Monday, June 11, 2018

पुस्तक समीक्षा
 बैसाखियों के पैर 
पुस्तक समीक्षा : बैसाखियों के पैर 
लेखक : भगीरथ परिहार 
प्रकाशक : एडूक्रियेशन पब्लिशिंग, दिल्ली 
मूल्य : 280/-

44 साल की परम्परा है बैसाखियों के पैर : कान्ता रॉय 

1974 ई. में 'गुफाओं से मैदान की ओर' से एक बात निकली थी जमाने के लिए, जिसने बातों के कई पर्वत श्रृँखलाएँ गढ़ते हुए परिवर्तनकारी सामाजिक सुधार के उद्देश्य से कह डाला कि 'पेट सबके हैं।' इस तरह कह डालना इतना आसान भी नहीं रहा था, फिर भी आलोचनाओं के विशाल समंदर में एक सिद्धहस्त तैराक की तरह अगाध जलराशि को पार कर, विजेता बन, इस उम्र में भी निरंतरता को बनाए रख लघुकथाकार भगीरथ परिहार ने फिर से गढ़ दिए हैं 'बैसाखियों के पैर', जिसके प्रभाव से अपने इस नवीनीकरण को देखकर कई बैसाखी जो पुरातन ढर्रे पर टिकने की कोशिश में थे आज एकाएक चरमरा उठे हैं। 
बैसाखी स्वयं में अर्थहीन ही नहीं बल्कि मोहताज भी हुआ करती है फिर भी लाचारगी को संबल चाहिए इसलिए आज उसकी भी कीमत है। आदमी की लाचारी से बैसाखी का कद, इसकी कीमत बढ़ती है, इसलिए बैसाखियां दुआ माँगती है आदमी के अपाहिज होने का।
बैसाखी की प्रवृत्ति 'आदमखोर' भी होता है, वह आदमी को सहारा देने के नाम पर उसकी कर्मठता को ठगती हुई मानसिक रूप से अपाहिज बनाने लगती है, क्योंकि आदमी की लाचारी में ही 'बैसाखियों के पैर' गतिशील हुआ करते हैं।
वह अपनी टांगों सहारे नहीं चलता था, क्योंकि उसकी महत्वाकाक्षाएँ ऊँची थी क्योंकि वह चढ़ाइयॉं बड़ी तेजी में चढ़ना चाहता था, क्योंकि उसे अपनी टांगों पर भरोसा नहीं था क्योंकि वे मरियल और गठिया से पीड़ित थी।“----- यहाँ व्यंग्य शैली में बात को कहने की अलग ही तस्वीर नजर आती है। फिर दूसरी पंक्ति में चाटुकारिता को परिभाषित करने का जो अंदाज यहाँ देखने को मिला वो अद्वितीय है कि
फिर भी, जिन दूसरी टांगों के सहारे चलता था, उन पर टरपेन्टाइन तेल की मालिश किया करता था। हाथ की मॉंसपेशियाँ खेता नाई की तरह मजबूत हो गई थी और शाम उनके टखने एवं ऊँगलियॉं चटखाया करती थीं ताकि विश्वास हो जाये कि कल भी ये टांगे उसका साथ देंगी।“--------'बैसाखियों के पैर' प्रतीकात्मक रूप में कही गई एक सशक्त लघुकथा है। हाथ की माँसपेशियों का खेता नाई की तरह मजबूत हो जाना, बैसाखियों के आदतन लोगों के स्वभाव और आचरण में लिजलिजेपन को अभिव्यक्त करती है।
लघुकथा इस एक कथ्य को ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण पुस्तक में निहित भाव का संवहन करने में  सफल  है।

इसमें जरा भी दो राय नहीं है मानने में कि भगीरथ परिहार  की पुस्तक पढ़ना अपने आप में एक विशिष्ट उपलब्धि है। लघुकथा साहित्य के अध्ययन संबध में ये कहा जा सकता है कि इनको नहीं पढ़ा तो आपने कुछ भी नहीं पढ़ा। 
भगीरथ परिहार की सभी लघुकथाएं धैर्य से लिखी गयी प्रतीत होती है। संग्रह की लघुकथाओं में नैसर्गिक आरोह-अवरोह गतिमान है। लेखन मौलिकता लिए नव-निर्माण करती नजर आती है। पुस्तक की पहली लघुकथा 'आदमखोर' की पहली पंक्ति स्त्री-विमर्श से शुरू तो होती है लेकिन नरभक्षियों के प्रादुर्भाव के साथ ही राजपुरूष के प्रेम को माधुर्यता से अभिव्यक्त करने में कामयाब हो जाती है। यहाँ प्रेम को अलहदा तरीके से सम्प्रेषित किया गया है जो लघुकथा को श्रेष्ठ बनाता है। समाज, परिवार से ठुकरायी गयी स्त्री को जब भी कोई राजपुरूष प्रेम के वश में उसकी ओर बढ़ेगा, स्त्री को उसकी छाती से चिपकने से कोई भेड़िया रोक नहीं सकता है।
'आदमी की मौत' लघुकथा की संरचना ढोलनुमा पेट, दाढ़ी सूखी जंगली घास, काला स्याह शरीर, बाहर झांकते पीले मैल जमे दाँत के सहारे की गई है। आदमी को आखिर में मरना ही पड़ा। प्रतीकों के सहारे यहाँ गजब की बुनावट दिखाई देती है।

'अपराध' में एक अलहदा रंग उभरकर सामने आया है। किशोरावस्था और यौनिक जिज्ञासा कथ्य के केंद्र में है। बाकी सब बातों पर तो छूट दी भी जा सकती है लेकिन किशोरावस्था में प्रेम करना! यह तो अपराधी करार देने का पक्का कारण है।
'असीम आकाश' पाने के नाम पर महत्वाकांक्षी भ्रामक स्वप्न बोध से उबरने को सचेत भी करती है लघुकथाएं।
'अतिथि' आईना है संयुक्त परिवार के विघटन का। परायेपन के एहसास से गुजरती हुई स्त्री अनजाने में ही सही रचती जाती है पराएपन की जमीन। बोती है बीज निज सुख की और उगाती है फसल अतिथ्य के रूप में निज सम्बन्धों में स्वार्थ की प्रतिफल।
'बलिदान' में पुत्र का माँ के सुख के लिए स्वंय का बलिदान, 'बुद्ध की आँखें' चैतन्य होने का बोध देती है तो वहीं 'बन्दी जीवन' स्त्री पुरुष सम्बन्धों में प्रेम और कर्तव्य के समीकरण में उलझने को बेबस पति पत्नी के मन की छटपटाहट को बुनती है। फेसबुकलघुकथा के जरिये स्त्रियों के साथ छेड़छाड़ को उद्दत बेशर्म पुरुष प्रवृत्ति को उजागर किया गया है। इस लघुकथा को पढ़ते हुए मन सोचने पर मजबूर हुआ कि पढ़े लिखों का हमारा समाज कितना शिक्षित है? मेसेंजर में स्त्री संग एकांत पाने की लालसा, वाकई में छिछोरे सिर्फ नुक्कड़ों पर ही नहीं पाए जाते है बल्कि यहाँ हर इनबॉक्स की खिड़की से झांकते ये पाए जाते हैं। इन बातों पर खुलकर चर्चा करने की जरुरत है ताकि बदनीयती पर अंकुश लग सके। भगीरथ परिहार की दृष्टि अभी युवा है, इन्हीं क्षण विशेषों से इंगित होती है।  
'भाग शिल्पा भाग' भ्रूण हत्या को लेकर एक जबरदस्त लघुकथा है। यहाँ अभिव्यक्ति की शक्ति को एक आश्चर्यजनक प्रवाह देखने को मिलता है। 
'चम्पा' मैला ढोने के विरोध में दलित-विमर्श को हवा देती अच्छी लघुकथा है। चेहरा, छिपकली, चीखें, चुनौती, ये सबके सब लघुकथाएँ कथ्य को व्याकुलता से अभिव्यक्त करने में सक्षम हैं। 
पुत्रियाँ इतनी जल्दी युवा क्यों हो जाती हैं! युवा होकर सपने क्यों देखती है! सपने भी इन्द्रधनुषी! सपनों में वे हिरनियों - सी कूदती - फांदती, किलोल करती, मदन - मस्त विचरण करती है। हिरनी जैसी आँखों को देखकर सपनों का राजकुमार पीछा करता है। वह रोमांचित हो उठती है। अंग - प्रत्यंग मस्ती में चूर। इस उमर में इतनी मस्ती आती कहाँ से है!” ----- ‘सपने नहीं दे सकतालघुकथा की ये शुरुआत की पंक्तियों से जो अंतर्द्वंद वेदना का शूल बनकर छाती में उतरती है और अंत तक आते आते कलेजे के पार निकल जाता है, ह्रदय को रक्त-रंजित कर जाती है।
बेटी, सपना देख, लेकिन सपने में राजकुमार को मत देख।“----कहती हुई पंक्ति जब आत्महीन, टूटी हुई स्त्री को पुनश्च नव चेतना को ये कहकर जगाती हुई सपने देखने के लिए कहती है कि, “...लेकिन सपने देखने वाले ही सामाजिक यथार्थ को बदलते है। नहीं, तू देख सपने और मुस्तैदी से देख,कि तू औरत की नियति बदल सके।“---और यहाँ कथ्य का ऐसा उठान हुआ कि कथा अपने आप हठात एक समर्थ लघुकथा बन जाती है।
भगीरथ परिहार ने लघुकथा में एक लम्बे संघर्ष को जिया है। उन्होंने  लघुकथा साहित्य को विकसित कराने में अपनी सशक्त भूमिका निभाई है। लघुकथा में रचे बसे हुए लेखक हैं, इसलिए जब मैं फड़फड़ाहटलघुकथा से गुजर रही थी तो ऐसा लगा कि मानों यह अभिव्यक्ति मात्र है, इसमें कथातत्व कहाँ है? मन के उथल-पुथल को पकड़ अपनी व्यग्र भावों का सम्प्रेषण ही तो है। फिर सोचा कि हो सकता है मेरी नजर वहां न पहुंची हो। कभी अवसर मिला तो आपसे मिलकर इस बिंदु पर, आपका दृष्टिकोण जरूर चाहूंगी।

पुस्तक में निहित सतहत्तर श्रेष्ठ लघुकथाएं मन के अंदर उठती कोलाहल का स्वर है। प्रतीकों व बिंबों का प्रयोग मनःस्थिति को लेकर अपने प्रयोजन में सफल है। तर्क का अनुशासन प्रत्येक लघुकथा में परिलक्षित होता है।
लघुकथा संग्रह का एक आकर्षण परिशिष्टभी है। यह  'बैसाखियों के पैर' को एक अलग श्रेणी में रखता है जिसमें आधुनिक लघुकथा की अवधारणा विस्तार से आलेखित है। लघुकथा के शिल्प पर चर्चा-विमर्श के तहत जगदीश कश्यप एवं विक्रम सोनी को पूछे गए प्रश्नों के उत्तर प्रश्नोत्तरी स्वरुप रखा गया है। जब विधा सम्मत तकनीकी प्रसंग पुस्तक का हिस्सा बनता है तब लेखक और पाठक दोनों की दृष्टि से उस पुस्तक की महत्ता बढ़ जाती है। मुझे इस पुस्तक की लगभग सभी लघुकथाएं पसंद आयी है।
 लघुकथाकार की चिंतनशीलता लघुकथा संग्रह के सार्थकता के मिशन को पूरा करती है, ऐसा मेरा निजी मत है। मनुष्य के चैतन्यता और उसके आवरण को अभिव्यक्त करने का आधारभूमि है यह लघुकथा संग्रह।


कान्ता राय
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