Monday, August 31, 2009

मकड़ियाँ

'ज्ञानसिंधु' में आपका व्यंग्य 'क्रेडिट कार्ड' पढ़ा। बहुत बढ़िया लगा। बाज़ारवार के चलते क्रेडिट कार्ड की त्रासदी को झेलते आज के मध्यम-निम्न मध्यम वर्ग के आदमी की त्रासदी को रेखांकित करने का प्रयास दो तीन वर्ष पूर्व मैंने अपनी लघुकथा 'मकड़ियां' में किया था। इसे सबसे पहले पूर्णिमा बर्मन जी ने 'महानगर की लघुकथाएं' के अन्तर्गत अपनी वेब पत्रिका "अभिव्यक्ति" में "मकड़ी" शीर्षक से छापा था और अभी गत वर्ष 2008 में कमल चोपड़ा ने अपने वार्षिक संकलन "संरचना" भी इसे शामिल किया है। आपको यह लघुकथा भेज रहा हूँ। क्या आप इसे 'ज्ञानसिंधु' के पाठकों के सम्मुख रखना चाहेंगे ?
मकड़ियाँ
सुभाष नीरव
0अधिक बरस नहीं बीते जब बाजार ने खुद चलकर उसके द्वार पर दस्तक दी थी। चकाचौंध से भरपूर लुभावने बाजार को देखकर वह दंग रह गया था। अवश्य बाजार को कोई गलत-फहमी हुई होगी, जो वह गलत जगह पर आ गया - उसने सोचा था। उसने बाजार को समझाने की कोशिश की थी कि यह कोई रुपये-पैसे वाले अमीर व्यक्ति का घर नहीं, बल्कि एक गरीब बाबू का घर है, जहां हर महीने बंधी-बधाई तनख्वाह आती है और बमुश्किल पूरा महीना खींच पाती है। इस पर बाजार ने हँसकर कहा था, ''आप अपने आप को इतना हीन क्यों समझते हैं ? इस बाजार पर जितना रुपये-पैसों वाले अमीर लोगों का हक है, उतना ही आपका भी ? हम जो आपके लिए लाए हैं, उससे अमीर-गरीब का फर्क ही खत्म हो जाएगा।'' बाजार ने जिस मोहित कर देने वाली मुस्कान में बात की थी, उसका असर इतनी तेजी से हुआ था कि वह बाजार की गिरफ्त में आने से स्वयं को बचा न सका था। अब उसकी जेब में सुनहरी कार्ड रहने लगा था। अकेले में उसे देख-देखकर वह मुग्ध होता रहता। धीरे-धीरे उसमें आत्म-विश्वास पैदा हुआ। जिन वातानुकूलित चमचमाती दुकानों में घुसने का उसके अन्दर साहस नहीं होता था, वह उनमें गर्दन ऊँची करके जाने लगा।
धीरे-धीरे घर का नक्शा बदलने लगा। सोफा, फ्रिज, रंगीन टी.वी., वाशिंग-मशीन आदि घर की शोभा बढ़ाने लगे। आस-पड़ोस और रिश्तेदारों में रुतबा बढ़ गया। घर में फोन की घंटियाँ बजने लगीं। हाथ में मोबाइल आ गया। कुछ ही समय बाद बाजार फिर उसके द्वार पर था। इस बार बाजार पहले से अधिक लुभावने रूप में था। मुफ्त कार्ड, अधिक लिमिट, साथ में बीमा दो लाख का। जब चाहे वक्त-बेवक्त जरूरत पड़ने पर ए.टी.एम. से कैश। किसी महाजन, दोस्त-यार, रिश्तेदार के आगे हाथ फैलाने की जरूरत नहीं।
इसी बीच पत्नी भंयकर रूप से बीमार पड़ गई थी। डॉक्टर ने आप्रेशन की सलाह दी थी और दस हजार का खर्चा बता दिया था। इतने रूपये कहां थे उसके पास ? बंधे-बंधाये वेतन में से बमुश्किल गुजारा होता था। और अब तो बिलों का भुगतान भी हर माह करना पड़ता था। पर इलाज तो करवाना था। उसे चिंता सताने लगी थी। कैसे होगा? तभी, जेब मे रखे कार्ड उछलने लगे थे, जैसे कह रहे हों- हम है न ! धन्य हो इस बाजार का! न किसी के पीछे मारे-मारे घूमने की जरूरत, न गिड़गिड़ाने की। ए.टी.एम.से रूपया निकलवाकर उसने पत्नी का आप्रेशन कराया था।
लेकिन, कुछ बरस पहले बहुत लुभावना लगने वाला बाजार अब उसे भयभीत करने लगा था। हर माह आने वाले बिलों का न्यूनतम चुकाने में ही उसकी आधी तनख्वाह खत्म हो जाती थी। इधर बच्चे बड़े हो रहे थे, उनकी पढाई का खर्च बढ़ रहा था। हारी-बीमारी अलग थी। कोई चारा न देख, आफिस के बाद वह दो घंटे पार्ट टाइम करने लगा। पर इससे अधिक राहत न मिली। बिलों का न्यूनतम ही वह अदा कर पाता था। बकाया रकम और उस पर लगने वाले ब्याज ने उसका मानसिक चैन छीन लिया था। उसकी नींद गायब कर दी थी। रात में, बमुश्किल आँख लगती तो सपने में जाले ही जाले दिखाई देते जिनमें वह खुद को बुरी तरह फंसा हुआ पाता।
छुट्टी का दिन था और वह घर पर था। डोर-बेल बजी तो उसने उठकर दरवाजा खोला। एक सुन्दर-सी बाला फिर उसके सामने खड़ी थी, मोहक मुस्कान बिखेरती। उसने फटाक- से दरवाजा बन्द कर दिया। उसकी सांसे तेज हो गई थीं जैसे बाहर कोई भयानक चीज देख ली हो। पत्नी ने पूछा, ''क्या बात है ? इतना घबरा क्यों गये ? बाहर कौन है ?''
''मकड़ी !'' कहकर वह माथे का पसीना पोंछने लगा।
00

Thursday, August 20, 2009

क्रेडिट कार्ड

फ्रीज खरीदना है ? पैसे नहीं है ? कोई बात नहीं , चिंता मत कीजिए , हम हैं न आपकी सेवा के लिए हमारा क्रेडिट कार्ड लीजिए, दुकानदार को दीजिए , एक साईन कीजिए और फ्रीज ले आइये । है न सरल तरीका । क्या कहा ? आपके पास आई.सी.आई.सी.आई का क्रेडिट कार्ड पहले से ही है । कोई बात नहीं , आप दूसरा लें, जरूरत आपको फिर भी पड़ सकती है । खुदा न करे बीमार हो जायें , आपरेशन कराना पड़ जाये , सीधे भरती हो जाइये , और निश्चित होकर इलाज कराएं और स्वस्थ होकर घर जायें। तब आप हमें धन्यवाद देंगे कि बंदे ने क्या चीज दी थी - क्या कहते है? , आपके पास तीन -2 क्रेडिट कार्ड हैं अच्छा है , चौथा भी लीजिए । चौथा लेने में कोई पाबंदी नहीं है ।
चले जाइए ! चले जाइए ! बहुत हो गया अभी सांस लेने की जगह बची है , चौथा देकर , तुम मुझे कर्जे में पूरा ही डूबा दोगे । एक दिन ऐसा आयेगा कि मेरी लाश पंखे से झूलती नजर आयेगी ।
क्यों ? क्या हुआ मैं तो तुम्हारी सहुलियत के लिए कह रहा हूँ कूज पर मजे करने हो , हवाई जहाज का सफर करना हो , विदेश यात्रा करनी हो । होटल में रूकना हो , विदेशों में खरीद - फरोख्त करना हो क्रेडिट कार्ड सब दुखों की रामबाण दवा है । रूपया पैसा ले जाने की झंझट नहीं । चोरी -चकारी का डर नहीं । बिंदास विदेशी यात्रा करो । हमारे कार्डधारी को 20 प्रतिशत डिस्काउन्ट मिलता है और हवाई कम्पनियाँ , होटल आदि बम्पर लाटरी भी निकालते है , कहीं आपकी लाटरी लग गई तो क्या कहने , सारे कर्जे दूर , जुहू बीच पर नया बंगला , मर्सडीज बेज गाड़ी इन्तजार करेगी ।
तब तो आप हमें अवश्य धन्यवाद देंगे
‘मेरे बाप , मैं डूब चुका हूँ क्रेडिट कार्ड वाले कई तरह के चार्ज लेकर , कर्ज की राशि पर 40 प्रतिशत तक ले लेते हैं बैंक में जमा कराओं तो साले 6 प्रतिशत देते है । हमें लूटने के क्या -2 इन्तजाम कर रखे है ।
मत लीजिए । बिल्कुल मत लीजिए । मैं नहीं चाहता कि आप क्रेडिट कार्ड लें
वे अपने बैग से दूसरा फार्म निकालते हैं
‘हमारी कम्पनी 0 प्रतिशत ब्याज दर कर्ज देती है मनचाही किश्तों में भुगतान कीजिए ।
लीजिए यहाँ साइन कीजिए पैसा उठाइये और कार ले आईये , एसी. ले आइये जो चाहो सो ले आओ ,
हम आपकी सेवा में हमेशा हाजिर है ।
अब सर यह मत कहिएगा कि 0 प्रतिशत से भी कम ब्याज लें ।
वे हैं हैं कर हॅंसने लगे । वह चिंतित सा सोचने लगा साइन करे या न करे एसी. तो लेना ही हैं सो फाइनेंस कम्पनी के कागजात पर हस्ताक्षर कर देता है ।
आखिर मछली जाल में फँस ही गयी ।

Sunday, August 9, 2009

डा. शकुंतला किरण की शोध पुस्तक ‘हिन्दी लघुकथा ’ का लोकार्पण

डा. शकुंतला किरण की शोध पुस्तक ‘हिन्दी लघुकथा ’ का लोकार्पण दिनांक 26 जुलाई 2009 , जवाहर आडोटोरियम, अजमेर में लघुकथा के वरिष्ठ कथाकार भगीरथ व बलराम अग्रवाल ने किया , साथ ही उनकी ही कविता की पुस्तक ‘ एहसासों के अक्स ’ का लोकार्पण कुमार शिव व ताराप्रकाश जोशी ने किया ।
इस अवसर पर बोलते हुए प्रो. अनन्त भटनागर ने कहा कि यह एक प्रामाणिक शोध प्रबंध है , जिसमें लेखिका का श्रम स्पष्ट झलकता है । हिन्दी लघुकथा के साथ - साथ अन्य भाषाओं की कथाओं का लेखा -जोखा भी लेखिका ने प्रस्तुत किया है । उन्होनें पुस्तक के पहले ,चौथे और पांचवे अध्याय का विशेष उल्लेख करते हुए कहा कि पहले अध्याय में उन राजनैतिक , सामाजिक , आर्थिक परिस्थितियों का वर्णन किया गया है जो लघुकथा के उदय में महत्वपूर्ण साबित हुई है लघुकथा के तात्विक विवेचन में उन्होने परिभाषा , बोधकथा , भावकथा , दंतकथा , लतीफा, कहानी आदि की अवधारणा को स्पष्ट किया है । पाँचवे अध्याय में लघुकथा की विशेषताओं और छठे में जीवन मूल्यों पर चर्चा की है ।
‘हिन्दी लघुकथा ’ पर आगे चर्चा करते हुए बलराम ने कहा कि शोध का विषय सन् 1975 में ही स्वीकृत हो गया था और 1981 तक थिसिस स्वीकृत भी हो गई थी लेकिन प्रकाशन करीब तीन दशक बाद हुआ । इस महत्वपूर्ण पुस्तक को प्रकाशन के प्रति लेखिका उदासीन ही रही । लेकिन जब इन्दौर के डा. सतीश दुबे ने बताया कि आपकी शोध के अंशों की चोरी होती जा रही है तो मित्रों के आग्रह पर उन्होने इसे अन्ततः प्रकाशित करने का मन बनाया ,
सौभाग्य का विषय है कि प्रथम लघुकथा संग्रह ‘गुफाओं से मैदान की ओर’ के सम्पादक भगीरथ व ‘हिन्दी लघुकथा’ की पहली शोध पुस्तक की लेखिका डा. शकुन्तला किरण आज दोनों मंच पर विराजमान है और दोनों राजस्थान से है । हमारे लिए यह गर्व का विषय है । इस पुस्तक की सबसे महत्वपूर्ण बात है कि जो मानदंड डा. शंकुतला किरण ने दिये वे आज भी लघुकथा में मान्य है ।
चर्चा को आगे बढ़ाते हुए भगीरथ ने कहा कि यह पुस्तक गहन अध्ययन , मनन , चिंतन व विशलेषण का परिणाम है । ऐसे समय जब लघुकथा आकार ग्रहण कर रही थी , जब साहित्यकार इसका नाम आते ही नाक - भौं सिकोड़ते थे , विश्वविद्यालय द्धारा इस विषय को स्वीकृती देना निश्चय ही महत्वपूर्ण रहा । इसके लिए शोधार्थी एवं राज. विश्वविद्यालय धन्यवाद के पात्र है । इनका शोध काॅपी - पेस्ट या कट - पेस्ट नहीं है जैसे कि डाॅ भटनागर ने कहा यह एक प्रमाणिक ग्रन्थ है । लघुकथा जगत में इस पुस्तक का जबरदस्त स्वागत हो रहा है और आगे के शोधार्थी इस पुस्तक के सन्दर्भ के बिना अपना शोध पूरा न कर पायेंगे । यह आलोचना की सबसे महत्वपूर्ण पुस्तक है जिसका आने वाले कई वर्षो तक लघुकथा विमर्श में विशिष्ट स्थान रहेगा ।
डा. शंकुतला किरण ने अपने वक्तव्य में कहा कि वह लघुकथा की तरफ तेजी से आकृष्ट हुई और लघुकथा लेखन में संलंग्न हो गई । जब शोध के विषय के चयन की बात आई तो सबसे पहले मानस पर लघुकथा का विषय ही रहा । वह लघुकथा जगत से जुड़ी हुई थी इसलिए संदर्भ सामग्री के लिए ज्यादा मुश्किल नहीं पड़ी , जब आपातकाल के दौरान ‘सारिका’ के लघुकथा विशेषांक की कई रचनाओं पर सेंसर ने काली स्याही पोत दी तब उन्हें लगा कि यह एक शक्तिशाली विधा है , और वह इस शोध पर जुट गई । व्यवस्था के विकृत रूप देखने हो और उनके प्रति आक्रोश व्यक्त करना हो तो लघुकथा एक सशक्त विधा है। प्रकाशन में देरी के कारण बताते हुए कहा कि सक्रिय राजनीति और फिर आध्यात्म की ओर झुकाव ने उन्हें साहित्य के प्रति उदासीन बना दिया था लेकिन अब ‘ अहसासों के अक्स ’ कविता संग्रह और ‘ ‘हिन्दी लघुकथा ’ के प्रकाशन के साथ ही पुनःसाहित्य में प्रवृत हूँ क्योंकि अध्यात्म की तरह साहित्य भी सुकून देता है

Thursday, July 23, 2009

इक्कीसवी सदी

मदारी डुगडुगी बजाता हुआ गोलचक्कर काटता है । लोग जमा हो रहे है । लो , मजमा लग गया है ।
'' हाँ तो भाईसहाब , मेहरबान , कद्रदान कमर कस कर बैठिए और एक से एक नायाब खेल देखिये ।
जमूरे !
हाँ उस्ताद
जायेगा?
हाँ जाऊंगा ।
कहाँ जायेगा ?
इक्कीसवी सदी में ।
ये मुँह और मसूर की दाल (मदारी हँसता है ) खैर , अच्छे - अच्छे खाँ इक्कीसवी सदी में जा रहे हैं तो तू पीछे क्यों ?
जमूरे !
हाँ उस्ताद
जरा पलट कर देख
इक्कीसवी सदी में जानेवाला पलट कर नहीं देखता
तो आगे देख
चकाचौंध में कुछ दिखाई नहीं पड़ रहा है उस्ताद
तो ये चश्मा ले , इसे पहन और ठीक से देख अब दिखाई देता है
हाँ उस्ताद
क्या देखता है
मन्त्रीजी विदेशी कम्पनियों से तोपें , पनडुब्बियां और लड़ाकू विमान खरीद रहे हैं
और ?
और भड़वे तालियाँ बजा रहे हैं
अच्छा बता मन्त्रीजी क्या भाषण दे रहे हैं
कह रहे हैं विदेशी तकनीक और पूँजी को अपनाकर हम स्वदेशी बना रहे हैं और देश को आत्मनिर्भर कर रहे हैं
'अबे ठीक से बोल , कहीं मन्त्रीजी खुद तो आत्मनिर्भर नहीं हो रहे हैं '
मैं क्या जानू ! उस्ताद
दिमाग पर जोर डाल । विदेशों में सम्पति तो नहीं खरीद रहे हैं मन्त्रीजी । आखों की सर्च लाईट से देख
स्वीस बैंक के खाते में बैंलेस बढ़ तो नहीं रहा है ।
जमूरे !
हाँ उस्ताद
अब जरा आगे चल
चल दिया
क्या देखता है ?
शिष्ट मंडल विदेश रवाना हो रहा है
यानि लग्गे - भग्गे भी पिकनिक पर जा रहे हैं
नहीं उस्ताद , देश को आगे बढा कर इक्कीसवीं सदी में ले जाना है तो विदेश तो जाना ही पड़ेगा
जमूरे ! तुझे पता है गाँधीजी लंगोट पहन कर लंदन गये थे ।
हाँ ।
तो बता , लौटते समय अपने साथ क्या लाए थे ?
उनके पास टी वी ,टेप , विडियो , ब्लू फिल्म के केसेट थे और उनकी लंगोटी मेन्चेस्टर से बनकर आई थी
बकता है , शर्म नही आती झूठ बोलते, उस्ताद यह ईक्कीसवी सदी है , झूठे का बोलबाला सच्चे का मुँह काला
जमूरे एक बात बता इक्कीसवी सदी, है कैसी !
जैसे मुम्बई का नरीमन पोंइट जैसे हेमामालिनी , जैसे माधुरी दिक्षित जैसे ऐश्वर्या राय ,।
गरीबी , बीमारी बेरोजगारी का क्या हाल है ?
बिल्कुल दिखाई नहीं पड़ती
क्यों ?
क्योंकि जो भूखे गरीब बेरोजगार थे उन्हे इक्कीसवी सदी में आने ही नहीं दिया । वे बीसवी सदी मे सड़ रहे हैं और सड़ेंगे । उनसे कहा था कि इक्कीसवी सदी में चलना हो तो इन्हे छोड़ो , वे छोड़ न पाये गरीबी , और अज्ञानता , इसलिये रह गये 20वीं सदी में ।
जमूरे अब चश्मा खोल
नहीं खोलता
क्यों
क्योंकि में बींसवी सदी जैसी घटिया सदी में नहीं आना चाहता बेहतर होगा तुम भी चश्मा लगाकर 21 वी सदी में आ जाओ
अबे क्या बकता है । उठ और पेट के वास्ते जनता से मांग ।

Tuesday, July 7, 2009

परिवार में जनतंत्र यानी सारी दुनिया में जनतन्त्र

कुमकुम संगारी के लेख का अंश
परिवार में बराबरी का आधार है बेटी का माँ - बाप की संम्पति में बेटे के बराबर का हिस्सा होना । ऐसे कुछ कानून बन चुके हैं जो कुछ हद तक इस बराबरी की इजाजत देते हैं लेकिन हम जानते हैं कि ९९ प्रतिशत मामलों में ये कानून लागू नहीं होते हैं बेटियाँ खुद भी अदालत में अपना हक माँगने नहीं जाती है । इसी तरह दहेज के खिलाफ कानून बने हुए हैं , लेकिन हम जानते हैं कि उनका उल्लंघन होता है ससुराल वालों को मालूम है कि जिसे वे अपनी बहू बनाने जा रहे हैं उसका अधिकार कानूनन उसके माता - पिता की सम्पति में है लेकिन वे यह भी जानते हैं कि यह अधिकार उसको मिलेगा नहीं , इसलिए वे सोचते हैं कि उस सम्पति में से जो लिया जा सके , वह शादी के वक्त दहेज के रूप में ले लिया जाये । खुद बेटियों के दिमाग में यह बात आती है कि बाद में तो कुछ मिलना नहीं है , इसलिए इसी समय जो मिल सके , ले लिया जाये । इस तरह एक तरफ स्त्रियों को उनके अधिकार से वंचित किया जाता है और दूसरी तरफ उस दहेज प्रथा को बढ़ाया जाता है जिसके कारण स्त्री को अपमान , उत्पीड़न और यातनायें तो सहनी ही पड़ती है , दहेज के लालची उन्हें जलाकर मार भी डालते हैं । इसलिए जब हम एक जनतांत्रिक परिवार की रचना करेंगे , तो उसमें ये दोनों बातें नहीं होगी ।
(परिवार में जनतंत्र सम्पादक रमेश उपाध्याय संज्ञा उपाध्याय पुस्तक से)









Wednesday, June 24, 2009

तालीम देने का खब्त


समाज को सभ्य बनाने में तालीम की अहम भूमिका है । पहले यही भूमिका अंग्रेज इस हद तक अदा कर रहे थे कि उन्हे हिन्दुस्तानियों को सभ्य बनाने का खब्त सवार था । कुछ लोग सभ्य हो गये इससे नुकसान अंगेजों को ही हुआ उन्हें यह मुल्क छोड़कर वापस इंग्लिस्तान जाना पड़ा । आजादी के बाद की सरकारों को भी यह खब्त सवार रहा बड़े मजे से ब्राह्मण , राजपूत और बनिये राज कर रहे थे लेकिन शिक्षा प्रदान करने के खब्त के चलते दलितों व पिछड़ों ने राजसता में भागीदारी मांगनी शुरू कर दी । जिससे हुआ यह कि अब संसद और विधानसभाओं में इन्हीं जातियों का बोल बाला है ।
जब सरकार ने नारी शिक्षा पर जोर दिया तो नारी लज्जावती न रह कर जीवन के हर क्षेत्र में पुरूष से बराबरी करने लगी । नारी शिक्षा के चलते पुरूष की सत्ता में भयंकर कमी आई वह तिलमिला कर रह गया । तालीम चीज ही ऐसी है , जो सब रिश्तो को बदल देती है अब स्त्रियों के लिए 33 प्रतिशत लोकसभा व विधानसभाओं में तथा 50 प्रतिशत पंचायती राज संस्थाओं में आरक्षण होगा । अभी से विरोध के स्वर तेज हो रहे हैं शरद यादव ने तो लोकसभा में यहाँ तक कह दिया कि अगर यह बिल पास हो गया तो वे जहर खा लेंगें । अब बताइये इतने जहरीले बिल को सरकार पास करवाने पर क्यों तुली है । सरकार का गणित साफ है , जनसख्या में 50 प्रतिशत महिलायें हैं इसलिए उन्हें 50 प्रतिशत सीटें मिलनी चाहिए । इसमें गैर वाजिब क्या है और जहर खाने वाली क्या बात है बल्कि मिठाई बाँटने का समय है अगर आप नहीं खड़े हो सकते तो पत्नि को खड़ी कर दीजिए । लोकसभा आप नहीं तो आपकी पत्नि जायेगी । लेकिन पावर तो आपके पास ही रहेगी । बस आप उनके सेक्रेटरी बन जाइये ।
हमारी एक सरकार ने राष्ट्रीय स्तर पर ‘आपरेशन ब्लेकबार्ड’ प्रारम्भ किया जिससे तालीम याफता लोगों की मानोपाली खत्म होने का मंजर सामने आया । शुक्रिया हो सरकार का कि उसने हर गाँव ढाणी में एक ब्लेकबोर्ड मुहैया करा दिया । लेकिन हुआ यह कि जहाँ ब्लेक बार्ड पहुँच गया वहाँ चाक नहीं पहुँची और जहाँ ब्लेकबोर्ड और चाक दोनों ही पॅंहुचे वहाँ गुरूजी नहीं पहुँचे , ‘अब बच्चे तो बच्चे, उन्होनें चाक लेकर ब्लेक बोर्ड पर ऐसी इबारते लिखी कि अगर अध्यापक पढ़ते तो दंग रह जाते चूंकि अध्यापक थे नहीं इसलिए दंग रहने का कार्य स्कूल निरीक्षक ने किया । उसने अपना टी. ए. डी. ए. बनाया और रिपोर्ट सरकार के पास भेज दी । रिपोर्ट में कहा गया कि फला गाँव में अध्यापक नहीं है , फलां गावं में ब्लेक बोर्ड नहीं है , फलां में स्कूल भवन नहीं है , फलाँ गावं का अध्यापक स्कूल जाता ही नहीं है । क्योंकि वह पंचायत समिति के प्रधान की हाजरी में रहता है , फिर जाकर करे भी क्या , क्योंकि वहाँ भवन , ब्लेकबोर्ड , चाक सब है लेकिन विद्यार्थी तो है ही नहीं चुनाचे वह महीने के अंत में जाकर अपनी हाजरी मांडकर तनखां उठा लेता है।
इससे भी हैरतअंगेज मंजर वहाँ दिखा जहाँ अध्यापक, छात्र , ब्लेकबोर्ड और चाक सभी थे लेकिन उनमें आपसी सामजंस्य नहीं था। छात्रों के पास कभी कापी नहीं थी तो कभी पैंसिल । कभी किताब नहीं तो कभी खेत पर जाना जरूरी था मास्टरजी हैं तो वो कभी बीमार हो जाते , तो कभी जनगणना का काम कर रहे होते तो कभी वोटर लिस्ट बनवा रहे होते या कभी फेमिली प्लांनिग के केस पटाने में जुड़े रहते तो कभी चुनाव कार्य करवाने में व्यस्त हो जाते है। जबसे मिड डे मिल योजना प्रारम्भ हुई है तब से गुरूजी सामान खरीदने , पोषाहार बनवाने , बाँटने और हिसाब -किताब का काम देख रहे हैं । कक्षा में जाने का समय ही कहाँ बचता है । सो स्टाफ ‘मिलजुलकुर खाओं और बैकुण्ठ जाओ ’ के सिद्धांत पर चल रहा है । कहने का तात्पर्य यह है कि तमाम व्यवस्था के बावजूद तालिम हैं कि हासिल ही नहीं होती अब इसमें किसी का क्या कसूर । जितनी तालिम हो चुकी है वही सरकार के गले पड़ रही है ।
अब तालिम ऐसी हो चुकी है कि हजारों-लाखों रूपये खर्च न करो तो आती ही नही है। पब्लिक स्कूलों के बच्चे फर्राटेदार अंग्रजी बोलकर , वर्नाकूलर स्कूल के बच्चों को पीछे छोड़ जाते हैं । इस तरह समर्थ फिर आगे बढ़ जाता है अब सबको शिक्षा देनी है तो ऐसे ही दी जा सकती है ।

Thursday, June 11, 2009

मौनव्रत




जिलाधीश कार्यालय के सामने शामियाने के नीचे एक आदमी अपने मुँह को दोनों हाथों से ढाँपे , गांधीजी के बंदर की मुद्रा में बैठा है । ठीक उसके ऊपर एक बैनर टंगा है बैनर पर मौन व्रत लिखा है । कुछ और खद्दरधारी उसी मुद्रा में उसके दोनों ओर धरने पर बैठ जाते है। जिलाधीश को ज्ञापन देना है । कौन ज्ञापन देगा पहले से ही तय हो तो उचित रहेगा , नहीं तो वहाँ हड़बड़ी में मौन जुलुस की भद्द पड़ जायेगी ।
पत्रकारों और फोटोग्राफरों का प्रवेश। विडियों कैमरा काम कर रहा है , पत्रकार ने पूछा - देश में आपातकाल लागू है आपकी प्रतिक्रिया! वे मौन है
1984 के सिक्ख विरोधी दंगों के बारे में आपका क्या कहना है ? वे मौन है
बाबरी मस्जिद को तोड़ डाला इस सन्दर्भ में आपका क्या कहना है ? वे मौन है
अहमदाबाद में हिन्दु मुस्लिम दंगे में लागों को जिन्दा जला दिया गया है , कौन इसके लिए जिम्मेदार है वे फिर मौन है
उत्तर न पाकर पत्रकार ने उकसाया -
जब भी कोई महत्वपूर्ण निर्णय लेना होता है , आप लोग मौन साध लेते हैं । मुख्य बंदर मौन व्रत धारी उन्हें चुप रहने का आखों से इषारा करता है पत्रकार अनुनय करता हे , लिखित वक्तव्य ही दे दीजिए
‘‘सार्थक संवाद केवल मौन में ही सम्भव है
कौन जिम्मेदार है , अपने मांही टटोल ,
आत्मा को शुद्ध करो , मौन भटको को रास्ते पर लाता है ।
शब्द झगड़े की जड़ है । मौन शान्तिपूर्ण और प्रेममय है ।
मौन में सारी समस्याएं समाप्त हो जाती है ’’
मौन धीरे - धीरे असाध्य लगने लगता है कुछ लोग खुजलाते है , एक -दो हथेली पर तम्बाकु घिसते हैं । कई अपनी पुड़िया खोल कर खाते है । दर्शकों में से लड़के - लड़कियाँ आँख लड़ाने की कोशिश करते है।
जुल्म, अन्याय व अत्याचार के विरूद्ध मौनजुलूस, बेरोजगारी व गरीबी के विरूद्ध मौन जुलुस , मौन रामबाण है अतः सरकार मौन रहने का मूलभूत अधिकार सबको देती है बोलने की बदतमीजी की आज्ञा सिर्फ सिरफिरों को है । सरकार मौनव्रत धारी बंदरों की मूर्तियों को सार्वजनिक स्थानों पर स्थापित किये जाने के आदेश देती है और मौनव्रत धारियों का धन्यवाद करती है


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Wednesday, June 3, 2009

डाकुओं की संगठित गेंग के बारे में हलफिया बयान




डाकुओं की संगठित गेंग के बारे में हलफिया बयान


पुलिस के बारे में एक जज साहेब ने टिप्पणी की थी कि पुलिस डाकुओं की एक संगठित गेंग है । भई ! यह तो बहुत ही सख्त टिप्पणी है पुलिस सेवा के बारे में । चूंकि जज साहब को तो सरकार चलानी नहीं , इसलिए वे तो ऐसी टिप्पणी कर सकते हैं लेकिन यह तो सरकार ही जानती है कि पुलिस किस कदर जनता की सेवा व सुरक्षा में चैबीस घंटे लगी हुई है ।
आलतू - फालतू आन्दोलनों को तोड़ने व फोड़ने , मरोड़ने व कुचलने का कार्य भी यही गेंग सरअंजाम देती है । विरोधियों के छक्के छुड़ाने व छठ़ी का दूध याद दिलाने का काम भी इसी के जिम्मे है । क्योंकि सरकार यह काम नहीं कर सकती इसलिए यह काम पुलिस के द्धारा करवाया जाता है जिससे देश में अमन चैन बना रहता है ।
और फिर उन्हें डकैत कहना तो खुला झूठ है , डकैत हमेशा खुले में लूटमार करते हैं जबकि पुलिस कभी ऐसा नहीं करती , वह हमेशा प्रछन्न तरीके अपनाती है । उसके लिए बकायदा प्रत्येक थाने में, पहुॅंच रखने वाले लोग होते हैं , वे राजनैतिक दल के कार्यकर्ता हो सकते है , कुछ छटे हुए बदमाश भी यह काम करते हैं कुछ वकील लोग भी यह काम करते हैं क्योंकि यह उनकी प्रेक्टिस की परिभाषा में आता है । इन लोगों का काम है मुर्गी फांसना और फिर थाने में होती है मुर्गी हलाल । जो मुर्गी फांसकर लाते हैं थाने में , उनकी समाज में बड़ी इज्जत होती है , इससे ही अंदाज लगाइये कि पुलिस की समाज में कितनी इज्जत होगी । इनसे पंगा लेना , मौत को दावत देना है । इज्जतदार लोगों से आम जनता हमेशा थरथराती रही है । अब आप ही बताइये कि वे कौनसे कारनामे हैं जिसकी वजह से सरकार को यह नियम बनाना पड़ा कि थानेदार किसी स्त्री का बयान थाने में बुलाकर नहीं ले सकता ।
पाठ पढ़ाने में हमारी पुलिस का कोई सानी नहीं है । थर्ड डिग्री क्या होता है ये वे लोग ठीक से जानते हैं जिनके घुटनें की टोपियाॅं टूट गई या हाथ - पाॅंव की हड्डियाॅं टूट गई , जिनके मुहॅं में मूता गया और गवाही चाहिए तो जुगता की लो जिसका लिंग तक उन्होनंे काट दिया ।
यह सब इसलिए किया जाता है कि अपराधियों में हाथ - पाॅंव टूटने का डर नहीं होगा तो अपराध रूकेंगे कैसे सरकार के वक्तव्यों और भाषणों से तो अपराध रूकने से रहे न ही कोर्ट कचहरी के भरोसे अपराध रूकेंगे । पुलिस जब सीधी और स्वविवेक से कार्यवाही करेगी तब ही अपराध जगत में दशहत फैलेगी ।
लेकिन ऐसा क्यों होता है कि दशहत आम लागों में फैल जाती है और अपराध जगत के बीर बांकुरे थाने में बैठे मूंछों पर ताव देते रहते हैं ।

Friday, May 15, 2009

लडो डट कर लडो


लडो डट कर लडो
भाई -भाई लड़ते है] हिन्दु मुस्लिम भाई - भाई है] इसलिए आपस में लड़ते है। अगर भाई - भाई नहीं होते तो आपस में नहीं लड़ते । पहले हिन्दी चीनी भाई -भाई थे इसलिए आपस में लड़े । जब से दुश्मन हुए है] नहीं लड़े ।
जब हम कहते हैं कि हिन्दु - मुसलमान लड़ते हैं तो इसका तात्पर्य है कि हिन्दु - हिन्दु नहीं लड़ते , मुसलमान - मुसलमान नहीं लड़ते लेकिन पश्चिमी पाकिस्तान , पूर्वी पाकिस्तान से लड़ा , इराक कुवैत से लड़ा , इरान - इराक लड़े , लोगों को बिना लड़े चैन नहीं मिलता सो लोग आपस में लड़ते है।
संजीदा लोगों को भाइयों के झगड़ों में नही पड़ना चाहिए । सरकार को भी चाहिए कि वह भाई - भाई के झगड़ों में अपने कानून का डंडा नहीं घुमाएं बल्कि लड़ने के लिए स्टेडियम प्रदान करे और टिकट लगाकर तमाशा दिखाए ताकि सरकार का रेवेन्यू बढे।
कुछ लोग ऐसे हैं जिन्हें लड़ने का नही लड़ाने का शौक है उन्हें लोगों को लड़ाये बिना चैन नहीं मिलता । जैसे नवाब पहले मुर्गे लड़ाते थे ,आजकल के नवाब आदमियों को लड़ाते हें जैसे मीणा को गूजर से दलित को ब्राहण से] पिछड़े को अति पिछड़ें से ।
आजादी के बाद का इतिहास आपस में लड़ने का इतिहास रहा है आजादी प्राप्त होते ही हिन्दु - मुसलमान लड़े , फिर मराठी - तेलगू , यानि भाषा के नाम पर लड़े , प्रांतो पर लड़े , नदियों के बंटवारें को लेकर लड़े , हिन्दु - सिक्ख जम कर लड़े , बाबरी मस्जिद को लेकर कारसेवक मुसलमान से लड़ मरे आदिवासी - गैर आदिवासी लड़े , कम्यूनिस्ट कम्यूनिस्ट से लड़े , नकस्ली सरकार से लड़े , आरक्षण हितेषी - आरक्षण विरोधी से लड़े भारतीय मुजाहदीन और अभिनव भारत लोगों को लामबन्द कर रही है । नहीं लड़ने वाले की लड़ने वाले नहीं सुनते वे कहते है तुम यह बताओ कि तुम किस तरफ हो । किसी भी तरफ नहीं हो तो हिजड़ै हो । लड़ो - डट कर लड़ो । आमीन

राजनीति में सती सावित्री
(राजनीति में आई एक स्त्री के प्रति लोगों (पुरूषों) का क्या दृष्टिकोण है जरा मुलाहिजा फरमाइये। )
राजनीति में सती सावित्री का क्या काम ! फिर भी सावित्री ने तय किया कि अब वह राजनीति करेगी उसने पार्टी अध्यक्ष से मुलाकात की । अध्यक्ष ने सावित्री का स्वागत करते हुए कहा कि महिलाओं को राजनीति में आगे की पंक्ति में आना चाहिए । हमारा सौभाग्य है कि आप आई, अध्यक्ष ने उनके सुन्दर चेहरे को लक्ष्यकर आश्वस्त किया कि आपको किसी पार्टी पोस्ट पर एडजस्ट कर दिया जायेगा ।
अध्यक्ष जी ने उनकी उम्र, शैक्षणिक यौग्यता व कार्य में दिलचस्पी को देख उन्हें पार्टी की युवा शाखा का अध्यक्ष नियुक्त कर दिया ।
अध्यक्षजी ने कहा पद जिम्मेदारी का है और उसमें पूरे प्रदेश के दौरे करने पड़ेगें । मेरे दौरे का प्रोग्राम बन गया है आप मेरे साथ चलेगी । सावित्री मना कैसे करती!
एक दौरे के बाद ही कार्यकर्ताओं में कई किस्से प्रचलित हो गये । अध्यक्षजी ने क्या चीज पकड़ी है ! जैसे अध्यक्षजी चील हो और सावित्री चिड़िया । ‘यार अध्यक्षजी के तो मजे है। अब तो और अधिक दौरे होंगे । अबकि बार सावित्री का विधानसभा का टिकिट पक्का है । अध्यक्षजी ने सारा भार सावित्री पर डाल दिया है। सावित्री को अफसोस था कि उसकी योग्यता और कार्य को कोई नहीं देख रहा है । निराशा के क्षणों में सावित्री ने अध्यक्षजी से कहा - बहुत हो गया , राजनीति छोड़ मैं अब सत्यवान के पास वापस जाउंगी ।
अभी तो तुम्हारे पाँव भी नहीं जमे है। मैं मुख्यमन्त्री से कहकर किसी निगम की अध्यक्ष बनवा देता हूँ ताकि तुम्हारा खर्चा पानी चल सके । और फिर अगले साल इलेक्शन है अभी से भाग दौड़ कर टिकट पक्का कर लो । अब मुख्यमन्त्रीजी को तो ‘गुडह्युमर’ में रखना ही होगा न । जिला व राज्य कमेटी को भी विश्वास में लेना होगा ।
पार्टी कार्यकर्ता जानते हैं कि सावित्री सबको विश्वास में ले लेगी । कार्यकर्ता सावित्री पर पूरी नजर रखे थे । उसकी पहुँच कहाँ - कहाँ तक है और क्यों है ?
ज्यों - ज्यों सावित्री के बारे में किस्से कहानियाँ फैलती गई । उसकी पुहॅंच भी ऊँची होती गई । कार्यकर्ता अपना काम निकलवाने के लिए सावित्रीजी का उपयोग करने लगे और मौका मिलने पर नजर भी फैंक लेते क्या पता चिड़िया फॅंस ही जाये ।
सावित्री का संघर्ष तब तक समाप्त नहीं होगा जब तक कि वह विधायक बनकर मन्त्री की कुर्सी पर न बैठ जाये ।
विधानसभा चुनाव आ गये , तो सावित्री को टिकट मिल गया । अब तो पार्टी वर्कर चौडे में बोलने लगे । फलाने के साथ हमबिस्तर हुई थी] साली को एक ही रात में टिकट मिल गया और जो दसियों वर्षो से राजनीति कर रहे हैं उन्हें टका सा जवाब दे दिया - महिलाओं को आगे लाना है ।
जब सावित्री पुरूष मतदाता की ओर उन्मुख हुई तो उसका चेहरा निहार कर वे अपने को धन्य मानते । अपनी ही पार्टी के विरोधी तमाम तरह के किस्से जनता में फैलाने लगे थे । जनता भी क्या चीज है जो इस तरह की बातों पर सहज ही विश्वास कर लेती है । नतीजा , अपनी पूरी इज्जत उतरवाकर भी सावित्री हार गई ।

Friday, May 1, 2009

श्याम पोकरा के उपन्यास बेलदार का लोकार्पण

'शारदा' पत्रिका एवं 'बेलदार' उपन्यास का विमोचन
शारदा साहित्य मंच के तत्वाधान में दिनांक १९।०४.०९ को डा. भीमराव अम्बेडकर भवन , रावतभाटा में लोकार्पण समारोह का आयोजन किया गया । जिसमें मंच की वार्षिक पत्रिका ‘शारदा’ एवं श्री श्याम कुमार पोकरा के उपन्यास बेलदार का विमोचन कोटा के वरिष्ठ कथाकार श्री विजय जोषी , कवि श्री सोहन सिंह केलवा एवं वरिष्ठ लघुकथाकार श्री भगीरथ परिहार ने किया । श्री श्याम पोकरा ने कोटा से पधारे मुख्य अतिथि श्री विजय जोशी का परिचय देते हुए कहा कि श्री जोशी अच्छे कथाकार ही नहीं अच्छे समीक्षक भी हैं मेरा इनसे परिचय सन 1999 में दशहरा मेले में हुआ । उनसे मुझे काफी उर्जा इस क्षेत्र में मिली प्रसन्नता का विषय है कि वे आज इस समारोह में उपस्थित होकर ‘बेलदार’ उपन्यास का लोकार्पण करेंगे श्री दिनेश छाजेड़ ने शारदा साहित्य मंच का परिचय देते हुए कहा कि जो पौधा हमने पाँच वर्ष पूर्व लगाया था , वह अब बड़ा होकर वृक्ष बनने लगा हे । आज इस मंच की पत्रिका ‘शारदा’ का प्रवेशांक वरिष्ठ साहित्कारों द्धारा किया जा रहा है समारोह के मुख्य अतिथि एवं वरिष्ठ कथाकार श्री विजय जोषी ने सभा को सम्बोधित करते हुए कहा कि अणुनगरी में साहित्य के जलते दीपों कों देखकर मुझे अतिप्रसन्नता हो रही हे हर्ष व्यक्त करते हुए उन्होने कहा कि यह बड़े गौरव की बात है कि विज्ञान व तकनीकी से जुड़े लोग भी साहित्य में गहरी रूचि रखते हैं । मानव मन में उपजी संवेदनायें ही शब्द बनकर सृजन के रूप में प्रकट हो 'शारदा' जैसी पत्रिका के रूप में आकार ग्रहण करती है । अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए श्री विजय जोशी ने कहा कि श्याम पोकरा का उपन्यास ‘बेलदार’ मुखर संवेदनाओं का एक गम्भीर दस्तावेज है । इस कृति में उपन्यासकार ने बेलदार के रूप में एक ऐसे चरित्र को प्रस्तुत किया है जो नैतिक मूल्यों की रक्षा के लिए कठोर संघर्श का मार्ग अपनाता है । अपमान को सहन कर अन्याय का डटकर मुकाबला करता हे और अंत में अपने धैर्य व बुद्धि के बल पर सत्य को उजागर करने में सफल होता है । मुझे आषा है कि बेलदार एक कालजयी कृति का स्थान ग्रहण करेगा । अध्यक्षीय उद्बोधन देते हुए वरिश्ठ लघु कथाकार भगीरथ परिहार ने मंच की गतिविधयों व उपलब्धियों पर संतोश प्रकट किया । शारदा साहित्य मंच के प्रभारी श्री अरूण भट्ट ने कहा कि छोटे - छोटे दीपों से हम साहित्य का प्रकाष फेलाने का प्रयास कर रहे हैं । जिसका परिणाम प्रकाश पुंज बनकर ‘शारदा' पत्रिका के रूप में आपके सामने है । हरिओम षर्मा , रमाकान्त शर्मा , रिपेन्द्र सिंह , देव किशोर , अरूण भट्ट राम शंकर वर्मा , तेजपाल गुसाईवाल , दिनेश छाजेड़ ,सुरेश छाबड़ा , वीरेन्द्र सिंह , गोविन्द प्रसाद , हेमन्त आमेठा , एन. पण्डित , श्याम पोकरा , प्रदीप गुर्जर आदि कवियों ने अपनी रचनाऐं प्रस्तुत की अंत में मंच के सदस्यों द्धारा सभी अतिथियों एवं ‘शारदा' पत्रिका के सम्पादक श्री ओ. पी. आर्य का श्रीफल व शौल ओढ़ाकर सम्मान किया गया ।

सुरेश छाबडा(कुरते में.)अरूण भट्ट,सोहनसिंह केलवा,विजय जोशी,भगीरथ,
श्याम कुमार पोकरा व दिनेश छाजेड

Sunday, April 26, 2009

मैत्रेयी पुष्पा के साक्षात्कार के अंश

http://anyatha.com/. से मैत्रेयी पुष्पा के साक्षात्कार के अंश

इसे फ़रोग की कविता के साथ पढें
ज्ञानसिन्धु पोस्ट दिनांक 23. 4. 09


संवाद

कहने का मतलब यह है कि प्यार से लबरेज आंखे लिए ही में जीवन में आने वाली आंधियों का सामना कर सकी हूं और हर पुस्तक रचना मे जता रही हूँ कि स्त्री प्रेम की मिट्टी से बनी होती है । उसके प्यार को अवैध कहना औरत की जिंदगी का अपमान है । देखिए कि वह अपने प्रेम में उस पति को भी शामिल कर लेती है जो उसके जीवन में उसकी मर्जी से नहीं आया । मगर समाज सोचता है कि वह इस स्वीकृति के साथ अपने आप को भौतिक और नैतिक रूप से निष्क्रिय माने । पुरुष को मीत नहीं , ईश्वर की तरह पूजे और मनुष्यगत प्रतियोगिताओ को छोड़ती चली जाये । मकसद यही हुया न कि वह अपने प्रेम को मारती चली जाये , जो उसकी अन्दरूनी ताकत होता है । स्त्री की इस नैसर्गिकता को पाप कहा , अपराध कहा । प्रेम के कारण उसके कुंआरेपन को लाँछित किया और विवाहेतर संबध बताकर व्यभिचार के खाते में डाल दिया ।

Thursday, April 23, 2009

पाप

http://setusahitya.blogspot.com/से

फ़रोग फ़रोखज़ाद की एक कविता
अनुवाद एवं प्रस्तुति : यादवेन्द्र
कविता के
साथ चित्र : अवधेश


पाप
बाँहों मैंने पाप किया पर पाप में था निस्सीम आनंद
समा गई गर्म और उत्तप्त में
मुझसे पाप हो गया
पुलकित, बलशाली और आक्रामक बाँहों में।
एकांत के उस नीरव कोने में
मैंने उसकी रहस्यमयी आँखों में देखा
सीने में मेरा दिल ऐसे आवेग में धड़का
उसकी आँखों की सुलगती चाहत ने
मुझे अपनी गिरफ़्त में ले लिया।
एकांत के उस अँधेरे और नीरव कोने में
जब मैं उससे सटकर बैठी
अंदर का सब कुछ बिखर कर बह चला
उसके होंठ मेरे होंठों में भरते रहे लालसा
और मैं अपने मन के
तमाम दुखों को बिसराती चली गई।
मैंने उसके कान में प्यार से कहा –
मेरी रूह के साथी, मैं तुम्हें चाहती हूँ
मैं चाहती हूँ तुम्हारा जीवनदायी आलिंगन
मैं तुम्हें ही चाहती हूँ मेरे प्रिय
और सराबोर हो रही हूँ तुम्हारे प्रेम में।
चाहत कौंधी उसकी आँखों में
छलक गई शराब उसके प्याले में
और मेरा बदन फिसलने लगा उसके ऊपर
मखमली गद्दे की भरपूर कोमलता लिए।
मैंने पाप किया पर पाप में था निस्सीम आनंद
उस देह के बारूद में लेटी हूँ
जो पड़ा है अब निस्तेज और शिथिल
मुझे यह पता ही नहीं चला हे ईश्वर !
कि मुझसे क्या हो गया
एकांत के उस अँधेरे और नीरव कोने में।
(‘अहमद करीमी हक्काक’ के अंग्रेजी अनुवाद से)
फ़रोग फ़रोखज़ाद

Friday, April 10, 2009

वैज्ञानिक दृष्टिकोण



वैज्ञानिक दृष्टिकोण
नेहरुजी चाहते थे कि यह पुराना हिन्दुस्तान, जो विश्वास में डूबा है विज्ञान में उन्नति के शिखर चूमे । वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाकर अपनी जीवन शैली को वैज्ञानिक -दृष्टि सम्पन्न बनाएं । हुआ भी वही , बडे -बडे बाँध बने ,बिजली घर बने ,बडे-बडे उद्योग खुले ,शोध शालाएँ खुली , इंजीनियरिंग व मेडिकल कालेज खुले , विद्यार्थी पढे , कुछ विदेश चले गये ,जो नहीं जा सके वे मन मसोस कर यहीं सरकार की खिदमत करते रहे ।
हमारे वैज्ञानिकों का यह हाल है कि माशहअल्ला क्या कहें ! न वे अपनी संस्कृति छोड़ सकते हैं न अपने संस्कार और विश्वास ,वे वैज्ञानिक दृष्टिकोण भी नहीं छोड सकते । अतः जिस तरह हमने अर्थशास्त्र में मिश्रित अर्थव्यवस्था जैसी नायाब धारणा का विकास किया , करीब वैसी ही नायाब सोच हमारे वैज्ञानिकों ने विज्ञान और विश्वास के मिश्रण में देखी । पूरब और पश्चिम का अदभूत मिलन । उद्योग लगे तो भूमिपूजन हो, मशीन लगे तो नारियल फ़ूटे , प्रसाद जरुर बंटे ,अगरबत्तियाँ और दीप जरुर प्रज्जवलित हो , पंडित जरुर मंत्र पढे अब यह सब न हो तो वैज्ञानिकों पर संस्कृति विहीन और संस्कार-हीन होने का आरोप लगेगा ।
एक बार हमारे मन में आई कि पंडत तू संस्कृत पढा है , धर्म की किताबे पढी , बच्चों की पुस्तकों से विज्ञान भी पढ़ ही रहा है , तो मन में एक दुविधा उठी कि सूर्य ग्रहण , राहु-केतु जब सूर्य को ग्रस लेते है , तब होता है या विज्ञान के अनुसार सूर्य और पृथ्वी के बीच में चंद्र के आने से होता है , तो हमने यह दुविधा चीफ़ इंजीनियर के सामने रखी। वे हनुमान भक्त थे , अक्सर मंदिर में भेंट होती थी , कुछ धार्मिक चर्चा भी होती थी , जब कभी जरुरत पडती प्रोजेक्ट में पूजन करने चला जाता , विश्वकर्मा पूजा तो होती ही है. चीफ़ साहब आप इन दोनों दृष्टिकोण में सामंजस्य कैसे बिठाते है ? वे बोले -इट्स वेरी सिम्पल धर्म को धर्म की तरह मानो और विज्ञान को विज्ञान की तरह । बस नो प्राब्लम ।
गैलिलियों ने कहा- पृथ्वी सूरज के चारों ओर चक्कर काटती है जबकि विश्वास कहता है ,सूरज पृथ्वी के चारों ओर चक्कर काटता है वह बेकार अपनी बात पर अडा रहा , जिससे उसे जेल की हवा खानी पडी हमें देखिये कि हम धर्म का प्रसाद भी खा रहे है , और विज्ञान के लड्डू भी। पंडित जी अपनी दुविधा यहीं छोडिये ,सबसे बडा सिध्दांत है कि आपके दोनों हाथों में लड्डू है या नहीं ।

प्रार्थना
पडोसी ने प्रभु से प्रार्थना की -हे भगवान ! मेरे प्रिय पडोसी के यहाँ महान देशभक्त पैदा हो ।
दूसरे पडोसी ने प्रार्थना की - हे भगवान! मेरे जीवन का कोई भी पूण्य हो तो मेरे घर चद्रास्वामी जैसा व्यक्ति पैदा हो।
तभी आकाशवाणी हुई ।
'वत्स,तुम्हारे पडोसी ने तुम्हारे लिए जो प्रार्थना की थी मैंने स्वीकार करली है , क्योंकि उसकी प्रार्थना अच्छी थी'
'कौन-सी प्रार्थना भगवान ?
यही की स्वतंत्रता की 50वीं वर्ष गांठ पर तुम्हारे घर महान देशभक्त पैदा हो ।
'मैं लुट जाऊँगा प्रभु ! आप मेरी सुनिये । पडोंसी तो जलन और ईर्ष्या के मारे प्रार्थना कर रहा है ।
'सोच लो,देशभक्ति सर्वोच्च गौरव है ।
'इसमें क्या सोचना ,्मैं अपनी संतान को पांचसितारा संस्कृति में फ़ली-फ़ूली देखना चाहता हूँ ,तिहाड जेल में नहीं
'चद्रास्वामी भी तो तिहाड जेल में थे
'लेकिन भगवान वे वहाँ भी पाँचसितारा सुविधा में थे ।
'मैं तुम्हारे उत्तर से संतुष्ट नहीं हुआ ,जरा खुलासा करो।
'भगवान आप तो अंर्तयामी है, इस मूर्ख की बुध्दि पर तरस खाएँ इतना तो सभी जानते है कि क्रान्तिकारी स्वंय तो यातनाएँ झेलकर , बेमौत मारा जाता है उसके परिवार के लोगों को भी वह जीवनभर दुख ही देता है ।



Wednesday, March 25, 2009

युगल की लघुकथा' जूते

जूते
0 युगल
चैतू राजमिस्त्री के साथ का काम करता था । एक दिन सिर पर से ईंट उतारते समय एक ईंट पाँव पर आ गिरी । उँगलियॉ कुचल गई । पत्नि बोली - पाँव मे जूते होते तो उँगलियों नहीं कुचलती ।'' चैतू ने उँगलियॉ में उठती बिच्छु के डंक के समान टीस को दाँत पर दाँत रखकर बर्दाश्त करने की कोशिश की और बोला - "तुम्हें क्या पता कि जूते कितने महंगे हो गये हैं जब पेट चलाना ही दुशवार हो, तो जूते ……… "
पत्नी हल्दी का गरम लेप उसके पाँव पर चुपचाप लगाती रही । पेट चलाना तो सचमुच दुशवार हो रहा था । बेटा पारस बीस साल का था । बडे अरमान से पढ़ाया था । मैट्रिक पास कर गया था । इसलिए उसे मजदूरी करना अच्छा नहीं लगता था । किसी और काम की तलाश भी नहीं करता था ! गाँव के अबंडों के साथ ताश के अड्डे पर जमा रहता । चैतू को जिस दिन काम नहीं मिलता , वह नीम-बबूल के दँतवन तोड कस्बे में बेच आता। आठ -दस रूपये आ जाते । एक दिन वह जूतों की दुकान में गया था । बहुत मामूली जूतों की कीमत इतनी थी कि दो दिनों की मजदूरी सर्फ़ हो जाती । अपने जूते के लिए परिवार के लोगों को दो दिनों तक भूखे रखना………अरे, छोडो, जब इतने दिन कट गये ,तो बाकी भी कट जायेंगे । लेकिन कई रात जूते उस के सपने में आते रहे।सपने में वह अपने पाँवों में जूते डाले चल रहा होता कि उस के पाँव दूसरों के पाँवो में बदल जाते ।उन जूतों को हसरत भरी नजरों से देखता वह चलता रहता कि उस के पाँवों पर ईंट आ गिरती और आंखें खुल जाती।
चैतू की उँगलियों को कुचले दो महीने भी नहीं गुजरे थे कि एक दिन उस के तलवे में शीशे की किरच घुस गयी। खून का बहना रूकते नहीं देख पारस विचलित हो उठा । बाप को कस्बे के अस्पताल में ले गया । उस दिन उस ने शिद्दत के साथ सोचा कि बापू के पाँवो में जूते होने चाहिए । दूसरे दिन ही वह पडोसी के साथ उसी के खर्च से पंजाब चला गया। लौटा दस महीने बाद । बाप के लिए जूते ले आया था। चैतू आँगन में खाट पर लेटा था। बेटे को देख कर माँ हर्षित हुई - "इतने दिनों कहाँ रहे बेटा ! न कोई चिट्ठी ,न कोई पता -ठिकाना।" पारस ने उत्साह के साथ बाप के लिए लाये जूते निकाले । चैतू की आँखें डबडबा आयीं । माँ कुछ क्षणों तक जूते को देखती रही ।फ़िर उसने चैतू के पाँव पर से चादर हटा दी । गैंग्रिन हो जाने के कारण डाक्टर ने वह पाँव काट दिया था ।"

Sunday, March 15, 2009

गजल










चाँद शैरी की गजल
मुल्क तूफाने बला की जद में है
दिल सियासत दान का मसनद में है
अब मदारी का तमाशा छोड कर
कल वो आदमी संसद में है
एकता का तो दिलों में है मुकाम
वो कलश में हैं न वो गुम्बद में है
जिंदगी भर खून से सींचा जिसे
वो शजर मेरा निगाहे बद मे है
फिर हैं खतरे मे वतन की आबरू
फिर बड़ी साजिश कोई सरह्द में है
एक जुगनू भी नहीं आता नजर
यह अंधेरा किस बुरे मकसद में हैं
चिलचिलाती धूप में 'शेरी' खयाल
हट के मन्जिल से किसी बरगद में हैं













पुरुषोत्तम 'यकीन' की गजल

न कोई शिकवा न काम रखना
सभी से लेकिन सलाम रखना
किसी को रख लेना अपने दिल में
और उसके दिल में क़याम रखना
अमल को अपने ग़ज़ल में अपनी
मुहब्बतों का पयाम रखना
भरोसा पल का नहीं पे पल का
है लाजमी एहतिमाम रखना
नहीं, न हो,जेरे - आस्माँ घर
दिलों के भीतर मकाम रखना
तुम अपनी यादों की डायरी में
कहीं तो मेरा भी नाम रखना
जफ़ा के बदले वफ़ा मुसलसल
तू रोजो - शब , सुबहो शाम रखना
बहुत ज़माने ने कहर तोड़ा
गया न 'ईमां' न 'राम' रखना
सभी को खुल कर पिला ऐ साकी
किसी का खाली न जाम रखना
'यक़ीन' शैरो - सुखन की जद पर
अदब से दर्दे -अवाम रखना