Friday, August 10, 2012



अनीता वर्मा के लघुकथा संग्रह दर्पण "झूठ ना  बोले"  का   लोकार्पण करते हुए भगीरथ , रतन कुमार सामरिया ,बीच में अनीता वर्मा !

Wednesday, May 9, 2012

आठवें दशक की चर्चित लघुकथाएं



'ज्ञानसिन्धु' में एक श्रृंखला 'आठवें दशक की चर्चित लघुकथाएं"  आरम्भ करने जा रहे है ताकि पाठक व लेखक आठवें दशक के लघुकथा लेखन से परिचित हो सके तथा आज के लघुकथा लेखन से उसका तुलनात्मक अध्ययन कर सकें। और देख सके कि इस आन्दोलन ने क्या उपलब्धियां हासिल की है।इस श्रृंखला में आठवें दशक में प्रकाशित लघु कथा संकलनो,पत्रिकाओं के लघुकथा विशेषांको से विशिष्ट लघुकथाएं प्रस्तुत की जायगी। लघुकथांकों के अन्तर्गत हम निम्न को सम्म्लित कर रहे है, अतिरिक्त(1972-73) अंतर्यात्रा(1972 व1977)दीपशिखा(1973),सारिका(जुलाई 1973 व 1975),तारिका (1973),शिक्षक संसार (73 व 77) ,साहित्य निर्झर(जु1974),मिनियुग (1974),शब्द (1975),प्रगतिशील समाज(जून1975),अग्रगामी (जून1977),समग्र(1978),युगदाह(1979),नवतारा(1979),प्रतिबिम्ब(1979),ग्रहण(1979), कुरुशंख(1980),वर्षवैभव (1980), व  लहर (1980)।
सम्मिलित
लघुकथा संकलनों के अन्तर्गत-गुफाओं से मैदान की ओर (1974) सम्पादक-भगीरथ व रमेश जैन ,प्रतिनिधि लघुकथाएं(1976)सं-सतीश दुबे एवं सूर्यकांत नागर, श्रेष्ठ लघुकथाएं (1977) सं शंकर पुणतांबेकर, समान्तर लघुकथाएं(1977)सं-नरेन्द्र मौर्य/नर्मदा प्रसाद उपाध्याय ,छोटी-बडी बातें(1978)सं-महावीर प्रसाद जैन/जगदीश कश्यप,युगदाह(1979) सं-प्रभाकर आर्य,आठवें दशक की लघुकथाएं(1979) सं-सतीश दुबे, व   तनी हुई मुट्ठियां(1980) सं-मधुदीप/मधुकांत के
अवलोकन के दौरान जो उत्कृष्ट कथाएं ध्यान मे आएगी उन्हें प्रकशित किया जायगा।कुछ एकल संग्रहों जैसे "सिसकता उजास" (1974) सतीश दुबे,"नया पंचतंत्र"(1974) रामनारायण उपाध्याय,मोह्भंग(1975)कृष्ण कमलेश;  "अभिमन्यु का सत्ताव्यूह"(1977) श्रीराम ठाकुर 'दादा'; कालपात्र (1979) दुर्गादुत्त दुर्गेश ;एक और अभिमन्यु(19790सनत मिश्र;नीम चढी गुरबेल(1980) श्रीराम मीणा को भी खंगाला जायगा।
समाचार पत्रो के लघुकथा परिशिष्ठ व उस समय की पत्र - पत्रिकाओं मे प्रकाशित श्रेष्ठ लघुकथाओ को भी प्रस्तुत करने का प्रयत्न किया जायेगा!
   उत्कृष्ट्र रचनाओं को पुन: प्रकाशित कर लेखकों एवं पाठकों के सम्मुख प्रस्तुत करना और उनपर आलोचनात्मक टिप्पणिया आमंत्रित करना हमारा उद्देश्य है ताकि आठवे दशक की बेहतरीन रचनाओं का संकलन प्रस्तुत किया जा सके।
मित्रों से आग्रह है कि इस कार्य में पूरा सहयोग दें सहयोग निम्न रुप से कर सकते है-लेखकों के फोटो भेज कर',विलुप्त अंकों की फोटो प्रति भेज कर,कोई स्रोत छूट गया हो उसकी जानकारी,अच्छी लघुकथा की ओर ध्यान आकर्षित कर,
और आलोचनात्मक टिप्पणियां भेज कर ,सामान्य रचनाओं की इस संकलन में जगह नहीं रहेगी।पहले रचनाएं क्रोनोलोजिकल ओर्डर में नहीं होगी लेकिन उन्हें बाद मे क्रोनोलोजिकल ओर्डर में व्यवस्थित कर लिया जायगा। और फिर उसे पुस्तक रुप में प्रकाशित किया जायेगा!








 ऐन्टीकरेप्शन

मोहन राजेश  
   
     होटल के सभी कोनो पर रात गदरा गयी थी। ग्राहकों को खाने के साथ पीने को देशी_ विदेशी भी 'सर्व' की जा रही थी, एक कोने में जरा सी फुसफुसाहट हुई ।
वह आबकारी इन्सपेक्टर कह रहा था......यार कोई माल......वाल हो तो ......मैनेजर इधर -उधर कनखियों से देखते हुए फुसफुसाया, सर मिल तो सकता था, पर आज कल 'ऐन्टीकरेइशन' में नये ऑफीसर आये हैं, थोड़े दिन देखना पडेगा,
........दोनों का मुंह एक बारगी उतर सा गया,
थोडी ही दूर दूसरी सीट पर बैठा 'दूसरा' पैग खाली करते हुए गुर्राया, देखना क्या है ? अरेन्ज करो न । 'एन्टीकरेप्शन तो यहॉं बैठा है ।
........इन्सेपक्टर और मैनेजर के चेहरे खिल गये........ वे ही नए ऑफीसर थे, .....कुछ देर बाद वहॉं गंगा बही फिर बहती गंगा में हाथ धो लिये,

( अतिरिक्त-अंक ५ अगस्त १९७२)

 






कछुए
      
  भगीरथ 
   

संबधो का सौंदर्य सामाजिकता एवं नैतिकता पर निर्भर करता है, लेकिन उनकी ठोस नींव आर्थिक आधारों पर टिकी होती है। यह एहसास अनुभव के आधार पर परिपक्व होता गया । स्वार्थो को नैतिकता का जामा पहनाकर मुझ पर ओढा दिया गया था। मैं उस लबादे से मुक्ति चाहता था। मगर वह मुझे और दबोच लेता । 
       संबधों के निर्वाह में , सामाजिक जिम्मेदारियों और नेतिक मान्यताओं को ढोने में मेरी समस्त शक्ति खप जाती है , फिर भी संबधों के फोडे रिसने लगे, क्योंकि अर्थोपार्जन की मेरी अपनी सीमाएं थी और उनकी आकांक्षाएं सीमाहीन।
       मैनें कछुए की तरह अपने पॉंव अंदर समेटने आरम्भ कर दिए। चारों तरफ चारदीवारी , जिसकी खिडकियॉं भी नहीं खुलती थी। नितांत एकाकी जीवन ! एकाकीपन की ऊब । झुंझलाहट । क्रोध की एक तीव्र अनुभूति , जो केवल लिखे हुए कागज फाड ने तक सीमित है।
       सुनसान सडक पर रात गए घूमना। चौकन्ना बना देखा करता हूँ कि कहीं लोगों की ऑंखे मुझ पर न टिकी हों। लोग यह न समझें कि मैं अकेला हू।, रात में भटके जल पक्षी की तरह बेचारा!
       मैं लोगों की सहानुभूति का पात्र नहीं बनना चाहता। मैं हमेशा डरा करता हॅं कि कहीं कोई सहृदय (?) व्यक्ति मेरे पास पहुचंकर मेरे अंतरतम को छू न ले, क्योंकि मैं रोना नहीं चाहता।


( अतिरिक्त-अंक ४ मई १९७२)










Sunday, April 8, 2012

आठवे दशक की लघुकथाए -3



पेट का माप

सुशीलेन्दु  
      
       अफसर बोलता जा रहा था....हाइट पांच फीट छः इंच ....चैस्ट चौतींस छत्तीस.....वेट एक सौ पैतालींस पौंड ....क्वाइट फिट तुम इधर आ जाओ जवान।
युवक किनारे खिसक गया और चारों तरफ देख कर झिझकता हुआ बोला....सर
यस बोलों क्या बात है A
युवक सहमता हुआ बोला....सर आपने मेरी लम्बाई  सीना वजन आदि को मापा परंतु .... परंतु आप शायद मेरे पेट का माप लेना भूल गये, सर मैं तो केवल पेट भरने के लिए ही......वह आगे नहीं बोल पाया।
       ऑफीसर ने युवक को बड़े ध्यान से देखा और फिर हो - हो कर हॅंसते हुए बोला ....यहॉं सीना का माप लिया जाता है जवान  पेट का नहीं और सच तो यह हैA यंगमेन आज की दुनिया में कम से कम अपना पेट हो भी तो उन्हें मापा जाय आज तो हरेक इन्सान का पेट टुकड़ो  - टुकड़ो में बट कर बिखर चुका है ....उन्हें हम कहॉं ढूढते फिरें.....उन्हें कहॉं कहॉं खोज कर मापा जाय, युवक हक्का -बक्का सा ऑफिसर को देखता रहा जो अब दूसरे जवान के सीने पर टेप रख रहा था!


( अतिरिक्त-अंक ५ अगस्त १९७२)

¼ कात्यायनी'(लखनऊ, संपादक:अश्विनी कुमार द्विवेदी) के जून 1972 अंक में छपी थी। ½

Wednesday, March 28, 2012

तीन बदंर


आठवे दशक की लघुकथाए - 2





तीन बदंर

किशोर काबरा

                रात के अधंरे में गॉंधीजी के तीन बंदरों से मैंने कहा- देखो इस समय यहॉं देखने वाला कोई नहीं है और मेरी आत्मा अभी तक सोई नहीं है। मैं सोचता हूँ, तुम सब एक काम कर लो। युगों से एक ही मुद्रा में बैठे हो , अत: हाथ पैर फैलाकर थोड़ा - बहुत आराम करा लो।
वे जब नहीं माने तो मैं उनके पास गया। पर , सच कहता हूँ उन्हें देखकर मेरी सॉंस रूक गई।
अब एक बन्दर अंधा हो गया था !
और दूसरा बदंर अंधा और गूंगा हो गया था।
तीसरे को देखकर तो मेरा दुख और भी गहरा हो गया है। यह बेचारा दुख का मारा अंधा , गूंगा और बहरा हो गया है।

(गुफाओं से मैदान की ओर - 1974)


Thursday, March 8, 2012

चीख


चीख
सुदर्शी सौन्धी


मार्च की मस्त सुबह । चार बजे नामालूम सी धुंध । बादलों के पार से झांकता उजाला । उसने शाल कसकर अपने चारों तरफ लपेट लिया। पापा के कमरे की खिड़की खुल गयी है , थोडी ही देर बाद वे ओवरकोट पहनेंगे, फिर सिगार मुहॅं में दबाये सीढियों से नीचे उतर आयेंगे रोज की तरह वह मुस्करा देगी ठीक वैसे ही झुके -झुके जैसे अर्दली मुस्कराता है । क्या नहीं है उसके पास, एक आलीशान कोठी, दो दो इम्पाला , एक पापा की , एक उसकी । दो - दो टेलिविजन सेट, हिन्दी, पंजाबी अंग्रेजी, संस्कृत की सारी पुस्तकें सारे संदर्भ ग्रंथ .... । जरा घंटी दबाने पर नौकर हाजिर हो जाता है । पास ही पानी रखा हो तो भी वह खुद होकर तो पानी ले ही नहीं सकती। डनलप के गद्‌दों पर लेटे रहो या विलायती धुन पर घूमते रहो ... । या कामू काफ्‌का की किताबें पढते रहो ! एक सही अहसास । पूरी कालोनी में सबसे ऊंची और सबसे आलीशान कोठी है उसकी ... । होली है आज पर किसके साथ खेलें...पिछलें इक्कीस साल से यह दर्द उसे कुरेदता रहता है....किसी पडोसी बच्चे या समवयसा से गुलाल ही लगवा ले, पर पापा मानेंगे, उनकी नजर में तो सारे पडोसी बौने है , और पापा बौनों का साथ एक पल भी गवारा नहीं करते, उसे लगता है , वह चीख पडेगी वैसे ही , बेमतलब , फिजूल मे।

( अतिरिक्त-अंक ५ अगस्त १९७२)

Sunday, January 8, 2012

बैसाखियों के पैर


भगीरथ



वह अपनी टांगों के सहारे नहीं चलता था, क्योंकि उसकी महत्वाकाक्षाएं ऊँची थी क्योंकि वह चढ़ाइयाँ बड़ी तेजी में चढ़ना चाहता था , क्योंकि उसे अपनी टांगों पर भरोसा नहीं था क्योंकि वे मरियल और गठिया से पीड़ित थी ।

फिर भी , जिन दूसरी टांगों के सहारे चलता था , उन पर टरपेन्टाइन तेल की मालिश किया करता था ।उसके हाथ की माँसपेशियां खेता नाई की तरह मजबूत हो गई थी और शाम उनके टखने एवं ऊंगलियाँ चटखाया करती थीं ताकि विश्वास हो जाये कि कल भी ये टांगे उसका साथ देंगी । इतना कर चुकने के बावजूद उसका मन संशकित रहता , कक पता और बोलते वक्त भाषा उससे आगे निकल जाती । और वह फिर आशवस्त हो जाता कि एक वाक्य में चार बार हिनहिनाने से उसकी वैसाखियों में सुखद हरकत होने लगती है । आखिर उसे अपनी सारी दूरियाँ इन्हीं बैसाखियों से तय करनी हैं ।

वह इस बात को जानता है कि उसके सम्मान में उठे हाथ उसके लिए नहीं है पर वह यह भी जानता है कि यहाँ के लोग इसी भाषा को समझते हैं। निहायत दरबारी ।

वह जानता है जो सेनापति सेना की कमान सम्भाले है , उनसे सुरक्षा का वचन लेना है और उन्हीं की सहायता से अपने प्रतिद्धन्द्धी को पछाड़ना है ।

वह जानता है कि वह स्वयं अपने में कुछ नहीं है , और उसकी बैसाखियों को छीन लो तो वह धड़ाम से धूल में लोट जायेगा पर वह अपनी बैसाखियों को दूसरे के हाथों में नहीं जाने देगा ।

आज वह किले की हर बुर्ज पर मौजूद है । भव्य महल और मयूर सिहांसन की सुरक्षा के लिए बना है यह किला , जिसमें अब उसके लिए ‘श्री 1008 महाराजाधिराज’ की गुहार लगानेवाले मौजूद हैं ।

वह अपनी सफलता के जश्न का केक काटते हुए इस बात का ऐलान करता है कि उसके पैर निकल आए हैं - मजबूत और बलिष्ठ ।

Thursday, November 17, 2011

साथ होकर भी दूर


संजय कुंदन॥



भारतीय दांपत्य जीवन की एक विचित्र बात यह है कि यहां पति-पत्नी में संवाद बड़ा कम होता है। गांवों में तो कुछ ऐसे पुराने जोड़े भी मिल सकते हैं, जिनमें जीवन भर एक-दो जरूरी वाक्यों को छोड़कर कभी बात ही नहीं हुई। हालांकि इस बीच उनके बच्चे भी हुए। वे बड़े भी हो गए। उनकी शादी भी हो गई। ऐसा नहीं है कि पति-पत्नी में कोई तनाव या झगड़ा रहा। हो सकता है उनके भीतर एक-दूसरे के प्रति बड़ा प्रेम भी हो। लेकिन संवाद न के बराबर रहा है। ऐसे कुछ लोग शहरों में भी मिल सकते हैं। दरअसल सामंती मूल्यों वाले पारिवारिक ढांचे में स्त्री-पुरुष का संबंध कभी सहज नहीं रहा। स्त्री की दोयम दर्जे की स्थिति ही उसकी बुनियाद रही है। इसलिए स्त्री-पुरुष एक साथ रहते हुए भी दो अलग समानांतर दुनिया में जीते रहे हैं।

चहारदीवारी में जिंदगी

जिन संयुक्त परिवारों की महिमा का खूब बखान होता है, वहां स्त्रियों के लिए कभी कोई निजी स्पेस रहा ही नहीं। हालांकि वहां पुरुषों के लिए भी पर्याप्त पर्सनल स्पेस नहीं रहा, लेकिन उनके लिए बाहर की दुनिया खुली थी, जहां वे अपनी मर्जी से कुछ भी करने के लिए स्वतंत्र थे। लेकिन उनकी स्त्रियों को तो चहारदीवारी ही नसीब हुई। चूंकि घर सामूहिक रूप से चलाया जाता था इसलिए किसी की कोई निजी जिम्मेवारी नहीं थी। बच्चों की देखभाल की चिंता करने की भी कोई जरूरत नहीं थी क्योंकि यह कार्य भी सामूहिक रूप से हो रहा था। ऐसे में शारीरिक जरूरत के अलावा अपनी पत्नी के पास जाने का कोई मतलब ही मर्दों के लिए नहीं था। अगर कोई पुरुष इस दायरे से बाहर निकलकर अपनी पत्नी से जुड़ने और अपने सुख-दुख साझा करने की कोशिश करता, तो वह उपहास का पात्र बनता था। हमारे उत्तर भारतीय समाज में पुरुषों के लिए 'घरघुसरा', 'जोरू का गुलाम' और 'मउगा' जैसे संबोधन संयुक्त परिवार के मूल्यों के तहत ही बने होंगे। चूंकि समाज स्त्री को बच्चा पैदा करने वाली मशीन या घर की सेवा करने वाले रोबोट की तरह देखता था, इसलिए वह पचा ही नहीं पाता था कि कोई आदमी अपनी पत्नी से भला क्यों घुल-मिल रहा है।

ऐसे परिवारों में स्त्री - पुरुष संबंध में खासा पाखंड रहा है। एक परिवार में पांच भाई हैं। पांचों शादीशुदा हैं लेकिन वे रात के अंधेरे में सबकी नजर बचाकर पत्नी से मिलने जा रहे हैं , जैसे यह कोई अपराध हो। मंुह अंधेरे ही उन्हें बाहर निकल आना होता था। यही नहीं , कोई आदमी सबके सामने अपने बच्चे को प्यार तक नहीं कर सकता था। हम इस बात पर गर्व करते हैं कि भारत में वैवाहिक संबंध अटूट रहा है , उसमें पश्चिम की तरह कभी बिखराव नहीं आया। लेकिन गौर करने की बात है कि भारतीय दांपत्य कुल मिलाकर स्त्री के एकतरफा समझौते पर टिका हुआ है। जब एक पक्ष को कुछ बोलने की , अपनी अपेक्षाएं रखने की आजादी ही न हो तो तकरार की गुंजाइश क्यों होगी। वैसे जॉइंट फैमिली के खत्म होने के बावजूद संवादहीनता की समस्या खत्म नहीं हुई है। एकदम नई पीढ़ी को छोड़ दें तो आज शहरों में जो पढ़े - लिखे जोड़े हैं , उनमें भी डॉयलॉग की कमोबेश वही कमी बरकरार है। लेकिन इसका कारण समयाभाव नहीं है।



शैक्षिक और सामाजिक विकास के बावजूद पुरुषवादी मानसिकता पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। आज भी मर्द स्त्री को बराबरी का दर्जा देने के लिए मन से तैयार नहीं हैं। अब जैसे कई लोग यह कहते मिल जाएंगे कि ' पत्नी को हर बात नहीं बतानी चाहिए। ' शायद इसी आग्रह के कारण कई लोग दफ्तर की बात घर में नहीं करते। नौकरी हमारी जिंदगी का एक अहम हिस्सा है। कोई व्यक्ति इसके तनावों , द्वंद्वों को पत्नी से शेयर नहीं करेगा तो किससे करेगा ? हो सकता है आपसी बातचीत में कोई रास्ता निकले। लेकिन लोग ऐसा नहीं करते क्योंकि वे पत्नी को इस लायक मानते ही नहीं कि उससे मिलकर कोई हल निकाला जा सके। पुरुष सोचता है कि उसकी पत्नी खाना बनाए , घर सजाए और बच्चों की देखभाल करे , भले ही वह नौकरीपेशा क्यों न हो।



वह दोस्त क्यों नहीं

कई विवाहित लोग एक महिला मित्र की तलाश में लगे रहते हैं। इसके पीछे उनकी दलील यह होती है कि चूंकि उनकी पत्नी बहुत सी चीजों में दिलचस्पी ही नहीं लेती इसलिए उन्हें एक ऐसे दोस्त की जरूरत है कि जिससे वे मन की बात कह सकें। दिक्कत यह है कि पुरुष अपनी पत्नी को दोस्त का दर्जा देने को तैयार ही नहीं है। वह मानता है पत्नी अलग होती है , दोस्त अलग और प्रेमिका अलग। लेकिन अब स्त्री पहले की तरह मजबूर नहीं रही इसलिए वह चुप रहने के बजाय आवाज उठाती है। इस कारण दांपत्य जीवन में तनाव आने लगा है। अगर पत्नी भी दोस्त बन सके तो शायद वैवाहिक संबंधों में मजबूती आएगी।





Tuesday, October 11, 2011

अबीज

        











  पूरन  मुदगल


अजनबी ने गेहूं की एक पकी बाल तोड़ी।

''बहुत मोटी है यह बाल।'' उसने किसान से कहा । किसान ने बाल से कुछ दाने निकालकर अपने हाथ पर रखे    और बेमन से कहा, ''देखो''

देखते -देखते सब दाने दो - दो     टुकड़ो      में खिल गए। अजनबी हैरान हुआ, पूछा, ''ये दाने साबुत क्यों नहीं रहे ? ''

''यह नए बीज की फसल है । पिछले पांच सालों से हम यही खा रहे हैं।चार -पांच गुना झाड है इसका, लेकिन....''

किसान के चेहरे पर अनजाने में किसी गलत दस्तावेज पर किए दस्तखत जैसी लिखाई उभरी।

''क्या ....?
''यह बीज विदेशी हैं।मेरे बेटे इसे बाहर से लाए है। इसकी फसल तो अच्छी होती है , पर बीज के काम नहीं आती।''

क्यों ?''
''देखा नहीं तुमने ! बाल से निकलते ही हरेक दाने के दो   टुकड़े  हो जाते हैं। मेरे लडके निक्का और अमली चोरी छिपे ले आते हैं यह बींज''  
''लेकिन जिस फसल से बीज न बने , वो किस  काम की !किसी  साल  विदेश से बीज ने आया तो......? अजनबी ने वही बात कह दी जो किसान की परेशानी की बायस बनी हुई थी। लोग फसल काटने में व्यस्त थे। निकट ही हवा में तैर रही ढोल की आवाज किसान को अप्रिय लगी। वह अपनी हथेली पर रखे गेंहू के    टुकड़ा  -टुकड़ा  दानों को देखने लगा, जिनका धरती से रिश्ता  टूट गया था।

Friday, September 9, 2011

मानसिक व्यभिचार

 अन्तरा करवड़े



अपने अकाउंट से लॉग आउट होते हुए रीटा पसीना पसीना होने लगी। कौन हो सकता है ये परफेक्ट गाय? उसकी कुछ बातों पर ही¸ आवाज के अंदाज पर ही उसे अपना मान बैठा है। कुछ क्षणों के लिये उसके मस्तिष्क में नीली सपनीली आँखों वाला एक गोरा चिट्‌टा¸ गठीला युवक अलग - अलग कोणों से आता - जाता रहा। अनजाने ही रीटा के चेहरे पर मुस्कान आती रही।

और फिर अचानक वो परफेक्ट गाय¸ अभिषेक में बदल गया। अभिषेक¸ उसका मंगेतर!

अपने मन में विचारों का तूफान लिये वह घर पहुँची। अपने कमरे की शरण ली। अभिषेक¸ उसका मंगेतर¸ दूसरे शहर में नौकरी करता है। ऑफिस में काम करते वक्त ऑनलाईन रहता है। रीटा उसी से वॉईस चैट करने के लिये कैफे गई थी। उसके लिये अभिषेक ने मैंसेज छोड़ रखा था। वह एक घण्टे के लिये मीटींग में व्यस्त था और ऑनलाईन होते हुए भी उससे संपर्क नहीं कर सकता था।

तभी रीटा के मैंसेंजर पर एक अनजान संदेश उभरा।

"हैलो स्वीटी!"

यही था परफेक्ट गाय! रीटा का लॉगिन नेम था स्वीट सॅन्योरीटा।और फिर थोड़ी बहुत पूछ ताछ के बाद उसने रीटा को वॉईस चैट के लिये राजी कर लिया। उसकी बातचीत¸ आवाज¸ लहजे की तारीफें करता हुआ वह दस मिनट में ही दिल¸ ईश्क¸ प्यार¸ मुहब्बत तक पहुँचते हुए उसे प्रेम प्रस्ताव देने पर उतर आया।

बिना देखे सोचे उत्पन्न हुए इस प्रेमी के लिये रीटा तैयार नहीं थी। कई बार उसने लॉगआऊट होने का सोचा लेकिन सहेली मोना क वाक्य याद आने लगे। "यदि कोई पीछे पड़ा ही है तो थोड़े बहुत मजे ले लेने में क्या हर्ज है?" और रीटा बह चली थी। उस वक्त उसके मन से अभिषेक जाने कहाँ गायब हो गया था। लेकिन जब यह परफेक्ट गाय उसका शहर¸ नाम¸ पता¸ फोन नंबर पूछकर घर आने की जिद पर अड़ गया तब रीटा को होश आया। ये क्या कर रही थी वो?

किसी तरीके से बहाने बाजी करते हुए उससे छुटकारा पाया और अब अपने कमरे में बुत सी बनी बैठी थी।


उसी समय घर के सामने से जय जयकार की आवाजों के साथ ही एक स्वामीजी की पालकी निकालने लगी। रीटा ने ध्यान से देखा। ये वही स्वामीजी थे जो कहने को तो ब्रम्हचारी थे लेकिन सदा औरतों की ओर ही ध्यान लगाए रखते। कॉलेज के दिनों में इनके कितने ही किस्से मशहूर थे।

इन्हीं किस्सों को सुनते सुनाते एक दिन रीटा की माँ के मुँह से निकाला था¸ "सब कुछ मन¸ वचन¸ कर्म से हो तो ठीक है। फिर चाहे ब्रम्हचर्य हो या गृहस्थी।"

रीटा का मन उसे अपराधी की भाँति कटघरे में खड़ा कर रहा था। वो स्वयं क्या कर रही थी?

भले ही अभिषेक को कभी कुछ मालूम नहीं होगा... लेकिन मन में बात तो आई ना?

दूसरे ही दिन उसने अभिषेक को मेल किया। "मैंने अपना लॉगिन नेम "स्वीटसैन्योरीटा" से बदलकर "रीटाअभिषेक" कर लिया है।"


गद्यकोश से साभार

Monday, August 22, 2011

महानगर की डायरी



हमारा प्यारा सा छोटा¸ सुंदर परिवार है। यानी मेरे पति¸ चार साल का बेटा अभि और मैं। और हाँ अभि के दादा भी हमारे ही साथ रहते है। मैं थोड़ा गलत बोल गई। इतना भी छोटा परिवार नहीं है हमारा। मेरे पति तो दिन भर काम में व्यस्त रहते है। वो एक्सपोर्ट का बिजनेस है ना हमारा। कस्टम वालों से लगाकर टैक्स अथॉरिटीज सभी के साथ अच्छी सेटिंग है इनकी। मैं अपनी सहेलियों के साथ जिम¸ किटी और क्लब की एक्टीविटीज में ही इतना थक जाती हूँ कि हफ्ते में दो तीन बार तो हम बाहर ही खा लेते है।


अभि के दादाजी को नहीं भाता ये सब। अब बाहर जाएँगे तो साढे ग्यारह बारह से पहले लौटेंगे क्या? उनके लिये पॅक्ड डिनर ले आते है। कभी खाते है तो कभी वैसा ही पड़ा रहता है।

बदादा को मेरा घर में किटी करना¸ टीवी पर सीरियल देखना¸ कॉकटेल पार्टीज में जाना और यहाँ तक कि नॉन वेज और ड्रिंक्स तक लेना भी पसंद नहीं है। हद होती है दकियानूसी सोच की भी । आखिर कोई किसी की लाईफस्टईल में¸ जीने के तरीके पर तो पेटेंट नहीं रख सकता न?

आप ही बताईये जब वे घर में जोर जोर से मंत्रा बोलकर हमारी मॉर्निंग स्लीप में दखल देते थे¸ धूप जलाकर मेरे सारे इम्पोर्टेड कर्टन्स खराब कर दिये उन्होने¸ अभि के बर्थडे पर उसे गंदे आश्रम के बच्चों के पास ले जाने की जिद करने लगे थे¸ अपनी पत्नी की धरोहर के नाम पर तीन पेटियों की जगह घेरे हुए रहते है तब हम उन्हें कुछ भी कहते है क्या?



कई बार मेरा दिमाग खराब होता है लेकिन अभि के पापा सब कुछ समझते है। वे तो दादा से ज्यादा बातें भी नहीं करते। उन्होने मुझे बता रखा है कि मरते समय उनकी माँ को उन्होने वचन दिया है इसलिये दादा को वृद्धाश्रम में नहीं रख सकते। अब आखिर मैं भी तो भारतीय नारी हूँ। कुछ तो ख्याल रखना ही पड़ता है ना पति की इमोशन्स का।

लेकिन दादा ने उस दिन तो हद ही कर दी थी। दिवाली पर मैं नौकरानियों के लिये कुछ सामान लाने बाजार ही नहीं जा पाई थी। सोचा कि अपनी सासूजी की पुरानी धुरानी सड़ियों के बंड़ल में से चार पाँच निकाल कर उन्हें दे भी दूँगी तो काम चल जाएगा। दादा टहलने गये थे और मैंने अपना काम कर ड़ाला था। लेकिन अभि! आखिर बच्चा ही तो ठहरा¸ सो इनोसेंट ही इज। उसने दादा को बता ही दिया कि मैंने दादी की साड़िया रमा¸ ऊमा¸ पारो और सविता को दी है। फिर क्या था¸ वे मुझसे¸ रियली मुझसे ऊँची आवाज में बातें करने लगे थे।

पता नहीं कौन सी पास्ट हिस्ट्री बताते रहे थे। पुराना वैभव और क्या - क्या। तब मैंने उन्हें अभि के पापा वाली बात बता ही दी थी कि

"आपकी धर्मपत्नी की ही बदौलत आपको दाना - पानी मिल रहा है यहाँ। नहीं तो...।" और पता नहीं क्यों वे छाती मलते हुए से हमेशा की तरह नाटक करते बैठ गये थे।


और सच बताऊँ अभि ने ये भी सुन लिया और तो और मेरी सारी एक्सप्रेशन्स को वह बखूबी इमीटेट करने लगा है आजकल। उसे ना मेरा वर्ड "धर्मपत्नी" बड़ा अच्छा लगा था। कहता था "ममा आप तो बड़ा ही अच्छा मदर टंग बोलती है।" अभि के पापा का मूड थोड़ा सा ऑफ जरूर हुआ था लेकिन जब अभि ने मेरा डायलॉग वैसे ही एक्सप्रेशन्स के साथ बार - बार दोहराया तब ही ऑल्सो एन्जॉइड लाईक एनीथिंग।

फिर तो जब भी दादा खाना खाने बैठते¸ अभि उनके आगे पीछे दौड़ता हुआ यही डायलॉग बोलता रहता। लेकिन कितने रूड व्यक्ति थे वो। मैंने तो सुना है और देखा भी है कि दादा दादी को अपने नाती पोतों से कितना प्यार होता है लेकिन यहाँ दादा तो बस एक्सप्रेशनलेस होकर बैठे रहते थे।

साल का ये दिन मुझे बड़ा बोरिंग लगता है यू नो। मेरी सासू माँ की बरसी। अब आप ही सोचिये कि जिस लेड़ी को मैं ठीक से जानती भी नहीं उसके लिये ये सारा कुछ करने की एक्सपॅक्टेशन मुझसे क्यों की जाती है? पता नहीं कौन कौन से बूढ़े और बोरिंग व्यक्ति आ जाते है इस दिन। और इतना खाते है कि पूछिये मत। और तो और सभी गँवारों के जैसे नीचे बैठकर खाते है। और हमारे दादा! उनकी तो पूछिये मत। प्ताा नहीं हमारे बारे में इन सभी लोगों को क्या क्या बताते रहते है।

इस सब चक्कर में अभि के पापा को घर पर रहना होता है और उनका बिजनेस लॉस होता है सो अलग। लेकिन कौन इन्हें समझाए। देखिये कैसे बैठे है सभी। छी! मुझे तो उनके सामने जाने की इच्छा भी नहीं होती। उसपर आज साड़ी पहननी पड़ती है सो अलग। अभि को तो मैं उसकी नानी के यहाँ भेज देती हूँ हमेशा लेकिन इस बार जिद करके रूका है वो यहाँ। मैं ध्यान रखती हूँ कि वो इनमें से किसी भी आऊट ऑफ डेट पीस के पास न चला जाए। ऐसा लग रहा है कि कब ये लोग एक बार के जाएँ यहाँ से और मैं साड़ी की जगह ढीली नाईटी पहनू।

लेकिन उस दिन आराम तो था ही नहीं जैसे किस्मत में। सबके साथ दादा खाने बैठे थे। वही हमेशा की आदत! सासू माँ के "चरित्र" का गुणगान! वे खाना अच्छा बनाती थी¸ वे मेहमाननवाजी अच्छी करती थी¸ उनके जाने के बाद तो जैसे घर में जान ही नहीं रही आदी आदी। और जानते है उतने में क्या हुआ? अभि वहाँ पहुंचा और उसने अपना वही डायलॉग सबके बीच में दादा पर मारा। उसका प्रेजेन्स ऑफ माईंड भी लाजवाब है।

"आपकी धर्मपत्नी की ही बदौलत आपको दाना - पानी मिल रहा है यहाँ। नहीं तो...।"

लेकिन दादा हमेशा की तरह तटस्थ नहीं बैठे रहे। वे गिर पड़े थे अपनी जगह पर ही।


खैर... हमें डॉक्टर ने बताया कि किसी शॉक के कारण ही हार्ट फेल हुआ है। अब जो आदमी इस दुनिया में ही नहीं रहा उसके लिये कोई कहाँ रूकता है भला। उन्होने उनका अंतिम संस्कार काशी में करवाने का लिखा था। हमने रमाबाई और उसके पति को टिकट निकालकर दे दिया था संस्कार कर आने के लिये। फिर हम प्लांड़ केरला ट्रिप पर गये। कितना फ्रस्ट्रेशन आया था अभि के पापा को। उससे बाहर निकलना भी तो जरूरी था।

अभि अपने साथ दादा का पुराना फोटो भी लाया था। एक दिन मैं और उसके पापा रिसोर्ट के लॉन में कॉफी पी रहे थे। उनका मूड थोड़ा ऑफ था। अभि भी कमाल का लड़का है हाँ। दादा का फोटो हमारे सामने रखा और कहने लगा¸


"आपकी धर्मपत्नी की ही बदौलत आपको दाना - पानी मिल रहा है यहाँ। नहीं तो...।"


हमारा हँसते - हँसते बुरा हाल था...

गद्यकोश से साभार


Thursday, August 11, 2011

डा. उमेश महादोषी की लघुकथा

 






भू-मण्डल की यात्रा


हरीचन्द जी ने जैसे-तैसे साल भर से बन्द पड़े मौके-बेमौके काम आ जाने वाले छोटे से पैत्रिक घर का दरवाजा खोला। एक कोने में पड़े पुराने झाड़ू से जाले और फर्श को किसी तरह थोड़ा-बहुत साफ किया, पुराने सन्दूक से पुरानी सी चादर ढूँढ़कर फर्श पर बिछायी, और लेट गये। आज शरीर ही नहीं, उनका मन भी पूरी तरह टूटा हुआ था। नींद आने का सवाल ही कहां था, किसी तरह बेचैनी को सीने में दबाकर आँखे मूँद लीं। एक-एक कर जिन्दगी की किताब के पन्ने खुद-ब-खुद पलटते चले गये...।

बचपन में ही माता-पिता का साया सिर से उठ जाने के बाद कितनी मेहनत करके पाई-पाई जोड़कर उन्होंने वह सुन्दर-सा घर बनाया था, एक दुकान भी कस्बे के मेन बाजार में खरीदकर अपना कारोबार जमाया था। बेटे अर्जुन को भी बी.टेक. की शिक्षा दिलवा ही दी थी। ग्रहस्थी की पटरी लाइन पर आने के साथ थोड़े सुख-सुकून के दिन आये ही थे, कि पत्नी उर्मिला दुनियां से विदा हो गई। उसके जाते ही जैसे उनकी दुनियां उजड़ने लगी। छः माह भी न हुए थे कि अर्जुन ने लन्दन से एम.एस. करने की जिद ठान ली थी। बहुत समझाया था उसे- ‘बेटा तू इतनी दूर परदेश में होगा, जरूरत पड़ने पर किसे तू याद करेगा और किसे मैं। यहां अपने देश में कम से कम एक-दूसरे का सहारा तो है। फिर आर्थिक स्थिति भी ऐसी नहीं है कि विदेश का खर्चा वहन किया जा सके....। पर बेटे के तर्को के आगे वह विवश हो गये थे- ‘पापा कैसी बातें करते हो आप! आज जितनी देर हमें अपने प्रदेश की राजधानी पहुँचने में लगती है, उससे कम समय में लन्दन पहुँचा जा सकता है। आज सारी दुनियां सिमिटकर छोटा सा गांव बन गई है। रोज हम आपस में टेलीफोन पर बात कर लिया करेंगे। जरूरत पड़ने पर कितनी देर लगेगी यहां आने में। रही बात पैसों की, तो आपके अकेले के रहने के लिए पुराना घर काफी है। इस नये घर को बेच देते हैं, अच्छी खासी रकम की व्यवस्था हो जायेगी। फिर मैं वहां कोई पार्ट टाइम जॉब भी कर लूँगा। दो साल के बाद तो मुझे अच्छा और स्थाई जॉब मिल ही जायेगा, तब आप भी वहीं हमारे साथ रहेंगे। क्या जरूरत रहेगी इस छोटी-मोटी दुकानदारी की? आप तो पूरे भू-मण्डल की यात्रा करना....’। और हुआ भी वही, मकान बेचा और बेटे ने सीधे लन्दन का टिकिट.....।

पूरे दो साल बाद एक दिन अचानक अर्जुन भारत यानी पापा के पास आया। ‘पापा मुझे लन्दन में ही एक बड़ी कम्पनी में बहुत अच्छी स्थाई नौकरी मिल गई है। आपको भी मेरे साथ ही चलना होगा। वहां मैंने एक फ्लैट भी देख लिया है, उसके लिए थोड़े पैसों की जरूरत भी है। अब आपको दुकानदारी की जरूरत तो रही नहीं और यहाँ इण्डिया में हमें आना भी नहीं है, इसलिए दुकान और पुराना घर भी बेच दो। इससे फ्लैट के लिए जरूरी पैसों की व्यवस्था हो जायेगी। फ्लैट रूबिया को बेहद पसन्द आया है, आपको भी अच्छा लगेगा.....।’

झटका ता लगा था, पर जैसे-तैसे अपने-आपको सम्हालकर पूछा था- ‘ये रूबिया कौन है, कहां की रहने वाली है, क्या करती है और तेरा क्या रिश्ता है उससे?’

‘पापा, वो मेरी कम्पनी में ही जॉब करती है। रहने वाली पाकिस्तान की है। हम दोनों एक दूसरे को बहुत पसन्द करते हैं, आपको भी अच्छी लगेगी। आपके वहाँ चलते ही हम शादी कर लंेगे......।’ तब भी कितना समझाया था- ‘बेटा तू अपनी नौकरी कर और मुझे यहीं मेरे वतन में रहने दे। फ्लैट साल-दो साल बाद भी तू ले सकता है। जहाँ तक बात बेटा एक पाकिस्तानी लड़की से शादी करने की है, सो यह ठीक नहीं रहेगा। अलग-अलग धर्मों का होने पर एक बार निर्वाह हो भी जाये, पर साथ में तुम दोनों का सम्बन्ध दो अलग-अलग ऐसे देशों से है, जिनकी पारस्परिक विरोध की जड़ें बहुत गहरी हैं। और दोनों देशों के निवासियों की अपने-अपने देश के साथ आस्थाएं और भावनाएं भी उतनी ही गहरी हैं। इसलिए तुम दोनों और दोनों के पारिवारिक जनों के बीच ऐसे बहुत सारे मौके आ सकते हैं, जब जाने-अनजाने इन आस्थाओं और भावनाओं के चलते एक-दूसरे को समझना और सहन कर पाना असम्भव हो जायेगा। इसलिए मेरी सलाह यही है कि एक-दूसरे के प्रति भावनात्मक लगाव को सिर्फ दोस्ती तक ही रहने दो....।’

पर अर्जुन कहाँ सुनने वाला था। ‘पापा, फिर वहीं घिसी-पिटी बातें लेकर बैठ गये। दुनियां बहुत बदल गई है, आज हम देशों की सीमाओं से बहुत ऊपर उठ चुके हैं। न रूबिया पाकिस्तान की बन्धुआ है और न मैं हिन्दुस्तान का। पापा आप भी इन संकुचित सीमाओं से ऊपर उठ जाओ। हमारा देश पूरी दुनियां है........।’ लम्बा सा भाषण दे डाला था, अर्जुन ने। हरीचन्द जी की एक न चली, किसी प्रकार बेटे को समझा-बुझा कर इस पैत्रिक मकान को न बेचने पर ही राजी कर पाये थे। दुकान पड़ोसी लाला भीम सिंह जी को बेची और फिर वही हुआ, जो बेटे ने चाहा। एक साल भी नहीं बीता, कि परसों वो निष्ठुर दिन भी हकीकत बनकर सामने आ गया, जिसकी आशंका वह व्यक्त कर चुके थे।

अर्जुन के दोस्त वरुण के पापा हरेन्द्र जी घर आये थे उनसे मिलने। हमवतन और हमउम्र से मिलकर बातों में दोनों भूल ही गये कि वे लन्दन मंे बैठे हैं। उसी दिन दुर्भाग्य से आतंकियो ने मुम्बई पर हमला कर दिया। इस हमले की खबर टी.वी. पर देखी-सुनी तो चर्चा का बिषय बदल गया। चर्चा के बीच में पाकिस्तान और उसकी पाकिस्तानियत कब आ गई, पता ही नहीं चला। यह भी याद नहीं रहा कि घर में पाकिस्तानी बहू बैठी है। हरेन्द्र जी के घर में रहते हुए तो कुछ नहीं हुआ, पर उनके जाते ही क्या कुछ नहीं हुआ....! ‘मेरे घर में रहकर मेरे ही ऊपर अविश्वास करते हो? यदि विश्वास नहीं था तो शादी क्यों की थी बेटे के संग? बुड्ढे अब मैं तुझे एक दिन भी नहीं रुकने दूँगी यहाँ.....।‘ तमाम मिन्नतों के बावजूद बहू ने अर्जुन के दो दिन बाद आफीशियल टूर से लौटने तक भी घर में नहीं रूकने दिया। एजेन्सी से एयर टिकिट मंगाकर हवाई जहाज में बैठाते हुए उसने एक बार भी नहीं सोचा कि ये इस उम्र में भारत जाकर भी किसके सहारे और कैसे अपना जीवन बसर करेगा.......! सोचते और आँसू बहाते हरीचन्द जी की आँख कब लग गई, पता ही नहीं चला। और जब आँख खुली तब अगले दिन का सूरज भी सिर चढ़ रहा था।

थोड़ी देर के लिए वह फिर उन्हीं विचारों में खोने लगे। पर अचानक उन्होंने अपने आँसू पोंछ डाले, ‘बहुत मान ली बेटे की जिद। अब और नहीं....! जीविका का अपना कोई साधन नहीं है तो क्या, लाला भीम सिंह जी से मिलूँगा, भले आदमी हैं, अपनी दुकान पर सेल्स मेन तो रख ही लेंगे।....न...नहीं, जिस दुकान का मालिक था, उस पर नौकर.... अरे! काहे की शर्मिन्दगी.... भू-मण्डल की यात्रा की इतनी कीमत तो......!’

Thursday, July 21, 2011

रघुनाथ मिश्र की चुनी हुई गजलें



रघुनाथ मिश्र को गीत
 चान्दनी हैदराबाद  द्वारा
                                 निराला  सम्मान                                        

 बधाईया




                                                                                      
                 1                                                                                               रघुनाथ मिश्र  



वक्त से पैगाम लो



सच असच पहिचान लो

थक चुका मस्तिष्क यदि

सिर्फ दिल से काम लो

बच सके यदि जन हजारो

अपने सर इल्जाम लो

मत मरो औलाद बिन

गोद में अवाम लो


2


शब्द मूल्यहीन हो गया

शिल्प कथ्यहीन हो गया

कल तलक था जो नया -नया

आज वो प्राचीन हो गया

हद से बढ़ गई गिरावटे

आसमां जमीन हो

क्या तरक्कियों का दौर है

आदमी मशीन् हो गया


आम आदमी डरा डरा

डर भी यह युगीन हो गया

हर किसी की जान पै पड ी,

कुछ को जग हसीन हो गया।

Wednesday, July 6, 2011

दर्पण के अक्स

दर्पण के अक्स
आभासिंह

पत्नी अपने बच्चों में गुम हो गयी और बच्चे अपने परिवारों में । रह गया वह । दिनभर की जी तोड़ मेहनत से व्यवसाय सम्भालता । शामें रातें सूनी हो गयी । अकेलेपन की बेबसी को दूर करेन के लिए उसने कम्प्यूटर की शरण ली। 'इन्टरनेट' पर 'चैटिंग'' का चस्का लगते भला क्या देर लगती । नये -नये अछूते संसार में विचरण करता वह अति व्यस्त हो गया । हर पन्द्रहवें बीसवें दिन एक नई लड की से बातचीत करना। अंतरगता के दबे - छिपे कोनों तक पहुंच बनाना। अपने भीतर उछलती उत्तेजना को महसूस करना। बेवकूफ बना पाने की अपनी कुद्गालता पर कुटिलता से मुस्कुराना ।

इस बार भी वह इंटरनेट बंद करके लिप्सा से मुस्कुराया। सोलह साल की लड की की लहकती आवाज में नरम सा प्रेमालाप उसके कानों में रस घोल रहा था। उसने ऐनक उतारी । खुरदरे हाथों से माथा सहलाया और खुमारी में डूबा - डूबा बिस्तर में जा धंसा।

उधर भी उस सोलह बरस की लडकी ने इंटरनेट बंद किया। ऐनक उतार कर मेज पर रख दी। लहकती आवाज में गुनगुनाना शुरू कर दिया । रैक से झुर्रियॉं मिटाने की क्रीम को हल्के हाथों चहरे पर लगाने लगी । खिचडी बालों की उलझी लटों को उंगलियों से सुलझाया । बेवकूफ बना पाने की अपनी कुशलता पर मंद -मंद मुस्कायी और खुमारी में डूबी-डूबी बिस्तर में जा धंसी।

Monday, May 30, 2011

महेन्द्र नेह की कविताए

            नया विहान



नदियॉं कहीं भी बहती हो


दरख्त कहीं भी खड़े हों

शब्द किसी भी भाषा के हों

कीमतें सभी की अंकित हो चुकी हैं

वैब साइट पर

कीमतें तय कर दी गई हैं

बशर्ते कीमतों का औचित्य

समय रहते समझा जा सके

और अपनी -अपनी कीमत पर

बिना किसी ना नुक्कार के सहमति के

अँगूठे लगा दिए जाएं

कीमतों का नया विहान आ गया है।

सुनहरी विदाइयों , कारखानों, दफ्तरों, खेतों मे

सामूहिक हाराकीरी का

नया विहान आ गया है

अपनी भव्यता और दिव्यता के साथ दिपदिपाता

नए साजों के साथ थिरकने का

सुनहरी विदाइयों और सामूहिक हाराकीरी पर

जश्न मनाने का

सगे सबंधियों , भाइयों , दोस्तों

पडोंसियों और महबूब को मिटते

उजडते हुए देखने का

रंगीन पृष्ठों और

सूचना तंत्र की कौतुकी दुनिया में

डुबकियॉं लगाने का

नया विहान आ गया है

कीमतें सभी की अंकित हो चुकी है

वैब साइट पर।
 

सब कुछ ठीक-ठाक नहीं
सब कुछ ठीक ठाक नहीं

हर एक खत की शुरूआत

आखिर कब तक

उसी रिवायती तर्ज पर?

अपने ही आत्मीयों

परिजनों से

बरसों -बरस से

एक फरेब ?

''सब कुछ ठीक -ठाक है यहॉं''

''कुशलपूर्वक हैं सब''

''सब स्वस्थ व सानंद है यहॉं''

कब तक

दोहराए जाते रहेंगे

ये आप्त वाक्य?

लिखो कि

अब तक जो कुछ लिखा

सही नहीं था

लिखो कि

कर्ज के भीषण बोझ से

दबे हुए हो तुम

लिखो कि

तुम्हारे घर में

एक बेटी होती जा रही है जवान

और अब उसकी

सही उम्र को

समाज में छुपाना

नहीं रहा मुमकिन

लिखो कि

ऊपर से शांत दिखनेवाले

तुम्हारे घर में

हमेशा मचा रहता है -एक कोहराम

लिखो कि

लाख कोशिशों के बावजूद

बेरोजगारी की आग में

झुलस रहा है तुम्हारा जवान बेटा

लिखो कि

वह देर रात लौटता है घर

लिखो कि तुम्हारे पूरे परिवार की

नींद गायब हे लंबे समय से

लिखो कि

लाइलाज बीमारियों से

घिरता जा रहा है

तुम्हारा समूचा परिवेश

लिखो कि

तुम्हारा स्वयं का काम भी

नहीं रहा सुरक्षित

लिखो कि

सब कुछ ठीक -ठाक नहीं है

लिखो कि सब कुशलपूर्वक और

सानंद नहीं है।