशित होती है इनकी सर्जना को सलाम करते हुए आशा व्यक्त की कि उनकी सर्जनात्मकता और आगे तक जायेगी।

Tuesday, May 4, 2010

भीतर का सच


अशोक भाटिया
बच्ची सो चुकी थी । वह खाना खाकर खाली था। उसने काम के हिस्से के तौर पर, ब्रश किया, टी.वी. ऑन किया और बैड पर पसर गया । उधर रमा सुबह के लिए दही जमाने, सब्जी बनाने और कपड़े तहाने के बीच , ताबड तोड घुम रही थी । वह खाली हुई तो पति ने बाहरी दरवाजे बंद कर दिये ।
''आज तो कई दिन हो गये..........'' विशाल ने चादर खोलते हुए कहा
''इस वक्त तो में थककर चूर हो जाती हू।...........'' रमा ने कमर सीधी करते हुए कहा।
वह सोना चाहती थी, पर उसने सोचा - ''ये नाराज हो गये , तो जो थोड़ा बहुत काम करते हैं , वह भी नहीं करेंगे''
''अब तो रितु ढाई साल की हो गई ! '' विशाल ने रमा को चादर ओढते हुए कहा
''अभी बहुत छोटी है, थोड़ी और बड़ी हो जाये......''
''.......''
''मैं तो कहती हूँ..... एक बच्चा ही काफी है हम दोनो नौकरी - पेशा है। बच्चे पालने आजकल बड मुश्किल है ...''
''जो आयेगा, वह पल भी जायेगा... हमे क्या कमी है? ''
सुनकर रमा पल - भर सोच में डूब गई .... फिर मुस्कान और गम्भीरता को जोड कर बोली -''अच्छा एक बात बताओ... अगर हमारा पहला बच्चा लड का होता, तो भी क्या दूसरे के बारे में सोचते ? ''
''तो क्या तू यह कहना चाहती है , कि मैं लड के की चाह में ही , दूसरा बच्चा कह रहा हूँ !'' विशाल ने अपने मन पर प्रश्न -चिन्ह को तुरंत हटाना चाहा ।
''आदमी लाख लबादा ओड कर आ जाये , औरत उसका मन ताड ही लेती है!'' यह सुनकर विशाल मानो हिल गया। उसने सोचा -''इसे आज क्या हो गया है! '' और सहज होने की कोशिश करते हुए उसने कहा -''तो चलो , इसमें बुराई क्या है? लडकी तो है ही लड का भी हो जायेगा , तो जिंदगी में दोनो तरह का ऐक्सपीरियंस हो जायेगा.......''
''लेकिन यह तो किसी के बस का नहीं , कि क्या होगा ? कार्नर वाले देसराज ने इसी चक्कर में पॉच लड कियॉं पैदा कर ली। अब पछता रहे हैं!'' विशाल के मर्म पर चोट पड़ी थी , ''क्यों नहीं किसी के बस का ..?'' तिलमिलाते हुए वह बोला -''कई औरतें तो लड कियों का ठप्पा लेकर आती हैं!''
''ऐसी बात नहीं!'' रमा ने थोड़ा खिसकते हुए कहा- ''औरत तो मर्द का ही सूक्ष्म रूप होती है।''
''मर्द तो सप्लाई ही कर सकता है ग्रहण तो औरत को करना होता है वह क्या ग्रहण करती है। इसी पर सब कुछ है!'' विशाल रौ में कह गया।
सहसा दोनों के बीच एक सन्नाटा पसर गया रमा दीवार पर टंगे, अर्द्ध नारीश्वर का चित्र देखने लगी उसने सोचा-''औरत तो सिर्फ सॉंचा है।''
थोड़ी देर बाद विशाल की ओर मुड कर वह बोली -''सांइस तो आपने भी पढी है। औरत के पास तो सिर्फ एक्स गुण होते हैं । मर्द के पास एक्स और वाई दोनों होते हैं'' वह गम्भीर हो गई थी,
विशाल ने उसकी बात नहीं सुनी। वह अभी उसका पिछला तर्क ही पचा नहीँ पाया था वह बोला - ''हो सकता है वाई गुण तूने लिए ही न हो....''
''ऐसे तो मैं भी कह सकती हूँ कि हो सकता है आपसे सिर्फ ऐक्स गुण ही आये हों.... ''रमा भी रौ में कह गई,
यह सुनकर विशाल पूरी तरह जल - भुन गया ,उसेन मूँह दूसरी तरफ घुमा लिया रमा ने उसके हाथ में हाथ रखते हुए कहा-''यह सब तो संजोग होता है , इसमें कोई कुछ नहीं कर सकता न आप, न मैं....''
विशाल का मन अभी बड़ा नहीं हो पा रहा था, हालांकि बात उसे जॅंच जरूर गई थी।
(अंधेरे की ऑंख पुस्तक से)