Monday, June 30, 2014

बिन तले के जूते

बिन तले के जूते

सुखबीर विश्वकर्मा

हमेशा से यही होता था गांव में कभी कोई मौत होती या खुशी का मौका होता तो
उन्हें जरूर बुलाया जाता वह खुद न जाकर चमरौंधे जूतों का एक जोडा भेज देते
जो उनके शामिल होने का प्रतीक था

वे सैकडों बीघा जमीन के मालिक थे। गांव का एक हिस्सा उनकी जमीन जोत-बो कर
पलता था।उनकी किलेनुमा आलीशान हवेली में हर वक्त मोटे-तगडे नौकर मौजूद रहते।
भला किसमें हिम्मत थी कि उनकी हरकत के खिलाफ़ मुंह खोल सकता।

अचानक एक दिन उनकी मां मर गई।परम्परा के मुताबिक गांव में खबर पहुंचा दी गयी
कि हरेक घर से एक-एक आदमी को शवयात्रा में शामिल होना है। जबाब मिला आयेंगे

अर्थी बनकर तैयार हो गई लेकिन एक भी आदमी वहां नहीं पहुंचा । वे हैरान थे।
झल्लाकर वे नौकरों पर बरसने लगे।

तभी दो बैलगाडियां हवेली की तरफ़ आती दिखाई पडी । वे चादरों से ढकी थी । पास
आने पर उन्होंने गाडीवालों से पूछा,"लोग कहां है ? और ये क्या तमाशा है ?

गाडीवान बगैर कुछ कहे वापस लौट गये ।इधर उन्होंने आगे बढकर बैलग़ाडियों पर से
चादरें हटायी ।वह ठगे रह गये । ग़ाडियों में बिन तलों के वही जूते भरे थे जो उन्होंने
समय-समय पर गांव वालों के यहां भिजवाये थे ।

("तनीहुई मुट्ठियां" सम्पादक मधुदीप/ मधुकांत     1980)

Wednesday, May 21, 2014

बहू का सवाल

बहू का सवाल

बलराम


रम्मू काका काफ़ी रात गये घर लौटे तो काकी ने जरा तेज आवाज पूछा---कहां च्लेगे रहन तुमका घर केरि तनकब चिंता फिकिर नांइ रहित हय। कोट की जेब से हाथ
निकालते हुए रम्मू काका ने विलम्ब का कारण बताया।
--जरा ज्योतिषीजी के घर लग चलेगे रहन ।बहू के बारे मा।म पूछय का रहय
रम्मू काका क जबाब सुनकर सूरजमुखी के मानिंद काकी का चेहरा खिल उठा, आशा भरे स्वर में जिज्ञासा प्रकट की
---का बताओ हइन
चारपाई पर बैठते हुए रम्मू काका ने कम्पुआइन भाभी को भी अपने पास बुला लिया और धीरज से समझाते हुए बताया
----शादी के बाद आठ साल लग तुम्हारी कोखि पर शनिचर देवता क्यार असर रहो,ज्योतिषीजी बतावत रहेय। हवन पूजन
किराय कय उइ शनिचर देवता की शान्ति करि दयाहंय। तुम्हंया तब आठ सन्तानन क्यार जोगु हयऽगले मंगल का हवन पूजन होई
ज्योतिषीजी ते हम कहि आये हन ।रम्मु काका एक ही सांस में सारी बात कह गये।
कम्पुआइन भाभी और भइया चर दिन की छुट्टी पर कानपुर से गांव आये थे और सोमवार को उन्हें कानपुर पहुंच जाना था। रम्मू काका
की बात काटते हुए कम्पुआइन भाभी ने कहा।
--हमने बडे-बडे डाक्टरों से चेकाप करवाया है और मैं कभी भी मां नहीं बन सकूंगी।
कम्पुआइन भाभी का यह जबाब सुनकर रम्मू काका सकते में आगये और अपेक्षाकृत तेज आवाज में बोले---
तब्फिरि इसे साल बबुआ केरि दूसरि शादी करि देवे अवहिन ओखेरि उमर का हय तीसय बत्तीस बरसक्यार तव हय
रम्मू काका की यह बात सुनते ही भाभी को क्रोध आ गया तो उन्होंने सही बात उगल दी।
---कमी मेरी कोख में नहीं ,आपके बबुआ के शरीर में है। मैं मां बन सकती हूं पर वे बाप नहीं बन सकते और बोलो।

Tuesday, February 18, 2014


अदला-बदली
मालती महावर
-क्या आप मुझे गोद लेना पसंद करेंगे ?
यह सुन्कर उस हरिजन व्यक्ति ने सिर से पैर तक उस नवयुवक को देखा,जिसका यह सवाल था।
-मुझे इसकी क्या आवश्यकता ?मेरा लडका भी तुम्हारी उमर का है
-नहीं,मेरा मतलब है आप मुझे सिर्फ़ सरकारी कागजों पर अपना लडका बना लें।मैं ब्राह्मण जाति का हूं,लेकिन मेरे पिता की पेंशन होने से मुझे आगे पढाने में असमर्थ है,आपका लडका बनने से मुझे हरिजन स्कालरशिप मिल जायेगी।
-मेरा लडका भी कालिज में ऊंची जाति के लडकों के साथ पढने के कारण हीन भावना से ग्रस्त हो गया है ,अक्सर अपने को कोसता है कि इस जाति में जन्म क्यों लिया! ऐसे जीवन से तो मर जाना अच्छा। तुम अपने पिताजी से
पूछकर आओ कि क्या वे मेरे लडके को गोद ले लेंगे?

Saturday, December 28, 2013

अपनी बार


अपनी बार
पृथ्वीराज अरोडा
उसने दुखः और रोष में अपनी बडी बहन को लिखा—दीदी ! दो लडकियों के बाद लडका होने की हमें बहुत खुशी
है,परन्तु जो फ़ेहरिस्त तुमने बना भेजी है,वह सामान कहां से लाएं ! घर की हालत तुमसे छिपी हुई नहीं है।
फिर रीति-रिवाज तो आदमी के अपने ही बनाए हुए हैं, वह उसे तोड भी तो सकता है!
दो वर्ष बाद उसने अपनी मां को लिखा—मां ! जो कुछ मैंने लिख भेजा है वह सामान जरूर आना चाहिए 
पहला बच्चा  है –वह भी लडका । इधर बहुत बडा समारोह करने जा रहे हैं    मैं जानती हूं कि घर की हालत है
परन्तु किया भी क्या जाए, ये रीति-रिवाज तो निभाने ही पडते है !

(छोटी-बडी बातें 1978)

Thursday, September 26, 2013

प्यासी बुढ़िया

 प्यासी बुढ़िया  



 शंकर पुणतांबेकर 



'माई ,पानी देगी मुझे पीने के लिए ?'
'कहीं और से पी ले .मुझे दफ्तर की जल्दी है .'
'तू दरवाजे को ताला मत लगा .मुझ बुढ़िया पर रहम कर.मुझे पानी दे दे .मैं तेरी दुआ मनाती हूँ -तुझे तेरे दफ्तर में तेरा रूप देखकर तरक्की मिले .'
'तू मेरी योग्यता का अपमान कर रही है ?'
बड़ी अभिमानिनी है तू !तेरे नाम लाटरी खुले ,मुझे पानी दे दे .'
'कैसे खुले!मैं आदमी को निष्क्रिय और भाग्यवादी बना देने वाली सरकार की  जुआगिरी का टिकट कभी नहीं खरीदती .'
'मुझे पानी दे दे माई .तेरा पति विद्वान न होकर भी विद्वान कहलाए और किसी विश्वविद्यालय का वाइस -चांसलर बने .'
'चल जा !मेरे पति को मूर्ख राजनीतिज्ञों का पिछलग्गू बनाना चाहती है क्या !'
'तेरे पूत खोटे काम करें ,औरतों  ,लोगों पर भारी अत्याचार करें औरतों के साथ नंगे नाचें तब भी उनका बाल बांका न हो .बस तू  पानी दे दे मुझे.'
'लगता है बड़ी दुनिया देखीहै तूने !लेकिन हम लोग जंगली नहीं है ,सभ्य हैं और हमें अपनी इज्जत प्यारी है .जा,कहीं और जाकर पानी पी .'
'तेरा पति बिना संसद के ही प्रधानमंत्री बने .सोच इससे भी बड़ी दुआ हो    सकती है ?चल,दरवाजा खोल और मुझे पानी दे .'
' देती हूँ तुझे पानी पर मेरे पति को दोगला ,विश्वासघाती बनने का शाप मत दे'
  बुढ़िया जब पानी पीकर चली गई तो औरत के मुंह सेनिकल पड़ा -यह बुढ़िया ,बुढ़िया नहीं ,हमारी जर्जर व्यवस्था है जो सस्ती दुआएं फेंक कर हमारा पानी पी रही है ...नहीं ,पी नहीं रही ...हमारा पानी सोख रही है .


 (तनी हुई मुट्ठियाँ  संपादक -मधुदीप/मधुकान्त  इंद्रप्रस्थ प्रकाशन ,दिल्ली प्र.सं.1980)








Wednesday, August 28, 2013

ओस


बल्रराम अग्रवाल
रात्रि की शीत का अभाव पाकर सूर्य समय से कुछ पहले ही संध्या के आंचल में छिप जाना चाहता था।शरीर के ताप को चीर देने वाली शीत ने हल्के अन्धकार में ही नगर के मकानों
के द्वार बंद कर दिये थे।धीरे-धीरे घोर अन्धकार नगर की गलियों में बिखर गया। चिंघाडती वायु शीत का सहयोग पाकर वृक्षों का सीना चीर देना चाहती थी।
सारा नगर उपयुक्त ताप से लिपटा सो रहा था ।नगर से दूर खेतों खलिहानों के बीच एक पुरानी झोपड़ी मे दीपक की लौ शीतलहर को न झेल पाने के कारण
कुछ समय काँपने के पश्चात लुप्त हो गई । खेत में कहीं दूर कई सियार एक साथ हूंके। फटे लिहाफ को कुछ और लपेट कर वृद्धा ने शीत को भूलने की कोशिश की ।
मेघों ने धीमी छिडका -छिडकी करके शीतलहर को मित्रता का प्रमाण दिया । झोपड़ी की देहरी के समीप ही एक कोने में पड़ी बछिया ने सिर को पेट में कुछ और अधिक
घुसेड़ लिया ।
शीत को भुलाकर तेजी से भागते ठिगने युवक ने झोंपड़ी में प्रवेश किया । शीघ्रता  में चलने  के कारण वह बछिया से टकरा गया ।
--अम्बा ! बछिया की भिंची सी आवाज उभरी ।
--कौन ! वृद्धा ने यूं ही पूछा ।
--दादी माँ रात बिता लूँ !
--...............................
--हाय राम ! वृद्धा खाँसते खाँसते हकलाई ..... मुझे उठा .... । खांसी ने शेष शब्दों को कफ में मिलाकर धरती पर उलट दिया ।
--उठों नहीं ,तुम सो जाओ दादी माँ ! मैं बैठे ही रात गुजार लूँगा । युवक ने घुटनों को पेट में घुसेड़ कर उनको दोनों हाथों के घेरे में जकड़ लिया ।
ओस मे नहाई सूर्य की भोर किरणों ने झोंपड़ी की कपाटहीन देहरी को घेर लिया । ढेर से कफ को मक्खियों ने दिनभर का भोज्य समझ  अपना लिया ।
ठिगना युवक बछिया सहित रातों रात अंतर्ध्यान हो चुका था । ओस में सीले हुए तिनकोंवाली वृद्धा की झोंपड़ी को ,उस पर लदी फली -फूली बेल सहित ,गिरवी रखकर
सेठ ने कुछ रुपये दे दिये । पड़ोसियों ने वृद्धा के निर्जीव शरीर को अरथी पर जकड़ने का श्रेयअपने कंधों पर ले लिया । मोहक कहलाने वाली गुनगुनी किरणें
शीत -वायु को पीठ पर टिकाकर श्मशान को एक और आगमन का संदेश सुना आई । ( छोटी -बड़ी बातें 1978  सम्पादक-महावीर प्रसाद जैन/जगदीश कश्यप )

Monday, June 3, 2013

आठवे दशक की लघुकथाए

देश

सिमर सदोष

वहां पानी की बहुत तंगी रहती थी ।बाल्टी भर पानी के लिये लोगों को मीलों तक चलना पडता था।वहां आदमी नहीं,मिलों ऊंट बसते थे !
एक बार सैलानियों का एक दल उस क्षेत्र में जा पहुंचा ।उनके पास पानी का काफ़ी भंडार था,जो कम से कम दो साल चल सकता था ।
गांव के लोग आश्चर्य चकित से आते और दूर खडे उन्हें टुकुर-टुकुर ताका करते।
एक दिन एक सैलानी ने गांव वालों की भीड में सबसे पीछे एक संगमरमरी बुत खडा देखा । उसे गौर से देखने के लिये वह उसके नजदीक जा खडा हुआ
। उसकी नज़र भांप कर बुत के समीप खडे एक बूढे ने खींसे निपोरते हुए कहा-मेरी बेटी है हजूर!
सैलानी ने उन्हें साथ ले जाकर एक मटका पानी दिया। बूढा बहुत खुश हुआ! उस दिन बाप -बेटी कोई तीन महीने पश्चात नहाए।रात को अन्य सैलानियों ने देखा कि
उस सैलानी के खेमे में हल्की रोशनी जल रही है। उन्होंने खेमे में से आती कुछ आवाजें भी सुनी,जैसे वह किसी बुत के साथ खेल रहा हो।
धीरे-धीरे रात भर हल्की-हल्की रोशनी में नहाये खेमों की संख्या बढती गई और सैलानियों का पानी का भंडार निश्चित समय से पहले ही खत्म होने लगा ।
 अतः एक रात मुँह अंधेरे ही वहां से कूच कर गये । प्रातः किसी अनजाने भय के कारण कोई भी अपने घर से बाहर नहीं निकला। दोपहर तक हर कोई जान चुका था कि प्रायः
हर घर में से एक-एक संगमरमरी बुत गायब है ।सब एक दूसरे से  मुँह चुरा रहे थे ।

(छोटी-बडी बातें सम्पादन-महावीर प्रसाद जैन-जगदीश कश्यप प्रकाशन वर्ष 1978 पंकज प्रकाशन दिल्ली)


Monday, April 29, 2013

जिंदगी


जिंदगी

महावीर प्रसाद जैन
शादी के बाद पहली रात उन्होंने अपने भावी जीवन  को व्यवस्थित  करने की योजनाएं बनाते हुए बितायी ण्दोनों ने अपनी सीमित आय को देखते हुए यह निर्णय भी लिया  कि अभी कम.से.कम पांच साल अपने बीच बच्चा नहीं आने देंगे
  दोनों खुश थे बावजूद ढेर.सी दिक्कतों के। पति की आय में से कुछ भी बचना मुश्किल था ।गुजर बडी खींचतान से होती थी।पर दोनों समझदार थे। हालात से जूझना जानते थे ।
  एक दिन पत्नी ने बडे उदास लहजे में कहा.सुनो! तुम किसी डाक्टर या नर्स को जानते हो जो एबोर्शन—
.दीपा ! यह.
.हां...!
दोनों हैरान थे! यह क्योंकर और कैसे हो गया!बहुत एहतियात के बावजूद भी ।
.दीपा! यह क्या हो गया हम अपना भी पूरा नहीं कर पा रहे हैं और फिर—
.इसीलिए तो कह रही हूं कि ...
  रात को खाना वगैरह खाकर वे सोने लगे तो पत्नी ने सुबह की बात आगे बढाई।पति चुपचाप सब सुनता रहा।उसके चेहरे से स्पष्ट था कि वह सारा दिन इस नयी स्थिति से निपटने का ढंग सोचता रहा था।पत्नी भी टूटी.टूटी.सी लग रही थी।
पत्नी बोली.जब इस तरह इससे मुक्ति मिल सकती है तो फिर हम उदास क्यों है ?
.तुम उदास हो ?
.नहीं आने वाले सुख से डर रही हूं !
.सुखों से डरते नहीं दीपा!
.और किया भी क्या जाये ?
.वही जो करना चाहिये अनायास वह उठ बैठा और पत्नी को स्वयं मे समेटता हुआ बोला.आने वाले की प्रतीक्षा में हम उसके स्वागत की तैयारियां करेंगे वह हमे नई जिंदगी देगा—
.हमारे हर सुख.दुख की लडाई में एक  और नाम शामिल हो जायगा ! कहते हुए पत्नी ने भी पति  को   बाहों में समेट लिया और उसे लगा कि वह पहले से अधिक सुरक्षित हो गई है !
(छोटी-बडी बातें  १९७८)

Monday, March 25, 2013

पासा


सतीश दुबे

खाना लगा दूं
हूं !
मूड तो अच्छा है ?
हां !
स्मिता आजकल जिद नहीं करती ?
हूं !
अब बाजार भाव फिर बढने लगे हैं ।
हां !
पडोस के वर्माजी का बच्चा बहुत बीमार है ।
हूं !
थोडी मिठाई भी लीजिए ना !
ऊं-हूं !
नीता की शादी में  चलेंगे ना ?
हां-हां !
आपकी क्लास-फैलो कुमुद आई थी,बडी देर तक इंतजार करती रही---!

अच्छा? कब? कहां है आजकल?कैसीहै? तुमने मुझे पहले क्यों नहीं बताया?बताओ,और क्या-क्या कहा उसने?

मैंने यह सब उससे पूछा था किन्तु वह हां -हूं करती रही ।

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प्रतिनिधि लघुकथाएं । 1976 । साहित्य संगम ,इंदौर

Thursday, February 21, 2013

रोजी


                   रोजी

       महेश दर्पण

तडाक---तडाक---तडाक--- उसने पूरी ताकत से सोबती के गाल पर तीन चार तमाचे जड़  दिये।वह अभी और मारता पर पीछे से सत्ते ने हाथ रोक लिया—पागल हुआ है क्या---डेढ हड्ड़ी की औरत है मर गई तो—?
उसके हाथ रुके तो जबान चल पड़ी
—हरामजादी आंख        फाड़-फाड़ कर क्या देख रही है –रात भर में तुझे दो ही रुपये मिले बस ? निकाल कहां छिपा रखे है--- रोटी तोडते समय  तो ऐसे   ---।
सोबती की लाल आखें, जो अब तक झुकी हुई चुपचाप सुने जा रही थी,उसकी ओर उठ गई –चुप भी कर हिंजडे—रात भर बीड़ी के पत्ते मोडे हैं  और तू----तन बेचना होता तो तुझे खसम ही क्यों करती !
(समग्र-१९७८)(छोटी-बडी बातें  १९७८)

Friday, January 11, 2013


सत्याग्रही 
प्रभासिंह
वे सत्याग्रह करने आई   थी। भुखमरी, बेरोजगारी, पिछड़ापन दूर करने और शिक्षा व्यवस्था को नया मोड़ देने के लिए।
वे राजनीति नहीं समझती थीं फिर इन सारी समस्याओं से ग्रस्त थी। जाड़े की हडडी कंपा देने वाली सर्द रातों के लिए , एक कम्बल तक उनके पास नहीं था। और शरीर पर चिथड़े ही चिथड़े थे।
दल की ओर से सत्याग्रह और फिर गिरफता्री में, महिलाओं का नाम आ जाने से सत्याग्रह का रिकार्ड कायम हो जाता । बस इसी आधार पर वे सत्याग्रही दल के नेताओं द्धारा फुसलाकर लाई गई थी।
तीन दिनों के निरंतर प्रयास के बाद भी वे जेल नहीं ले जाई गई तो नेताओं के लिए वे बेकार साबित होने लगी और वे लोग उन्हें टरका देने के उपाय सोचने लगे।
चौथे दिन दल के नेताओं ने सुबह में कार्यालय खाली पाया। वे चली गई थी पर कार्यकर्ताओं के धोती, लौटा और कुछ कम्बलों के साथ ही।
वे अपने अभियान में सफल रही थी, जबकि नेताओं का सत्याग्रह विफल गया था।


अतिरिक्त(मार्च1973)
रेगिंग
कृष्णा अगिनहोत्री
पिता कृषक । सीधी बंजर भूमि पर निंरतंर प्रयास से कुछ पैदा कर सके।
एक पुत्र : उसे कृषि में योग्य बनाने के लिए कृषि महाविधालय भेजा। गरीबी का आंचल फाड़कर वे किसी प्रकार प्रत्येक माह रूपये भेज देते और मंदिर में जाकर ईश्वर से प्रार्थना करते कि बेटा अच्छी तरह पास हो जाय।
लड़का सीधा सच्चा पिता की इच्छाओं को पूरा करने के लिए लगन निष्ठा में अग्रसर । सीधी वेषभूषा सादा आचरण। लड़के उसे छेड़ते साधु महाराज की जय। उसे बहुत कहा गया परंतु वह गाढ़ी पैतृक कमाइ से अपने मित्रों की खिलाने पिलाने को सहमत न हुआ। लड़के बिगड़े उसे निर्वस्त्र करके सताया। परंतु उसने रूपये नहीं दिये। वह जानता था कि इनके जाने पर वह फीस जमा न कर सकेगा।
आप लोग जितनी चाहे रेगिंग ले पर मैं बहुत गरीब हूं मुझसे रूपये मत मांगी। लड़का रोने लगा।
ठीक है बच्चू गरीब है तो पढ़ने क्यों आया देख लेगे? छात्रों का झुण्ड चला गया।
लड़का प्रतीक्षा करता रहा एक से पन्द्रह तारीख आ पहुंची पर मनीआर्डर नहीं आया। वह सर पकड़ कर बैठा रहा । आज उसके कमरे में शानदार पार्टी थी पर वह कोने से खाली आंखो में ताकता रहा ।
उसके रूम -पार्टनर ने घकियाया- अबे बुद्धु चुप क्यां है इतना भी नहीं समझता तेरा ही तो माल है खाता क्यों नहीं
क्या !
हां परसों ही तो मेरा मनीआर्डर राजीव ने तेरी ओर से लिया था। उसकी आंखों का खालीपन बढ़ने लगा। बढ़ता गया वह जोर से चीखा मेरी फीस और अचानक चीख मारकर चुप हो गया।
साधु महाराज की जय....जय ।  पर वह चुप रहा। भूखा प्यासा चुप रहा। चुप्पी बढ़ती ग ई। लड़केसाधु महाराज की जय... कहते कहते बिखर गये। पर वह बैठा रहा। वैसा ही चुप और खाली।
मानसिक चिकित्सालय की मोटर आ ग ई। वह पागलखाने के कमरे में बैठा बुदबुदाया।
रेगिंग लो रूपये मत लेना।

अतिरिक्त(मार्च1973)     आई   

Friday, December 14, 2012


मकान
रमेश जैन
मैं अब इस का सामना नहीं कर सकता । मेरी अंतिम इच्छा है कि मकान के तले दबकर मर जाउं।
            अब इस मकान का अल्लाह ही मालिक है।
            इस मकान में शांति नाम की कोई चिडि़या नहीं चहकती । शांति के विषय में मेरी कोई व्याख्या नहीं  है।                                        

बरसों  पहले आदर्शवादिता ने इस मकान में जन्म लिया। तब से लेकर यह मकान इसी स्वप्नमयी का शिकार बन धंसता चला जा रहा है।
यह मकान लक्ष्मी द्वा्रा शापित है ।इस मकान में कई सारे लोगों ने मिलकर लक्ष्मी का शीलहरण किया है।
यदि यह मकान थोड़ा और पुराना होता तो अब तक खण्डहर भी नहीं रहता ।
इस मकान पर मेरा कोई अधिकार नहीं है। तिस पर भी यह मकान मुझसे काफी अपेक्षाएं रखता है । इसकी एक भी इंट उखड़ना मेरे लिए अभिषाप बन जायेगा।
यह मकान वीर्य -पुन्ज है । इस मकान की दो उत्तराधिकारिणियां है - एक मकान के अंदर वाली दूसरी बाहर वाली। बाहर -वाली शगुफा है तो अंदर वाली अंधेरी गुफा । एक इस मकान को चबा डालना चाहती है तो दूसरी डसना ।
नदी तूफानी है। मस्तूल डूब रहा है। किनारे पर खड़े लोग तमाशा देख रहे है।

  1.  

Thursday, November 8, 2012

आठवे दशक की लघुकथाए
















युगधर्म
            लक्ष्मीकांत  वैष्णव 
       
            अंदर कुछ बंट रहा था। तनिक ठिठका तो  द्वारपाल
 ने नजदीक आकर कहा, रेवड़ी बंट रही है। खाना चाहोगे! मैंने कहा कि चीज ही ऐसी है जिसे हर आदमी खाना चाहेगा-और मैं  द्वार की ओर बढा। ठहरो,एक आदमी अंदर से दौडा आया,पहले अपनी जाति बतलाओ''क्यों? मैंने पूछा। हम लोगों को उसकी जाति से पहचानते हैं।‘’  तो क्या रेवड़ी भी जाति पूछ -पूछ कर दी जा रही है।‘’ मैंने अंदर रेबड़ी खा रहे लोगो की ओर र्इशारा करके पूछा। वह बोला ''हां ‘’।– मगर प्रजातंत्र के युग में जातिवाद?” उत्तर में वह आदमी हंसा फिर बोला- अब्बल तो रेवड़ी खाने वाले तर्क नहीं किया करते और अगर करते भी हैं तो रेवड़ी पेट में पहुंच जाने के बाद करते है। मैंने कहा- ''हम सभी मनुष्य जाति के हैं। हम में भेद क्या है ?”  लगता है तुम्हें रेबड़ी नहीं खानी है तभी व्यर्थ की बात कर रहे हो ।‘’  वह लपक कर दूसरे याचक की तरफ बढ़ गया।

(गुफाओं से मैदान की ओर - 1974) 

Saturday, October 6, 2012

आठवे दशक की लघुकथाए

 भूख
जगदीश चन्द्र कश्यप

वह पूरी शक्ति से भाग रहा था। जब वह रूका तो उसनेअपने को किसी बड़े नगर में पाया। कई बार रो पड़ने के बावजूद किसी ने भी उसे अपने पवित्र घर में घुसने नहीं दिया था। अब वह गांव की ओर दौड़ रहा था।
डसे अच्छी तरह से मालूम था कि पीछा करने वाली डायन उसके मां बाप को भी निगल गयी थी । पूरी की पूरी जिंदगी उसने इस डायन की कैद से छुटकारा पाने में बरबाद कर दी। किसी तरह वह एक रात को चुपचाप भाग निकला था।
ये बुढढा भी वर्षो पहले चंगुल से निकल भागा था। एक हफते तक मैनें इसे खाट से उठने नहीं दिया।
उसके यह सोचते ही कि वह तीन दिन से भूखा है- उसके पेट में कुछ ऐठन सी हुई । फिर भी वह मुड़ भागा। वह मुस्कराती रही ।
जैसे ही वह एक मोड़ पर रूका । वह सामने खड़ी थी। तुरंत ही उसने ढेर सा खून उगला और उसके कदमों में गिर पड़ा।

 
 


वह सुखी था
कृष्ण कमलेश

वह बहुत सुखी था। उसके पास सबकुछ था। बूढ़ी मां, गुडलुकिंग बीवी-जिसके दांत थोड़े बढ़े हुए जरूर थे लेकिन वह उसके सौंदर्य में वृद्धि  ही करते , एक अदद नौकर भीं वह पिछले दो साल से बहुत सुखी था, क्योंकि उसे शादी किये हुए इतना ही अरसा गुजरा था और वे दोनों परिवार बढ़ाओं आंदोलन के हामी नहीं थे। अभी दो तीन साल और इरादा नहीं था उनका । हालांकि नाम उन्होंने पहले से ही सोच रखे थे। अनुराग या अनिवता । लेकिन । बहुत कम लोग उनके यहां आते जाते । हां कोल बैल जरूर उसने अपनी बीवी के कहने से लगवा ली थी। गजर कोंल बेल। तबियत में आती, बजती। वायरिंग ठीक -ठाक थी, लेकिन ...।
उसे दहेज में एक ट्रांजिस्टर मिला था । जब मन में आता बजता या महीनों चुप रहता । उसने बड़े -बड़े इलेक्ट्रिशियनस बुलाए , लेकिन—।
उसकी बीवी ने उसकी पिछली सालगिरह पर सिगरेट कम लाइटर प्रजेन्ट  किया था, पेट्रोल से जला था बस पहलीवार और अब छठे छिमाहे सिगरेट सुलगा लेता है।
उसकी मम्मी कभी उस पर अतिशय ममत्व प्रकट करती तो कभी आक्रोश । पिछले अठारह बरसों में वह अपनी मम्मी को समझ नहीं पाया था।
और उसकी बीवी कभी केफे में, कभी बारात में कभी स्नानगृह में तो कभी कार में ही जिद करती । उसे अपना बीवीपना जाहिर करने का ऐसी ही जगहों पर मौका मिलता और उसके लिए समपंग ठुकरा पाना मुश्किल हो जाता, बल्कि नामूमकिन भी।
हां -वह सचमुच बहुत सुखी था।

Monday, September 10, 2012

आठवे दशक की लघुकथाए


पुल बोलते हैं
कैलाश जायसवाल

लम्बा और सूना प्लेटफार्म। सीमेन्ट के शेडस से टकराती तिरछी घनी बूंदें । मध्यरात्रि के आलोक में पटरियों पर गिरती  उछलती और बिखरती बूंदों का अटूट कम प्लेट फार्म की परिधि के परे गहरा अंधेरा । अंधेरे में उभरते कई अनगिनत आकृतियों के अस्थिर आभास । प्लेट फार्म के उपर से गुजरता हुआ दूर तक दिखता उंचा पुल, वर्षा और धूप आकाश से बतियाता -सा । न जाने कितने उसके उपर से और न जाने कितनी रेलें उसके नीचे से गुजर गयी वह कई सालों से यू हीं खड़ा है।
आज अधंरी रात मे , वर्षा में ही घूमा जाये मैनं सोचा और प्लेट -फार्म से निकलकर पुल पर चढ़ने लगा। एक बहुत ही तेज और ठंडे झोंके ने मेरे आलिंगन कर दिया और मैं अंधेरी वर्षा में निर्बाध घुस गया।
मुझे गिरते पानी के नैरन्तर्य में नगर की सड़कों और सीमांतो पर घूमना बहुत अच्छा लगता है  बगैर छतरी या बरसाती के बीच -बीच से गर्म चाय के दो - दो,  तीन -तीन कप पीता रहता हूं । अभी तक बरसते दिनों में ही घूमा हूं। आज अंधेरी बरसाती रात के निर्जन से पुल पर भटकने की इच्छा दुर्दान्त हो उठी थी। अब मैं पुल पर पहुंच गया हू। । इस पुल पर एकदम अंधेरा क्यों है   शायद लाईट खराब हो गई है।
घुप्प अंधेरे में मैं सिर्फ वर्षा की उर्जा महसूस कर रहा हूँ।। पावों के नीचे खिलखलाती जलधाराएं लुढ़क रही है। अनुमान से आहिस्ते -आहिस्ते चलता हुआ मैं पुल के चक्कर लगाने लगा सहसा चाय की याद आ गई, कहां मिलेगी  प्लेटफार्म का स्टाल भी बंद पड़ा था  पांच बजे से पहले क्या मिलेगी । मैंने मन ही मन सोचा अंधेरे पुल की छाती पर अंधेरे में चलते हुए मुझे लगा कोई मुझे इस तरह पुल की छाती पर अंधेरे में चलते हुए मुझे इस तरह पुल पर चक्कर लगाते देख लो तो वह क्या सोचेगा वह शायद यही सोचेगा कि मैं पुल का संतरी हूं । मुझे हॅंसी आ गई- उसे क्या पता कि मैं इन्जाय के लिए घूम रहा हॅं। वर्षा और हवा की गति अभी भी वैसी ही थी कहीं दूर से चार का गजर खड़का अभी तो एक घंटा और है मैंने सोचा। गजर की आवाज सारे परिवेश में से लपलपाती हुई गुजर गई फिर मौन था यानि हवा और वर्षा की आवाजें थी- आती हुई गुजर गई फिर मौन था यानि हवा और वर्षा की आवाजें थी- पूर्ववत् । एक घंटे बाद ट्रेन आ जायेगी। स्टाल खुलेगा  और चाय के पूरे तीन कप पीकर बर्थ पर जा लेटूंगा आज की सुबह अच्छी ही गुजरेगी खूब गहरी नींद आ जायेगी। इस वक्त पुल पर आने से दो काम हो गए। मुझे अपने यहां आने पर खुषी होने लगी।
कौन जानेगा- कि आज मैं रात यहां घूमता इस पुल की इस अजनबी नगर की एक बरसती रात को ब्लेक डाग पीता रहा और मुझे किसी ने भी नहीं देखा। कौन जानेगा। अभी आश्वस्त ही हो रहा था कि एक आवाज हवा से अलग  मेरे पास से  मुझे छूती हुई या हलके से धकियाती हुई बूंदों पर सवार गुजर गयी।
कौन है! कौन है! मैंने पूछना चाहा, चीखना चाहा मगर आवाज गले से बाहर निकली नहीं । शायद बौधारों ने मुहॅं ही नहीं खुलने दिया। हवा और वर्षा की गति अभी भी वैसी ही थी । क्या पुल भी बोलता है?

(गुफाओ से मैदान की ओर  -   1974)