Saturday, July 3, 2021

 

अनुक्रमणिका

क्र.

कथाएँ

पृष्ठ

 

 

 

अग्रलेख&

लघुकथा लेखन की सार्थकता

xi

1.

पेट सबके हैं

1

2.

आग

3

3.

सोतेवक्त

6

4.

गोली नहीं चली

9

5.

शर्त

11

6.

तुम्हारे लिए

13

7.

फूली

14

8.

बघनखे

17

9.

दाल-रोटी

18

10.

कनविंस करने की बात 

19

11.

शाही सवारी

22

12.

आत्मकथ्य

24

13.

दुमवाला आदमी 

26

14.

औरत

30

15.

जनता-जनार्दन

32

16.

टेक्टिकल लाइन

34

17.

ओवरटाइम 

36

18.

पिता,पति और पत्नी

39

19.

दोजख

41

20.

मेह बरसे तो नेह बरसे

41

21.

सही उपयोग

43

22.

नाटक

45

23.

सूना आकाश 

47

24.

कछुए

49

25.

हक

51

26.

खामोशी 

54

27.

भीख

56

28.

युद्ध 

58

29.

शिखंड़ी

61

30.

मजबूरी और जरुरत

63

31.

लोमड़ी 

65

32.

शिक्षा

67

33.

लाइसेंस 

70

34.

राहत कार्य

71

35.

अवसरवादी

73

36.

चियर्स

75

37.

दहशत

77

38.

यस सर 

79

39.

दुर्भाग्य

82

40.

बेदखल 

84

41.

दुपहरिया

86

42.

अफसर 

88

43.

चेतना

91

44.

चिनगारी

93

45.

आतंक

95

46.

अंधी दौड़

97

47.

रोमांस के रंग

98

48.

अंतहीन ऊंचाईयां

100

49.

धापू घाचण सोचती है 

102

50.

अँधेरे द्वीप

104

51.

फैसला

106

52.

मुनाफाखोरी

108

53.

आत्महंता

110

54.

हड़ताल

112

55.

मंथन

114

56.

संगठित कार्यवाही

115

57.

टूल

117

58.

बीरबल के तोते

118

59.

राजनीति

120

60.

आरोप 

122

61.

रोजगार का अधिकार

124

62.

अंतर्द्वंद्व

127

63.

मुक्तिदाता

130

64.

मोहभंग

132

65.

दौरा

135

66.

सभा चालू रक्खो

137

67.

हथकण्डे 

138

68.

आधी रोटी की तसल्ली

140

69.

इक्कीसवीऺसदी

142

70.

लोकतंत्र के पोषक

146

71.

अपना-अपना दर्द

148

72.

मकान

150

73.

विवाह

152

74.

शहंशाह और चिड़िया 

153

75.

सयानी लड़की       

155

76.

परिशिष्ट

157

परिशिष्ट

पेट सबके हैं:चिंताओं की मुखाग्नि-राधेलाल बिजघावने

पेट सबके हैं:`व्यवस्था विरोध के उच्च आयाम’ वेद प्रकाश अमिताभ

लघुकथा के पर्याय : भगीरथ  सतीश राठी

उमेश महादोषी के आलेख ‘अद्यतन होती लघुकथा’ का एक अंश

डॉ. पुरुषोत्तम दुबे के आलेख ‘हिंदी लघुकथा-गंगा के संवाहक : भगीरथ’ का एक अंश 

 

 

 

 

 


 

 

अपनी बात

 

’पेट सबके हैं’ पुस्तक १९९४ में प्रकाशित हुई थी। तबसे यह कथा संग्रह लघुकथा क्षेत्र के रचनाकारों के बीच चर्चा का विषय रहा है। इस जरुरी और महत्त्वपूर्ण पुस्तक ने लघुकथा को प्रतिरोधी शक्ति के रूप में चिन्हित किया,  जो आज भी एक मानक के रूप में मान्य है। व्यंग्य इसकी शक्ति है और व्यंजना इसकी ताकत। शब्द शक्ति को पहचान कर उसका संयमित उपयोग लघुकथा के सौन्दर्य में अभिवृद्धि करता है। अर्थगर्भी शब्द अर्थ के चिंतन विस्तार को संभव बनाते है। कबीर अपने दोहों के माध्यम से लक्षित लोगों पर शब्द की चोट किया करते थे। चाहे  मुल्ले पंडित हो या सामाजिक परम्पराएँ। कबीर की इस चोट ने ही उन्हें अब तक जिन्दा रखा है। ’शब्द की चोट’ क्या होती है यह इस संग्रह की बहुत सी रचनाओं में लक्षित की जा सकती है जैसे तुम्हारे लिए, शर्त, पेट सबके हैं,  बघनखे, दाल-रोटी इत्यादि। लघुकथा और उसके रचनाकार अब ’शब्द की चोट’ को अच्छे से समझने लगे हैं और उसका प्रयोग अपनी रचनाओं में भी करने लगे हैं।

चूँकि यह पुस्तक अब अप्राप्य है और यदाकदा लघुकथा के विद्यार्थियों को इसकी जरुरत पड़ती रहती है इसलिए इसका पुनः प्रकाशन आवश्यक समझा गया। अब इसे कुछ संशोधित और परिवर्द्धित संस्करण के रूप में ऑनलाइन प्रकाशन से प्रकाशित करवाया ताकि इसकी उपलब्धि प्रिंट ऑन डिमांड के माध्यम से हमेशा बनी रहे।

इस पुस्तक में अग्रलेख ’लघुकथा लेखन की सार्थकता’ और पचहत्तर लघुकथाओं के साथ एक परिशिष्ट भी दिया है जिसमें कुछ विद्वजनों ने इस पुस्तक के बारे में अपना अभिमत अंकित किया है। उन्होंने संग्रहित लघुकथाओं पर विचार करते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ की है जो मेरे लिए प्रेरणा और पथप्रदर्शक बनी रहेगी। और लघुकथा के रचनाकारों के लिए भी उपयोगी साबित होगी। बदलाव सिर्फ इतना है कि तीन अप्रासंगिक रचनाओं की जगह दूसरी लघुकथाएँ इस संग्रह में शामिल की गई हैं।

सम्पर्क 228, नया बाजार,

रावतभाटा-323 307 राजस्थान

मो.09414317654

Email- gyansindhu@gmail.com

 

 

 

पेट सबके हैं

वरिष्ठ कथाकार भगीरथ की चुनिऺदा

लघुकथाओऺ का सऺग्रह

 

 

 

 

 

 

 

 

 

भगीरथ


 

 

 

 

समर्पण

Ø वेद प्रकाश अमिताभ

Ø राधेलाल बिजघावने

Ø सतीश राठी

Ø पुरुषोत्तम दुबे

Ø  उमेश महादोषी 

और

Ø ‘पड़ावऔरपड़ताल’ शृंखला के शिखर पुरूष

Ø मधुदीप को


 

भगीरथ की लघुकथाएँ

इस पुस्तक पूरी यहाँ दी जायगी. एक एक पोस्ट 
 




  पेट सबके हैं

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 


 

Website: - www.booksclinic.com

B.D. Complex, Near Tifra Over Bridge, Bilaspur, Chhattisgarh, India, 495001

 

 

 

This book has been published with all reasonable efforts taken to make the material error-free after the consent of the author. All rights reserved no part of this book may be reproduced, stored in a retrieval system, or transmitted, in any form by any means, electronic, mechanical, magnetic, optical, chemical, manual photocopying, recording or otherwise, without the prior written consent of its writer.

 

 

ISBN:

Book: Fiction

First Edition Published by

Booksclinic Publishing 2020

Copyright ©Bhagirath2020

Price: Rs.

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

Printed in India

Sunday, October 25, 2020

 छोटी कथाओं की बड़ी बात 15

सन्देश
आलोक भारती
चिड़िया ने कली के भीतर चोंच डालकर उसे हिलाया. ‘उफ्फ ! मेरा सर्वस्व ही चूस लिया !’ कलि ने वेदना प्रकट की. ‘इतनी दूर से तेरे प्रियतम का सन्देश लाई हूँ, और मैं अपना मुँह भी मीठा न करूँ ?’ चिड़िया मुस्कराई और उड़ गई.
अहंकार
आलोक भारती
एक महाशय ने दियासलाई की डिबिया खोली. तीलियाँ खिलखिला पड़ी. एक तिल्ली ने ऐंठकर कहा, ‘मैं कितनी शक्तिशाली हूँ, मेरे एक इशारे पर आग की चिंगारियां निकलती है. मैं क्षणभर में सभी को भस्म कर सकती हूँ.’ महाशय ने सहजता से कहा, ‘ऐ तिल्ली ! तेरा इतराना ठीक नहीं है. किसी को जलाने से पहले तुम्हें खुद भी जलना पड़ेगा. खुद भस्म होकर ही तुम दूसरों को भस्म कर सकोगी. तेरा जलना सभी देखेंगे परन्तु तू किसी का जलना नहीं देख सकेगी. तेरा तो अस्तित्व ही भस्म हो जायगा ...’


Saturday, October 24, 2020

  छोटी कथाओं की बड़ी बात -14

शिलान्यास –अशोक मिश्र

हरिजनों के आवास के लिए बनायीं गई ‘इंदिरा आवास कॉलोनी’ बाढ़ का एक धक्का भी न झेल पाई और अब वहां पर किसी ईट पत्थर का नामोनिशान तक न रह गया था. फिर भी वहां पर एक दीवार खड़ी थी अपनी पूरी मजबूती के साथ. बाढ़ भी जिसका बाल बांका न कर सकी थी. वह थी शिलान्यास  के  पत्थरवाली दीवार. जिस पर लिखा था-प्रधानमंत्री द्वारा उद्घाटित देश की खुशहाली एवं तरक्की के लिए.



आँखें –अशोक मिश्र

निर्दोष युवक को जब फांसी होने लगी तो जेलर ने उसकी अंतिम इच्छा पूछी, “तुम्हारी मरने से पूर्व कोई अंतिम इच्छा हो बताओ!”                                                          “क्या आप पूरी कर सकेंगे ?”   


एक                                                                                “पूरा प्रयास करेंगे.”                                                                    “तो सुनो और कान खोलकर सुनो. मैं अपनी दोनों आँखें इस देश की अन्धी न्याय-व्यवस्था को देना चाहता हूँ...|”


Thursday, September 24, 2020

 छोटी कथाओं की बड़ी बात -13






गाँधी भक्त बन्दर- गिरीश पंकज

देश आजाद हुआ, तो गांधीजी ने अपने तीनों बंदरों से कहा-  ‘जाओ देश सेवा करो, मगर ध्यान रहे, बुरा मत करना, मत कहना और मत सुनना.’  तीनों ने गांधीजी का कहना माना और बुरा करने, देखने एवं सुनाने के लिए निजी सहायक रख लिए और निश्चिन्त होकर राजनीति करने लगे.

जेंटलमेन प्रोमिस- गिरीश पंकज


पिछले साल की तरह इस बार भी ‘वे’ बाढ़ की तबाही का हवाई सर्वे कर रहे थे। लोग बह रहे हैं, मरे पड़े हैं, घर डूब गए है। ऊपर से ऐसे दृश्य निहारो, तो बड़ा रोमांचक होता है. मीडिया के सामने आंसू बहा कर वे घर पहुंचे तो पत्नी बोली, ”आप बड़े वो हैं। इस बार भी अकेले-अकेले उड़ गए”। बच्चे बोले, ”हम भी एन्जॉय करते पॉप”। महोदय ने शरमाते हुए कहा, ”अरे, डोंट बादर, तबाही तो आती रहती है। अगली बार साथ-साथ चलेंगे। इट इज जेंटलमेन प्रोमिस।”
संतुष्ट हो कर पत्नी लेडीज़ क्लब के लिए निकल गयी और बच्चे ‘लाँगड्राइव’ पर।