Friday, May 15, 2009

लडो डट कर लडो


लडो डट कर लडो
भाई -भाई लड़ते है] हिन्दु मुस्लिम भाई - भाई है] इसलिए आपस में लड़ते है। अगर भाई - भाई नहीं होते तो आपस में नहीं लड़ते । पहले हिन्दी चीनी भाई -भाई थे इसलिए आपस में लड़े । जब से दुश्मन हुए है] नहीं लड़े ।
जब हम कहते हैं कि हिन्दु - मुसलमान लड़ते हैं तो इसका तात्पर्य है कि हिन्दु - हिन्दु नहीं लड़ते , मुसलमान - मुसलमान नहीं लड़ते लेकिन पश्चिमी पाकिस्तान , पूर्वी पाकिस्तान से लड़ा , इराक कुवैत से लड़ा , इरान - इराक लड़े , लोगों को बिना लड़े चैन नहीं मिलता सो लोग आपस में लड़ते है।
संजीदा लोगों को भाइयों के झगड़ों में नही पड़ना चाहिए । सरकार को भी चाहिए कि वह भाई - भाई के झगड़ों में अपने कानून का डंडा नहीं घुमाएं बल्कि लड़ने के लिए स्टेडियम प्रदान करे और टिकट लगाकर तमाशा दिखाए ताकि सरकार का रेवेन्यू बढे।
कुछ लोग ऐसे हैं जिन्हें लड़ने का नही लड़ाने का शौक है उन्हें लोगों को लड़ाये बिना चैन नहीं मिलता । जैसे नवाब पहले मुर्गे लड़ाते थे ,आजकल के नवाब आदमियों को लड़ाते हें जैसे मीणा को गूजर से दलित को ब्राहण से] पिछड़े को अति पिछड़ें से ।
आजादी के बाद का इतिहास आपस में लड़ने का इतिहास रहा है आजादी प्राप्त होते ही हिन्दु - मुसलमान लड़े , फिर मराठी - तेलगू , यानि भाषा के नाम पर लड़े , प्रांतो पर लड़े , नदियों के बंटवारें को लेकर लड़े , हिन्दु - सिक्ख जम कर लड़े , बाबरी मस्जिद को लेकर कारसेवक मुसलमान से लड़ मरे आदिवासी - गैर आदिवासी लड़े , कम्यूनिस्ट कम्यूनिस्ट से लड़े , नकस्ली सरकार से लड़े , आरक्षण हितेषी - आरक्षण विरोधी से लड़े भारतीय मुजाहदीन और अभिनव भारत लोगों को लामबन्द कर रही है । नहीं लड़ने वाले की लड़ने वाले नहीं सुनते वे कहते है तुम यह बताओ कि तुम किस तरफ हो । किसी भी तरफ नहीं हो तो हिजड़ै हो । लड़ो - डट कर लड़ो । आमीन

राजनीति में सती सावित्री
(राजनीति में आई एक स्त्री के प्रति लोगों (पुरूषों) का क्या दृष्टिकोण है जरा मुलाहिजा फरमाइये। )
राजनीति में सती सावित्री का क्या काम ! फिर भी सावित्री ने तय किया कि अब वह राजनीति करेगी उसने पार्टी अध्यक्ष से मुलाकात की । अध्यक्ष ने सावित्री का स्वागत करते हुए कहा कि महिलाओं को राजनीति में आगे की पंक्ति में आना चाहिए । हमारा सौभाग्य है कि आप आई, अध्यक्ष ने उनके सुन्दर चेहरे को लक्ष्यकर आश्वस्त किया कि आपको किसी पार्टी पोस्ट पर एडजस्ट कर दिया जायेगा ।
अध्यक्ष जी ने उनकी उम्र, शैक्षणिक यौग्यता व कार्य में दिलचस्पी को देख उन्हें पार्टी की युवा शाखा का अध्यक्ष नियुक्त कर दिया ।
अध्यक्षजी ने कहा पद जिम्मेदारी का है और उसमें पूरे प्रदेश के दौरे करने पड़ेगें । मेरे दौरे का प्रोग्राम बन गया है आप मेरे साथ चलेगी । सावित्री मना कैसे करती!
एक दौरे के बाद ही कार्यकर्ताओं में कई किस्से प्रचलित हो गये । अध्यक्षजी ने क्या चीज पकड़ी है ! जैसे अध्यक्षजी चील हो और सावित्री चिड़िया । ‘यार अध्यक्षजी के तो मजे है। अब तो और अधिक दौरे होंगे । अबकि बार सावित्री का विधानसभा का टिकिट पक्का है । अध्यक्षजी ने सारा भार सावित्री पर डाल दिया है। सावित्री को अफसोस था कि उसकी योग्यता और कार्य को कोई नहीं देख रहा है । निराशा के क्षणों में सावित्री ने अध्यक्षजी से कहा - बहुत हो गया , राजनीति छोड़ मैं अब सत्यवान के पास वापस जाउंगी ।
अभी तो तुम्हारे पाँव भी नहीं जमे है। मैं मुख्यमन्त्री से कहकर किसी निगम की अध्यक्ष बनवा देता हूँ ताकि तुम्हारा खर्चा पानी चल सके । और फिर अगले साल इलेक्शन है अभी से भाग दौड़ कर टिकट पक्का कर लो । अब मुख्यमन्त्रीजी को तो ‘गुडह्युमर’ में रखना ही होगा न । जिला व राज्य कमेटी को भी विश्वास में लेना होगा ।
पार्टी कार्यकर्ता जानते हैं कि सावित्री सबको विश्वास में ले लेगी । कार्यकर्ता सावित्री पर पूरी नजर रखे थे । उसकी पहुँच कहाँ - कहाँ तक है और क्यों है ?
ज्यों - ज्यों सावित्री के बारे में किस्से कहानियाँ फैलती गई । उसकी पुहॅंच भी ऊँची होती गई । कार्यकर्ता अपना काम निकलवाने के लिए सावित्रीजी का उपयोग करने लगे और मौका मिलने पर नजर भी फैंक लेते क्या पता चिड़िया फॅंस ही जाये ।
सावित्री का संघर्ष तब तक समाप्त नहीं होगा जब तक कि वह विधायक बनकर मन्त्री की कुर्सी पर न बैठ जाये ।
विधानसभा चुनाव आ गये , तो सावित्री को टिकट मिल गया । अब तो पार्टी वर्कर चौडे में बोलने लगे । फलाने के साथ हमबिस्तर हुई थी] साली को एक ही रात में टिकट मिल गया और जो दसियों वर्षो से राजनीति कर रहे हैं उन्हें टका सा जवाब दे दिया - महिलाओं को आगे लाना है ।
जब सावित्री पुरूष मतदाता की ओर उन्मुख हुई तो उसका चेहरा निहार कर वे अपने को धन्य मानते । अपनी ही पार्टी के विरोधी तमाम तरह के किस्से जनता में फैलाने लगे थे । जनता भी क्या चीज है जो इस तरह की बातों पर सहज ही विश्वास कर लेती है । नतीजा , अपनी पूरी इज्जत उतरवाकर भी सावित्री हार गई ।

Friday, May 1, 2009

श्याम पोकरा के उपन्यास बेलदार का लोकार्पण

'शारदा' पत्रिका एवं 'बेलदार' उपन्यास का विमोचन
शारदा साहित्य मंच के तत्वाधान में दिनांक १९।०४.०९ को डा. भीमराव अम्बेडकर भवन , रावतभाटा में लोकार्पण समारोह का आयोजन किया गया । जिसमें मंच की वार्षिक पत्रिका ‘शारदा’ एवं श्री श्याम कुमार पोकरा के उपन्यास बेलदार का विमोचन कोटा के वरिष्ठ कथाकार श्री विजय जोषी , कवि श्री सोहन सिंह केलवा एवं वरिष्ठ लघुकथाकार श्री भगीरथ परिहार ने किया । श्री श्याम पोकरा ने कोटा से पधारे मुख्य अतिथि श्री विजय जोशी का परिचय देते हुए कहा कि श्री जोशी अच्छे कथाकार ही नहीं अच्छे समीक्षक भी हैं मेरा इनसे परिचय सन 1999 में दशहरा मेले में हुआ । उनसे मुझे काफी उर्जा इस क्षेत्र में मिली प्रसन्नता का विषय है कि वे आज इस समारोह में उपस्थित होकर ‘बेलदार’ उपन्यास का लोकार्पण करेंगे श्री दिनेश छाजेड़ ने शारदा साहित्य मंच का परिचय देते हुए कहा कि जो पौधा हमने पाँच वर्ष पूर्व लगाया था , वह अब बड़ा होकर वृक्ष बनने लगा हे । आज इस मंच की पत्रिका ‘शारदा’ का प्रवेशांक वरिष्ठ साहित्कारों द्धारा किया जा रहा है समारोह के मुख्य अतिथि एवं वरिष्ठ कथाकार श्री विजय जोषी ने सभा को सम्बोधित करते हुए कहा कि अणुनगरी में साहित्य के जलते दीपों कों देखकर मुझे अतिप्रसन्नता हो रही हे हर्ष व्यक्त करते हुए उन्होने कहा कि यह बड़े गौरव की बात है कि विज्ञान व तकनीकी से जुड़े लोग भी साहित्य में गहरी रूचि रखते हैं । मानव मन में उपजी संवेदनायें ही शब्द बनकर सृजन के रूप में प्रकट हो 'शारदा' जैसी पत्रिका के रूप में आकार ग्रहण करती है । अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए श्री विजय जोशी ने कहा कि श्याम पोकरा का उपन्यास ‘बेलदार’ मुखर संवेदनाओं का एक गम्भीर दस्तावेज है । इस कृति में उपन्यासकार ने बेलदार के रूप में एक ऐसे चरित्र को प्रस्तुत किया है जो नैतिक मूल्यों की रक्षा के लिए कठोर संघर्श का मार्ग अपनाता है । अपमान को सहन कर अन्याय का डटकर मुकाबला करता हे और अंत में अपने धैर्य व बुद्धि के बल पर सत्य को उजागर करने में सफल होता है । मुझे आषा है कि बेलदार एक कालजयी कृति का स्थान ग्रहण करेगा । अध्यक्षीय उद्बोधन देते हुए वरिश्ठ लघु कथाकार भगीरथ परिहार ने मंच की गतिविधयों व उपलब्धियों पर संतोश प्रकट किया । शारदा साहित्य मंच के प्रभारी श्री अरूण भट्ट ने कहा कि छोटे - छोटे दीपों से हम साहित्य का प्रकाष फेलाने का प्रयास कर रहे हैं । जिसका परिणाम प्रकाश पुंज बनकर ‘शारदा' पत्रिका के रूप में आपके सामने है । हरिओम षर्मा , रमाकान्त शर्मा , रिपेन्द्र सिंह , देव किशोर , अरूण भट्ट राम शंकर वर्मा , तेजपाल गुसाईवाल , दिनेश छाजेड़ ,सुरेश छाबड़ा , वीरेन्द्र सिंह , गोविन्द प्रसाद , हेमन्त आमेठा , एन. पण्डित , श्याम पोकरा , प्रदीप गुर्जर आदि कवियों ने अपनी रचनाऐं प्रस्तुत की अंत में मंच के सदस्यों द्धारा सभी अतिथियों एवं ‘शारदा' पत्रिका के सम्पादक श्री ओ. पी. आर्य का श्रीफल व शौल ओढ़ाकर सम्मान किया गया ।

सुरेश छाबडा(कुरते में.)अरूण भट्ट,सोहनसिंह केलवा,विजय जोशी,भगीरथ,
श्याम कुमार पोकरा व दिनेश छाजेड

Sunday, April 26, 2009

मैत्रेयी पुष्पा के साक्षात्कार के अंश

http://anyatha.com/. से मैत्रेयी पुष्पा के साक्षात्कार के अंश

इसे फ़रोग की कविता के साथ पढें
ज्ञानसिन्धु पोस्ट दिनांक 23. 4. 09


संवाद

कहने का मतलब यह है कि प्यार से लबरेज आंखे लिए ही में जीवन में आने वाली आंधियों का सामना कर सकी हूं और हर पुस्तक रचना मे जता रही हूँ कि स्त्री प्रेम की मिट्टी से बनी होती है । उसके प्यार को अवैध कहना औरत की जिंदगी का अपमान है । देखिए कि वह अपने प्रेम में उस पति को भी शामिल कर लेती है जो उसके जीवन में उसकी मर्जी से नहीं आया । मगर समाज सोचता है कि वह इस स्वीकृति के साथ अपने आप को भौतिक और नैतिक रूप से निष्क्रिय माने । पुरुष को मीत नहीं , ईश्वर की तरह पूजे और मनुष्यगत प्रतियोगिताओ को छोड़ती चली जाये । मकसद यही हुया न कि वह अपने प्रेम को मारती चली जाये , जो उसकी अन्दरूनी ताकत होता है । स्त्री की इस नैसर्गिकता को पाप कहा , अपराध कहा । प्रेम के कारण उसके कुंआरेपन को लाँछित किया और विवाहेतर संबध बताकर व्यभिचार के खाते में डाल दिया ।

Thursday, April 23, 2009

पाप

http://setusahitya.blogspot.com/से

फ़रोग फ़रोखज़ाद की एक कविता
अनुवाद एवं प्रस्तुति : यादवेन्द्र
कविता के
साथ चित्र : अवधेश


पाप
बाँहों मैंने पाप किया पर पाप में था निस्सीम आनंद
समा गई गर्म और उत्तप्त में
मुझसे पाप हो गया
पुलकित, बलशाली और आक्रामक बाँहों में।
एकांत के उस नीरव कोने में
मैंने उसकी रहस्यमयी आँखों में देखा
सीने में मेरा दिल ऐसे आवेग में धड़का
उसकी आँखों की सुलगती चाहत ने
मुझे अपनी गिरफ़्त में ले लिया।
एकांत के उस अँधेरे और नीरव कोने में
जब मैं उससे सटकर बैठी
अंदर का सब कुछ बिखर कर बह चला
उसके होंठ मेरे होंठों में भरते रहे लालसा
और मैं अपने मन के
तमाम दुखों को बिसराती चली गई।
मैंने उसके कान में प्यार से कहा –
मेरी रूह के साथी, मैं तुम्हें चाहती हूँ
मैं चाहती हूँ तुम्हारा जीवनदायी आलिंगन
मैं तुम्हें ही चाहती हूँ मेरे प्रिय
और सराबोर हो रही हूँ तुम्हारे प्रेम में।
चाहत कौंधी उसकी आँखों में
छलक गई शराब उसके प्याले में
और मेरा बदन फिसलने लगा उसके ऊपर
मखमली गद्दे की भरपूर कोमलता लिए।
मैंने पाप किया पर पाप में था निस्सीम आनंद
उस देह के बारूद में लेटी हूँ
जो पड़ा है अब निस्तेज और शिथिल
मुझे यह पता ही नहीं चला हे ईश्वर !
कि मुझसे क्या हो गया
एकांत के उस अँधेरे और नीरव कोने में।
(‘अहमद करीमी हक्काक’ के अंग्रेजी अनुवाद से)
फ़रोग फ़रोखज़ाद

Friday, April 10, 2009

वैज्ञानिक दृष्टिकोण



वैज्ञानिक दृष्टिकोण
नेहरुजी चाहते थे कि यह पुराना हिन्दुस्तान, जो विश्वास में डूबा है विज्ञान में उन्नति के शिखर चूमे । वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाकर अपनी जीवन शैली को वैज्ञानिक -दृष्टि सम्पन्न बनाएं । हुआ भी वही , बडे -बडे बाँध बने ,बिजली घर बने ,बडे-बडे उद्योग खुले ,शोध शालाएँ खुली , इंजीनियरिंग व मेडिकल कालेज खुले , विद्यार्थी पढे , कुछ विदेश चले गये ,जो नहीं जा सके वे मन मसोस कर यहीं सरकार की खिदमत करते रहे ।
हमारे वैज्ञानिकों का यह हाल है कि माशहअल्ला क्या कहें ! न वे अपनी संस्कृति छोड़ सकते हैं न अपने संस्कार और विश्वास ,वे वैज्ञानिक दृष्टिकोण भी नहीं छोड सकते । अतः जिस तरह हमने अर्थशास्त्र में मिश्रित अर्थव्यवस्था जैसी नायाब धारणा का विकास किया , करीब वैसी ही नायाब सोच हमारे वैज्ञानिकों ने विज्ञान और विश्वास के मिश्रण में देखी । पूरब और पश्चिम का अदभूत मिलन । उद्योग लगे तो भूमिपूजन हो, मशीन लगे तो नारियल फ़ूटे , प्रसाद जरुर बंटे ,अगरबत्तियाँ और दीप जरुर प्रज्जवलित हो , पंडित जरुर मंत्र पढे अब यह सब न हो तो वैज्ञानिकों पर संस्कृति विहीन और संस्कार-हीन होने का आरोप लगेगा ।
एक बार हमारे मन में आई कि पंडत तू संस्कृत पढा है , धर्म की किताबे पढी , बच्चों की पुस्तकों से विज्ञान भी पढ़ ही रहा है , तो मन में एक दुविधा उठी कि सूर्य ग्रहण , राहु-केतु जब सूर्य को ग्रस लेते है , तब होता है या विज्ञान के अनुसार सूर्य और पृथ्वी के बीच में चंद्र के आने से होता है , तो हमने यह दुविधा चीफ़ इंजीनियर के सामने रखी। वे हनुमान भक्त थे , अक्सर मंदिर में भेंट होती थी , कुछ धार्मिक चर्चा भी होती थी , जब कभी जरुरत पडती प्रोजेक्ट में पूजन करने चला जाता , विश्वकर्मा पूजा तो होती ही है. चीफ़ साहब आप इन दोनों दृष्टिकोण में सामंजस्य कैसे बिठाते है ? वे बोले -इट्स वेरी सिम्पल धर्म को धर्म की तरह मानो और विज्ञान को विज्ञान की तरह । बस नो प्राब्लम ।
गैलिलियों ने कहा- पृथ्वी सूरज के चारों ओर चक्कर काटती है जबकि विश्वास कहता है ,सूरज पृथ्वी के चारों ओर चक्कर काटता है वह बेकार अपनी बात पर अडा रहा , जिससे उसे जेल की हवा खानी पडी हमें देखिये कि हम धर्म का प्रसाद भी खा रहे है , और विज्ञान के लड्डू भी। पंडित जी अपनी दुविधा यहीं छोडिये ,सबसे बडा सिध्दांत है कि आपके दोनों हाथों में लड्डू है या नहीं ।

प्रार्थना
पडोसी ने प्रभु से प्रार्थना की -हे भगवान ! मेरे प्रिय पडोसी के यहाँ महान देशभक्त पैदा हो ।
दूसरे पडोसी ने प्रार्थना की - हे भगवान! मेरे जीवन का कोई भी पूण्य हो तो मेरे घर चद्रास्वामी जैसा व्यक्ति पैदा हो।
तभी आकाशवाणी हुई ।
'वत्स,तुम्हारे पडोसी ने तुम्हारे लिए जो प्रार्थना की थी मैंने स्वीकार करली है , क्योंकि उसकी प्रार्थना अच्छी थी'
'कौन-सी प्रार्थना भगवान ?
यही की स्वतंत्रता की 50वीं वर्ष गांठ पर तुम्हारे घर महान देशभक्त पैदा हो ।
'मैं लुट जाऊँगा प्रभु ! आप मेरी सुनिये । पडोंसी तो जलन और ईर्ष्या के मारे प्रार्थना कर रहा है ।
'सोच लो,देशभक्ति सर्वोच्च गौरव है ।
'इसमें क्या सोचना ,्मैं अपनी संतान को पांचसितारा संस्कृति में फ़ली-फ़ूली देखना चाहता हूँ ,तिहाड जेल में नहीं
'चद्रास्वामी भी तो तिहाड जेल में थे
'लेकिन भगवान वे वहाँ भी पाँचसितारा सुविधा में थे ।
'मैं तुम्हारे उत्तर से संतुष्ट नहीं हुआ ,जरा खुलासा करो।
'भगवान आप तो अंर्तयामी है, इस मूर्ख की बुध्दि पर तरस खाएँ इतना तो सभी जानते है कि क्रान्तिकारी स्वंय तो यातनाएँ झेलकर , बेमौत मारा जाता है उसके परिवार के लोगों को भी वह जीवनभर दुख ही देता है ।



Wednesday, March 25, 2009

युगल की लघुकथा' जूते

जूते
0 युगल
चैतू राजमिस्त्री के साथ का काम करता था । एक दिन सिर पर से ईंट उतारते समय एक ईंट पाँव पर आ गिरी । उँगलियॉ कुचल गई । पत्नि बोली - पाँव मे जूते होते तो उँगलियों नहीं कुचलती ।'' चैतू ने उँगलियॉ में उठती बिच्छु के डंक के समान टीस को दाँत पर दाँत रखकर बर्दाश्त करने की कोशिश की और बोला - "तुम्हें क्या पता कि जूते कितने महंगे हो गये हैं जब पेट चलाना ही दुशवार हो, तो जूते ……… "
पत्नी हल्दी का गरम लेप उसके पाँव पर चुपचाप लगाती रही । पेट चलाना तो सचमुच दुशवार हो रहा था । बेटा पारस बीस साल का था । बडे अरमान से पढ़ाया था । मैट्रिक पास कर गया था । इसलिए उसे मजदूरी करना अच्छा नहीं लगता था । किसी और काम की तलाश भी नहीं करता था ! गाँव के अबंडों के साथ ताश के अड्डे पर जमा रहता । चैतू को जिस दिन काम नहीं मिलता , वह नीम-बबूल के दँतवन तोड कस्बे में बेच आता। आठ -दस रूपये आ जाते । एक दिन वह जूतों की दुकान में गया था । बहुत मामूली जूतों की कीमत इतनी थी कि दो दिनों की मजदूरी सर्फ़ हो जाती । अपने जूते के लिए परिवार के लोगों को दो दिनों तक भूखे रखना………अरे, छोडो, जब इतने दिन कट गये ,तो बाकी भी कट जायेंगे । लेकिन कई रात जूते उस के सपने में आते रहे।सपने में वह अपने पाँवों में जूते डाले चल रहा होता कि उस के पाँव दूसरों के पाँवो में बदल जाते ।उन जूतों को हसरत भरी नजरों से देखता वह चलता रहता कि उस के पाँवों पर ईंट आ गिरती और आंखें खुल जाती।
चैतू की उँगलियों को कुचले दो महीने भी नहीं गुजरे थे कि एक दिन उस के तलवे में शीशे की किरच घुस गयी। खून का बहना रूकते नहीं देख पारस विचलित हो उठा । बाप को कस्बे के अस्पताल में ले गया । उस दिन उस ने शिद्दत के साथ सोचा कि बापू के पाँवो में जूते होने चाहिए । दूसरे दिन ही वह पडोसी के साथ उसी के खर्च से पंजाब चला गया। लौटा दस महीने बाद । बाप के लिए जूते ले आया था। चैतू आँगन में खाट पर लेटा था। बेटे को देख कर माँ हर्षित हुई - "इतने दिनों कहाँ रहे बेटा ! न कोई चिट्ठी ,न कोई पता -ठिकाना।" पारस ने उत्साह के साथ बाप के लिए लाये जूते निकाले । चैतू की आँखें डबडबा आयीं । माँ कुछ क्षणों तक जूते को देखती रही ।फ़िर उसने चैतू के पाँव पर से चादर हटा दी । गैंग्रिन हो जाने के कारण डाक्टर ने वह पाँव काट दिया था ।"

Sunday, March 15, 2009

गजल










चाँद शैरी की गजल
मुल्क तूफाने बला की जद में है
दिल सियासत दान का मसनद में है
अब मदारी का तमाशा छोड कर
कल वो आदमी संसद में है
एकता का तो दिलों में है मुकाम
वो कलश में हैं न वो गुम्बद में है
जिंदगी भर खून से सींचा जिसे
वो शजर मेरा निगाहे बद मे है
फिर हैं खतरे मे वतन की आबरू
फिर बड़ी साजिश कोई सरह्द में है
एक जुगनू भी नहीं आता नजर
यह अंधेरा किस बुरे मकसद में हैं
चिलचिलाती धूप में 'शेरी' खयाल
हट के मन्जिल से किसी बरगद में हैं













पुरुषोत्तम 'यकीन' की गजल

न कोई शिकवा न काम रखना
सभी से लेकिन सलाम रखना
किसी को रख लेना अपने दिल में
और उसके दिल में क़याम रखना
अमल को अपने ग़ज़ल में अपनी
मुहब्बतों का पयाम रखना
भरोसा पल का नहीं पे पल का
है लाजमी एहतिमाम रखना
नहीं, न हो,जेरे - आस्माँ घर
दिलों के भीतर मकाम रखना
तुम अपनी यादों की डायरी में
कहीं तो मेरा भी नाम रखना
जफ़ा के बदले वफ़ा मुसलसल
तू रोजो - शब , सुबहो शाम रखना
बहुत ज़माने ने कहर तोड़ा
गया न 'ईमां' न 'राम' रखना
सभी को खुल कर पिला ऐ साकी
किसी का खाली न जाम रखना
'यक़ीन' शैरो - सुखन की जद पर
अदब से दर्दे -अवाम रखना

Wednesday, February 25, 2009

एंट्रेंस टेस्ट


हमारे देश के विश्वविद्यालय बहुत प्रसिद्ध है यहाँ का एंट्रेस टेस्ट बहुत मुश्किल है । कोई शूरवीर ही टिक पाता है वरना तो टै बोल देता है। काँलेज में घुसते ही उसे सीनियर घेर लेंगे । फिर आदेश देंगे 'पतलून उतारो' !…
'नहीं उतारता' ? एक ने आकर उसके गाल मरोड़ दिये ।
'क्या चिकना है' दूसरा सीनियर आगे बढ़ता है ,
'हाथ उपर कर' , हाथ उपर करते ही उसने पतलून की चैन खोल दी । नया विद्यार्थी रुआँसा हो गया ।
'अबे छोरियों की तरह क्यों रो रहा है , चल मुर्गा बन जा' वह मुर्गा बन जाता है , तीसरा सीनियर उस पर आकर बैठ जाता है । 'अबे बोल कूकड़ू कू' । चौथे ने उसकी जांघों से एक अण्डा निकाला , 'अरे दे दिया अण्डा' । सब हो - हो कर हँसने लगे । वे उसके शरीर से छेड़छाड़ करने लगे ।
वह अपमान झेल रहा था लेकिन अन्दर गुस्से का गुबार भी उठ रहा था उसका गुस्सा फूट पड़ा ।
'अबे हिजड़ों एक - एक कर आ जाओ फिर देखो क्या कचूमर बनाता हूँ
'तो ये बात है तुझे बोलना भी आता है' एक ने थप्पड़ रसीद किया दूसरे ने चुतड़ पर लात मारी । तीसरे ने एक माँ की अश्लील गाली दी । चारों ने उसे घेर लिया
'बोल क्या बोलता है' ? गुस्सा पता नहीं कहाँ गया। विद्या ये सब सिखाती है ! विद्या ददाति विनयम उसने आप्त वचन बोल दिया ।
'तेरा बाप क्या संस्कृत का मास्टर है' वे फिर हो - हो कर हँसने लगे ।
'चल माँफी मांग '। उसने माँफी मांगी
'चल फूट '। वह वहाँ से फूट गया । वह एंट्रेस पास हो गया ।

Saturday, February 14, 2009

प्रदीप कान्त की गज़लें


प्रदीप कान्त
22 मार्च 1968 को रावत भाटा (राजस्थान) में जन्म ।
अजमेर विश्व विद्यालय से गणित में स्नातकोत्तर के पश्चात भौतिकी में भी स्नात्तकोत्तर।
कथादेश, इन्द्रपस्थ भारती, सम्यक, सहचर, अक्षर पर्व आदि साहित्यिक पत्रिकाओं व दैनिक भास्कर, राजस्थान पत्रिका, दैनिक जागरण आदि समाचार पत्रों में गज़लें व गीत प्रकाशित।
प्रगत प्रौद्योगिकी केन्द्र में वैज्ञानिक अधिकारी के पद पर कार्यरत
फोन: 0731 2320041
Email: kant1008@rediffmail.com, kant1008@yahoo.co.in



1
किसी न किसी बहाने की बातें
ले देकर ज़माने की बातें
उसी मोड़ पर गिरे थे हम भी
जहाँ थी सम्भल जाने की बातें
रात अपनी गुज़ार दें ख़्वाबों में
सुबह फिर वही कमाने की बातें
समझें न समझें हमारी मर्ज़ी
बड़े हो, कहो सिखाने की बातें
मैं फ़रिश्ता नहीं न होंगी मुझसे
रोकर कभी भी हँसाने की बातें

2
मोड़ के आगे मोड़ बहुत
रही उम्र भर दौड़ बहुत
द्वापर में तो कान्हा ही थे
इस युग में रणछोड़ बहुत
नियम एक ही लिखा गया
हुऐ प्रकाशित तोड़ बहुत
किसिम किसिम की मुखमुद्राएँ
धनी हुऐ हँसोड़ बहुत
अन्तिम सहमति कुर्सी पर
रहा सफल गठजोड़ बहुत
3


अपने रंग में उतर
अब तो जंग में उतर
सलीका उनका क्यों
अपने ढंग में उतर
दर्द को लफ़्ज़ यूँ दे
किसी के रंज में उतर
बदतर हैं हालात ये
कलम ले, तंज में उतर
अपने में ही गुम है
अपने दिले तंग में उतर

Thursday, February 5, 2009

अकबर महान








अकबर महान
भारतीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण प्रश्न है - अकबर को अकबर महान क्यों कहते हैं ? कारण सहित उत्तर लिखो इधर इतिहास की पुस्तकें पढकर विद्यार्थी इसका उत्तर कुछ इस तरह लिखते है।
प्रथम दृष्ट्या यह प्रश्न ही गलत है अकबर महान नहीं हो सकता इसके कई कारण है ,पहला और अत्यंत मह्त्वपू र्ण कारण यह है कि वह एक मुस्लिम शासक था उसके पूर्वज अन्य देशों से आए थे उन्होंने भारत को गुलाम बनाया था।
दूसरा कारण यह कि वह महाराणा प्रताप का नम्बर एक दुश्मन था महाराणा प्रताप परमवीर देशभक्त थे और ता-जिन्दगी अकबर से जूझ ते रहे महाराणा प्रताप हमारे राष्ट्रीय नेता है इस हिसाब से देखे तो महाराणा का दुश्मन कैसे महान हो सकता है
तीसरा कारण यह है कि वह बेपढा -लिखा था
चौथा कारण यह था कि वह साम्राज्यवादी था और उसे रात-दिन अपने साम्राज्य की चिंता थी साम्राज्यवादी कभी महान नहीं हो सकता।
वह एक तानाशाह था जिसने हुस्न की मलिका अनारकली को जिंदा दीवार में चुनवा दिया ,वह सामाजिक न्याय का परम शत्रु था , गैर बराबरी का हिमायती , तभी तो कनीज अनारकली के साथ सलीम का निकाह नहीं करवाया
अन्तिम कारण यह है कि उसने कई शादियों रचवाई बादशाह सलामत ने अय्याशी करने और इमारतें बनवाने के अलावा कुछ नहीं किया ,इसलिए अकबर को महान शासक नहीं कहा जा सकता

Wednesday, January 21, 2009

गोविन्द गौड की गज़लें


गोविन्द गौड की गज़लें

हो रहा है क्या गज़ब इधर ये जंग की तरह
बह रहा है यहां लहू भी क्यों रंग की तरह
हाय क्यों मचा हुआ है शोर मार-काट का
कुछ न कुछ पिये हुये हैं लोग भंग की तरह
बीच शहर आज उसका बुत खडा हुआ मिला
लाश जिसकी कल मिली थी एक नंग की तरह
किस कदर बाजार भाव बेलगाम हो गये
कुदते हैं फ़ांदते हैं अब तुरंग की तरह
हाथ में लिये हुये मशाल चल पडा हूं मैं
और रास्ता है आतिशी सुरंग की तरह
दुखभरी यह जिंदगी तो हमने ही कुबूल कि
वो है खुशनसीब जो जिया मलंग की तरह
2
आपके शहर में आकर बडा हैरान हूं मैं
सच के दामन में लिपट कर परेशान हूं मैं
लोग रहने नहीं देते मुझे इन्सान ही क्यूं
देवता कहते, कभी कहते हैं शैतान हूं मैं
चाहता हूं,रहूं अपने खयाले-हाल में ही
सोचता हूं मगर खुद से बहुत अनजान हूं मैं
जानते हो जिन्दा हूं बनकर फ़कत खिलौना
लाश की तरह यूं तो अलफ़ बेजान हूं मैं
आदमी बनकर ही रहने की है फ़ितरत मेरी
आगया जिद पे तो देखोगे कि अरमान हूं मैं
आप क्या कीजियेगा जानकर पहचान मेरी
मैं तो इन्सान हूं, हिन्दू न मुसलमान हूं मैं




Tuesday, January 6, 2009

छात्रों के लिए प्रश्न पत्र


व्यंग्य
छात्रों के लिए प्रश्न पत्र

नोट - पहला प्रश्न अनिवार्य है । सही उत्तरों को टिक मार्क करों।

1 बताओं तुम्हें कैसी लडकी पसंद नहीं है ?
(a) सुन्दर ,पढी-लि्खी ,साहसी ,हाजिर जवाबी जो ईंट (ताने) का जवाब पत्थर से दे सके ।
(b) ऐसी सुन्दर , सुशील व चतुर लडकी , जो सास और ननद की नाक में नकेल डाल सके।
(c) ससुराल वाले हाथ-पांव चलाए तो उनके हाथ-पांव तोड दे और थाने में रपट लिखाकर उन्हें गिरफ़्तार करवाए।)
(d) उपरोक्त सभी
2 बताओं तुम्हें कैसी लडकी पसंद है ?
(a) ड्राईंगरुम में सुसंस्कृत गृहणी लगे।
(b) डाईनिंग रुम में स्वादिष्ट व्यंजन परोसे।
(c) बेडरुम में बिंदास बाला हो ।
(d) उपरोक्त सभी
3 जब आप विवाह योग्य हो और बेरोजगार हो तो व्यवसाय में लगने का सबसे सरल तरीका ईजाद करो।
उत्तर न आता हो तो नीचे दिया गया संकेत पढो।
वैवाहिक विज्ञापन 'सभ्य कायस्थ परिवार के 24 वर्षीय सुन्दर लडके को ऐसी वधू की आवश्यकता है जिसका परिवार वर को घर जंवाई के रुप में रखना चाहता हो और उसकी सेवाओं का उपयोग व्यापार में लेना चाहता हो इच्छुक पार्टी तुरंत संपर्क करे ।
4 अगर तुम्हारी पत्नी को लेकर तुम्हारे माँ बाप तुम्हें ताने कसे तो तुम क्या करोगे । सही उत्तर पर टिक लगाओ
अ) चुटिया पकड ,घसीट्ते हुए माँ के कदमों मे ले आओगे ।
ब) दो चार चाँटे रसीद कर उसे उसकी औकात बताओगे ।
स) उसे उसके पीहर भेज दोगे और दूसरे विवाह की धमकी दोगे ।
द) गुस्से में आकर पत्नी का गला दबा दोगे ।
5 वधू को गला दबाकर मारने से आपको क्या नुक्सान हो सकता है जानते हो तो लिखों । न जानते हो तो जानने की कोशिश करो अगर फ़ायदा होता हो तो उसकी भी जानकारी प्राप्त करो । यह ज्ञान जीवन में काम आएगा।
6 ससुराल से तुम्हे लेने ही लेने का हक क्यों है ? और संविधान की कौन सी धारा में यह प्रावधान है।
7 क्या तुम जानते हो कि दहेज मांगना, वधू को यातना देना या उसे मार देना संगीन अपराध है इसके बावजूद लोग परवाह नहीं करते। तुम करते हो तो डरपोक हो। हो या नहीं, बताओं ।शोध कार्य कर उन कारणों का पता लगाओ जिसकी वजह से लोग बेधडक ऐसे अपराध कर जाते है और उनका बाल भी बाँका नहीं होता। पुलिस न्यायालय, और वकीलों की भूमिका का भी पता लगाओ।
8 तुम्हें नौकरी करने वाली पत्नि नहीं चाहिए क्योंकि-
1 औरत की कमाई खाना पाप है।
2 औरत का दहलीज लांघना परम्परा के विरूध्द है ।
3 औरत का कोई भरोसा नहीं किसी के साथ गुलछर्रे उड़ा सकती है ।
9 तुम्हे नौकरी वाली पत्नि चाहिए क्योंकि :-
1 समाज में आपकी प्रतिष्ठा बढ़ेगी
2 घरेलू कामकाज के अलावा परिवार की आमदनी भी बढ़ जाती है
3 अन्य ईर्ष्या से जलेंगे तो तुम्हे खुशी होगी
10 अगर वो तुम्हे और तुम्हारे परिवार को अपनी कमाई न दे तो तुम क्या करोगे
1 बहला फुसला कर रुपये ऐंठते रहोगे
2 बहाने बनाकर पैसे ले लोगे , जैसे कर्जा चुकाना है
3 धमका कर पैसा लोगे
4 फिर भी पैसा न दे तो आर - पार की लड़ाई लड़ोगे
11 अगर पत्नि अपनी कमाई को
1 अपने भाई की पढ़ाई पर खर्च करना चाहे
2 अपनी बहन की शादी पर खर्च करना चाहे
3 अपने पिता के इलाज पर खर्च करना चाहे
तो तुम्हे कैसा लगेगा ? बिना हिचक उत्तर दो ।
12 अगर पत्नी से पहली संतान लड़की हो और वह दूसरी संतान न चाहे तो तुम कया करोगे ?
1 उसका समर्थन करोगे
2 दूसरी संतान के लिए राजी करोगे
3 दूसरी संतान लड़की हुई तो …? इस प्रश्न का तुम्हारे पास क्या जवाब होगा ?
13 व्यापार में घाटा हो , व्यापार में और पूंजी लगानी हो तो वह आसानी से कहाँ से उपलब्ध हो सकती है ।
सीधी ऊंगली और टेढ़ी ऊंगली की तर्ज पर दो रास्ते तजवीज करो । अपनी कल्पना शक्ति का उपयोग करो या दूसरों के अनुभव से सीखो ।
14 ससुराल से तुम्हे लेने ही लेने का हक क्यों है ? और संविधान की कौनसी धारा में यह प्रावधान है ?

Monday, December 22, 2008

छात्राओं के लिए प्रश्नपत्र



नोट- किन्ही दस प्रश्नो के उत्तर दो। अन्तिम प्रश्न अनिवार्य है ?
1 कभी-कभी रसोईघर में स्टोव क्यों फट जाता है और उससे बहुएँ ही क्यों जलती है । घबराएँ नहीं , और सही उत्तर दें ?
2 कई बार ऐसा होता है कि ससुराल मे बहू की लाश पंखे से झूलती नजर आती है; क्यों? यह सीन आप में डर पैदा करता है या क्रोध. कारण सहित उत्तर दो ।
3 अक्सर ऐसा होता है कि बहू की पीठ पर निशान नजर आते है। ये निशान किस के घोतक है ? इसका इलाज बता सकते हो तो बताओ।
4 ससुराल वालों के ताने सुनने में जो बहू दक्ष होती है यानि सुनी को अनसुनी कर देती है, फायदे मे रहती है इस बारे में आपकी राय क्या है, स्पष्ट लिखो ।
5 जो बहुएँ अपमान सह सकने की हिम्मत रखती है उन्हें हम साहसी महिला कहेंगे । सही या गलत ।
6 बहू को ससुराल में सम्मान कब मिलता है? जब वे अपने साथ ,,,,,,,,,,,, लाएँ । खाली जगह भर कर बताओ कि बहुओं को ससुराल में सम्मान मिलता भी है या नहीं ।
7 बहू के लिए सबसे बडा विलेन कौन होता है ? पति,सास,ससुर,ननद, देवर या जेठ ।
8 क्या कारण हैं कि सास बहुओं के आगे झूठे बर्तनों और गंदे कपडों का ढेर लगा देती है और दिन में तीन बार पौंछा लगवाती है?
9 पति नाम का जन्तु अक्सर घुग्घु क्यों बन जाता है , कारण सहित उत्तर दो ।
10 सास ,ससुर ,देवर,ननद और पति के पारिवारिक सहयोग का एक क्रूर व वीभत्स उदाहरण दो।
नहीं मालूम हो तो अखबार पढो ।
11 विवाहोपरांत अगर तुम्हारे साथ कोई हादसा हो जाय तो तुम ससुरालवालो या पीहर वालो को कोसोगी या कोई कदम उठाओगी । बताओ वह कदम कौन सा होगा ?
12 नारियों से संबंधित जितने कानून है वे सरल रुप में दसवीं के कोर्स में लगाए जाएँ अथवा अशोक महान और शाहजाहाँ को ही पढा जाय । अपने विचार लिखो ।
13 कौन सा लडका तुम्हारी पहली पसंद होगा 1) इंजीनियर 2) अध्यापक 3) क्लर्क ,4दहेज विरोधी । निस्सकोंच जवाब दो । साथ में यह भी बताओं की सबसे हाइ रेट किस की होगी?
१४ घर में गैस के दो-दो कनेक्श्न होने पर भी राशन कार्ड पर सास मिट्टी का तेल क्यों मंगवाती है।

Sunday, December 14, 2008

ग्लोबल विलेज

गाँधीजी के आर्थिक स्वराज का सपना अब साम्राज्यवाद की गोद में खेल रहा है हमें बताया जा रहा है कि इस देश की समस्याएँ साम्राज्यवाद ही हल कर सकता है । क्योंकि 21 वीं सदी में साम्राज्यवाद ने मानवीय चेहरा प्राप्त कर लिया है। पूँजीवाद की विश्व विजय को वैश्वीकरण कहा जा रहा है इसका नेतृत्व जी-8 के देश कर रहे है, इन देशों का सिरमौर संयुक्त राज्य अमेरिका है । विश्व बैंक , अन्तर्राष्टीय मुद्राकोष और विश्व व्यापार संगठन के जरिये जी-8 के देश पूरे विश्व में मुक्त विचरण (व्यापार) की सुविधा के लिए दबाव बना रहे है , विदेशी पूँजी ,विदेशी तकनीक ,विदेशी कर्ज और विदेशी वस्तुएँ भारत को कुछ ही वर्षो में जापान बना देगी और फ़िर अमेरिका ,बस उन्हे थोडी सुविधाएँ दीजिए ,उनकी सलाह (शर्ते) मानिए प्रतिबन्ध हटा लीजिए फ़िर देखिए भारत स्वर्ग की सीढियाँ चढने लगेगा इस ग्लोबल विलेज में सबके लिए सुख -सुविधा होगी ,गरीबी, बेरोजगारी व अभाव विश्व के नक्शे से मिट जायेंगे एक नयी सभ्यता करवट लेगी। मुक्त बाजार के पैरोकारों का यह सपना सचमुच पूरा होने वाला है ,बस इनका मार्च मत रोकिए ।
लेकिन हमारी जी-8 के देशों से एक ही विनती है कि हमने तो प्रतिबंध हटा ही लिए है और बाकी बचे भी आज नहीं तो कल हटा ही लेंगे ,लेकिन आप भी तो अपने देश में हमारे प्रवेश पर लगे प्रतिबंध हटाएँ , श्रम को भी तो मुक्त विचरण करने दें , फ़िर देखते हैं विश्वविजयी तिरंगा प्यारा कहाँ-कहाँ नहीं फ़हराता तब 2 अक्टूबर के दिन आर्थिक स्वराज्य का सपना हम भारत में नहीं जी-8 के देशों मे देखेंगे । आमीन्

Saturday, November 29, 2008

सबसे बड़ा शहीद

भारत में ऐसे नेता है , जिन्हें महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता कहा जाना कुछ हजम नहीं होता , उनका कहना है - भारत माँ है , गाँधी तो उसके सपूत थे , पिता होने का प्रश्न ही कहां है ? वे पक्के हिन्दू थे और मुसलमानों का पक्ष लेते थे , इसलिए गोड़से उनसे बहुत नाराज रहा करता था लेकिन गोड़से अंग्रेजों से नाराज नहीं था , महात्मा गाँधी से नाराज था , वह देशभक्त था और देश के लिए उसने राष्ट्रपिता की जान ले ली और बदले में फाँसी पर झूल कर शहीद हो गया आज भी उसके कई हमखयाली उसकी शहादत से तुलना करते हैं यह देश भक्ति भी कितनी कुत्ती चीज है कि राष्ट्रपिता को गोली मारकर देशभक्त कहलाया जाए , आज भी ऐसे देशभक्त हैं , जो गोड़से को ठीक मानते हैं , बल्कि बिल्कुल ठीक मानते हैं अगर ऐसे देशभक्तों के हाथों मे सत्ता आ गई तो गोड़से सबसे बड़े देशभक्त व शहीद माने जायेंगे , हो सकता है कुछ सालों बाद संसद में उनके चित्र का अनावरण भी हो ।