Saturday, July 3, 2021

 

पेट सबके हैं

वरिष्ठ कथाकार भगीरथ की चुनिऺदा

लघुकथाओऺ का सऺग्रह

 

 

 

 

 

 

 

 

 

भगीरथ


 

 

 

 

समर्पण

Ø वेद प्रकाश अमिताभ

Ø राधेलाल बिजघावने

Ø सतीश राठी

Ø पुरुषोत्तम दुबे

Ø  उमेश महादोषी 

और

Ø पड़ावऔरपड़तालशृंखला के शिखर पुरूष

Ø मधुदीप को


 

भगीरथ की लघुकथाएँ

इस पुस्तक पूरी यहाँ दी जायगी. एक एक पोस्ट 
 




  पेट सबके हैं

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 


 

Website: - www.booksclinic.com

B.D. Complex, Near Tifra Over Bridge, Bilaspur, Chhattisgarh, India, 495001

 

 

 

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ISBN:

Book: Fiction

First Edition Published by

Booksclinic Publishing 2020

Copyright ©Bhagirath2020

Price: Rs.

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

Printed in India

Sunday, October 25, 2020

 छोटी कथाओं की बड़ी बात 15

सन्देश
आलोक भारती
चिड़िया ने कली के भीतर चोंच डालकर उसे हिलाया. ‘उफ्फ ! मेरा सर्वस्व ही चूस लिया !’ कलि ने वेदना प्रकट की. ‘इतनी दूर से तेरे प्रियतम का सन्देश लाई हूँ, और मैं अपना मुँह भी मीठा न करूँ ?’ चिड़िया मुस्कराई और उड़ गई.
अहंकार
आलोक भारती
एक महाशय ने दियासलाई की डिबिया खोली. तीलियाँ खिलखिला पड़ी. एक तिल्ली ने ऐंठकर कहा, ‘मैं कितनी शक्तिशाली हूँ, मेरे एक इशारे पर आग की चिंगारियां निकलती है. मैं क्षणभर में सभी को भस्म कर सकती हूँ.’ महाशय ने सहजता से कहा, ‘ऐ तिल्ली ! तेरा इतराना ठीक नहीं है. किसी को जलाने से पहले तुम्हें खुद भी जलना पड़ेगा. खुद भस्म होकर ही तुम दूसरों को भस्म कर सकोगी. तेरा जलना सभी देखेंगे परन्तु तू किसी का जलना नहीं देख सकेगी. तेरा तो अस्तित्व ही भस्म हो जायगा ...’


Saturday, October 24, 2020

  छोटी कथाओं की बड़ी बात -14

शिलान्यास –अशोक मिश्र

हरिजनों के आवास के लिए बनायीं गई ‘इंदिरा आवास कॉलोनी’ बाढ़ का एक धक्का भी न झेल पाई और अब वहां पर किसी ईट पत्थर का नामोनिशान तक न रह गया था. फिर भी वहां पर एक दीवार खड़ी थी अपनी पूरी मजबूती के साथ. बाढ़ भी जिसका बाल बांका न कर सकी थी. वह थी शिलान्यास  के  पत्थरवाली दीवार. जिस पर लिखा था-प्रधानमंत्री द्वारा उद्घाटित देश की खुशहाली एवं तरक्की के लिए.



आँखें –अशोक मिश्र

निर्दोष युवक को जब फांसी होने लगी तो जेलर ने उसकी अंतिम इच्छा पूछी, “तुम्हारी मरने से पूर्व कोई अंतिम इच्छा हो बताओ!”                                                          “क्या आप पूरी कर सकेंगे ?”   


एक                                                                                “पूरा प्रयास करेंगे.”                                                                    “तो सुनो और कान खोलकर सुनो. मैं अपनी दोनों आँखें इस देश की अन्धी न्याय-व्यवस्था को देना चाहता हूँ...|”


Thursday, September 24, 2020

 छोटी कथाओं की बड़ी बात -13






गाँधी भक्त बन्दर- गिरीश पंकज

देश आजाद हुआ, तो गांधीजी ने अपने तीनों बंदरों से कहा-  ‘जाओ देश सेवा करो, मगर ध्यान रहे, बुरा मत करना, मत कहना और मत सुनना.’  तीनों ने गांधीजी का कहना माना और बुरा करने, देखने एवं सुनाने के लिए निजी सहायक रख लिए और निश्चिन्त होकर राजनीति करने लगे.

जेंटलमेन प्रोमिस- गिरीश पंकज


पिछले साल की तरह इस बार भी वेबाढ़ की तबाही का हवाई सर्वे कर रहे थे। लोग बह रहे हैं, मरे पड़े हैं, घर डूब गए है। ऊपर से ऐसे दृश्य निहारो, तो बड़ा रोमांचक होता है. मीडिया के सामने आंसू बहा कर वे घर पहुंचे तो पत्नी बोली, ”आप बड़े वो हैं। इस बार भी अकेले-अकेले उड़ गए। बच्चे बोले, ”हम भी एन्जॉय करते पॉप। महोदय ने शरमाते हुए कहा, ”अरे, डोंट बादर, तबाही तो आती रहती है। अगली बार साथ-साथ चलेंगे। इट इज जेंटलमेन प्रोमिस।
संतुष्ट हो कर पत्नी लेडीज़ क्लब के लिए निकल गयी और बच्चे लाँगड्राइवपर।

Tuesday, June 30, 2020

छोटी कथाओं की बड़ी बात 12





मंजर
चेतना भाटी

‘सुनिए, मुझे कविता पाठ के लिए आमंत्रित किया गया है.’ पतिदेव का मूड देखकर पत्नी ने धीरे से कहा.                                                                               ‘फालतू बातें मत करो. मेरे दोस्त आनेवाले हैं शाम को खाने पर.’ पतिदेव टाई की गाँठ लगाते हुए बीच में बोले.                                                                     शाम को पकौड़ियों के लिए बेसन घोलते वक्त पत्नी की आँखों में कवि सम्मलेन का मंजर घूम रहा था....अब श्री ये कविता पाठ कर रहे होंगे, अब सुश्री वे उठी होंगी...कि तभी आदेश मिला ‘ड्रिंक्स जल्दी सर्व की जाय ....और पत्नी के हाथ तेजी से चलने लगे. बाएँ हाथ से माथे का पसीना इस तरह पोंछा मानो सारे मंजर मिटा देना चाहती हो मस्तिष्क पटल से.

 पापी पेट

 चेतना भाटी


     मैली कुचैली , फटी कमीज उठा कर पापी पेट के नाम पर भीख माँगने का उपक्रम कर ही रह था कि शरमाकर ठिठक गया वह , जब सामने चलते टी वी पर नजर पड़ी । नाम मात्र को कपड़े पहने बाला उन्हें भी उठा कर अपना पेट दिखाते हुए नाच रही थी और पूरे स्क्रीन पर पेट ही पेट छाया हुआ था ।
     " टी वी के कारण पेट पल रहे हैं या पेट के कारण टी वी चल रहे है ? " - पेट पर हाथ धरे वह सोच रहा था ।





Thursday, June 18, 2020


छोटी कथाओं की बड़ी बात 11


डंडा

अनिल शूर आज़ाद


“आज फिर गलत लिखा! बेवकूफ कहीं का !चल बीस बार इसे अपनी कापी में लिख ...”              “नहीं लिखूँगा !” उसके स्वर की कठोरता देखकर मैं दंग रह गया.                                 मैंने पूछा, “क्यों नहीं लिखोगे ?”                                                         “पिताजी रोज दारू पीकर मारते हैं.कहते थे, अब एक महीना पूरा होने से पहले नयी कापी माँगी तो बहुत मारूँगा...” कहते हुए डंडा खाने के लिए हाथ आगे कर दिया.                                             मैं उसकी डबडबाई आँखों में झाँकता रहा. मेरा उठा हुआ हाथ जाने कब का नीचे ढरक गया था. 
    

विद्रोही

अनिल शूर आज़ाद

पार्क की बेंच पर बैठे एक सेठ, अपने पालतू 'टॉमी' को ब्रेड खिला रहे थे। पास ही गली का एक आवारा कुत्ता खड़ा दुम हिला रहा था।
वह खड़ा दुम हिलाता रहा, हिलाता रहा। पर..लम्बी प्रतीक्षा के बाद भी जब, कुछ मिलने की संभावना नहीं दिखी तो..एकाएक झपट्टा मारकर वह ब्रेड ले उड़ा। कयांउ-पयांउ करता टॉमी अपने मालिक के पीछे जा छिपा। सेठ अपनी उंगली थामे चिल्लाने लगा।
थोड़ी दूरी पर बैठे उसे, बहुत अच्छा लगा था यह सब देखना!


Sunday, May 31, 2020

छोटी कथाओं की बड़ी बात 10

सुहाग की निशानी
अतुल मोहन प्रसाद

 ‘माँ! मैं बैंक की परीक्षा में पास हो गई हूँ|’                                                       ‘बहुत ख़ुशी की बात है बेटे ! तुम्हारी पढाई पर किया गया खर्च सार्थक हो गया |गांव में कॉलेज रहने का यही तो लाभ है| लड़कियां बी ए तक पढ़ जाती हैं |’ माँ ख़ुशी का इजहार करती हुई बोली| |                                                                                                      ‘इंटरव्यू लगभग तीन माह बाद होगा| बैंक की शर्त के अनुसार कंप्यूटर कोर्स करना आवश्यक है|’                                                                                                                                         ‘तो  कर लो| लो|                                                                                                                                                     ‘शहर जाकर करना होगा उसमें पांच हजार के करीब खर्च है |’ उदास होती हुई बेटी बोली|                                                                                      ‘कोई बात नहीं‘ माँ अपने चेहरे पर आई चिंता की रेखाओं को हटाती हुई बोली, ‘मैं व्यवस्था कर दूंगी |’                                                                                 ‘कैसे करोगी माँ?’ बेटी विधवा माँ की विवशता को समझती थी|                                                                                                            ‘अभी मंगल सूत्र है न ?किस दिन काम आएगा उसको बेचकर ...’                                                                                                           ‘नहीं माँ !वह तो तुम्हारे सुहाग यानी पिताजी की निशानी है तुम उसे हमारे लिए ...’ 
                                                                               ‘तुम भी तो उसी सुहाग की निशानी हो, उसी पिता की निशानी हो| इस सजीव निशानी को बनाने के लिए उस निर्जीव निशानी को गंवाना भी पड़े तो कोई गम नहीं|’ कहती हुई माँ के कदम आलमारी में रखे मंगल सूत्र की ओर बढ़ गए |




लंच बॉक्स 
अतुल मोहन प्रसाद

बिट्टू के पिताजी के विद्यालय जाने के समय ही किसी कार्यवश उनकी पड़ोसन आ गई |                                    ‘आज बिट्टू के पापा अवकाश पर हैं क्या?’ पड़ोसन ने बिट्टू की माँ से सवाल किया |                                        ‘नहीं तो |विद्यालय जाने के लिए ही निकले हैं|” बिट्टू की माँ ने कहा |                                              ‘आज खाली हाथ जा रहे हैं? लंच बॉक्स नहीं लिए हैं ?’ पड़ोसन ने एकसाथ दो सवाल दाग दिए|                           'जब से विद्यालय में सरकार ने छात्रों के लिए दोपहर में भोजन की शुरुआत की है, उन्होंने लंच बॉक्स ले जाना बंद दिया है|’ पड़ोसन को आश्वस्त करती बिट्टू की माँ ने कहा|

Wednesday, May 20, 2020

छोटी कथाओं की बड़ी बात 9



संवेदन पीठिका
-कृष्णलता यादव

अपनी दादी के सामने बैठी अनि एक पल दादी के चेहरे को देखती, दूसरे पल उसकी नजरें दादी के पलस्तर बंधे हाथ पर जा टिकती. तत्क्षण उनका बायाँ हाथ अपने नन्हें हाथों में लेकर बोली, ‘दादी, अगर हाथ टूटना ही था तो यह वाला टूट लेता.’                                           
‘फिर क्या होता, बेटू?” दादी ने लाड से भरकर पूछा.  ‘फिर आप उस वाले हाथ से लिखती रहती और आपको चुप-चुप नहीं बताना पड़ता. अब तक बहुत सारी कविता और कहानियां लिख चुकी होती न ?”                                                                                 अनि को अपने बाहुपाश में समेटते हुए दादी ने उसका माथा चूमा और अस्फुट शब्दों में कहा, ‘मेरी बेकली को समझनेवाली मेरी बच्ची, तुम संवेदना का गहना पहनकर धरती पर आई हो. दुआं करती हूँ, यह गहना यूँ ही दिपदिपाता रहे.’ कहते-कहते उनकी आँखों से दो मोती ढलक पड़े.




पहचान
-कृष्णलता यादव       
सार्वजनिक कार्यालय में काउंटर पर कर्मचारियों की लम्बी कतार. किसी के सामने पट्टिका नहीं. न जाने इनमें रत्ना कौन है. पूछने पर एक कर्मचारी ने बताया, पकौड़े-सी नाक, बिल्ली की सी आँखें, हाथी के से कान और ऊंट के से होंठों वाली महिला रत्ना है.                                    मैं कुछ आगे बढ़ी. दिमाग में बिल्ली, ऊंट, हाथी के चित्र बनने –बिगड़ने लगे तो झुंझलाहट हुई.एक अन्य कर्मचारी से पूछताछ की. उत्तर मिला, “सबसे भोली सूरतवाली स्त्री को रत्ना  समझिए.”                                                                  मस्तिष्क में रह-रह कर प्रश्न उठ रहा था. रत्ना के बहाने इन दोनों ने अपनी पहचान नहीं बता दी?     

     


Monday, May 11, 2020

छोटी कथाओं की बड़ी बात 8




परिवर्तन


–मालती बसंत
वह बहुत सीधी-सादी लड़की थी. कॉलेज में पढ़ती थी. फिर भी आधुनिक वेशभूषा से उसे परहेज था. साडी पहनती, कसकर एक चोटी बनाती, माथे पर बड़ी–सी बिंदी, पिता की आज्ञाकारी, हमेशा नजरें झुकाए चलती.                                                                                               लेकिन उसने देखा, वह तेजी से पिछड़ती चली जा रही है. सहेलियों में उपेक्षा पाती, लड़के उसके सीधेपन का मजाक उड़ाते.                                                 यह सब सोचकर उसने अपने को बदल डाला. उसने आधुनिक ढंग के कपडे सिलवा लिए. बाल कटवा डाले. बोलने में अंग्रेजी लचक लाने लगी. एकदम मॉडर्न लड़की की तरह उसका व्यवहार हो गया.                                                                             पढाई ख़त्म होने पर एक बहुत अमीर, सुन्दर, पढ़े-लिखे लडके से उसकी बात चली तो लडके ने उसे देखकर इंकार कर दिया कि उसे फैशन की तितली नहीं, सीधी-सादी घरेलू पत्नी की जरुरत है.                                                                                   अब फिर से अपने को बदलना उसे बहुत कठिन लग रहा था. 
  
प्रेमविवाह
-मालती बसंत
कॉलेज में वाद-विवाद का विषय था- प्रेम-विवाह उचित है या अनुचित? कई छात्र –छात्राओं  ने इसमें भाग लिया और प्रेम-विवाह को उचित ठहराया, किन्तु सिर्फ दो ही विद्यार्थी ऐसे थे, जिन्होंने प्रेम-विवाह अनुचित है पर जोरदार भाषण दिए. वे थे बी.ए. की छात्रा नीलम और एम.ए. का छात्र  विनोद.                                                                       नीलम विनोद के विचारों से सहमत थी और विनोद नीलम के विचारों से. इन्हीं विचारों के कारण वे एक दूसरे के निकट आए और सत्र के अंत तक दोनों प्रेम-विवाह का निर्णय ले चुके थे.  


Friday, May 1, 2020

छोटी कथाओं की बड़ी बात 7




व्रती
– कान्ता राय

सालों गुजर गए थे, मोहित विदेश से वापस नहीं लौटे.   

प्रतिदिन फोन का आना, धीरे-धीरे हफ़्तों का अंतराल लेते हुए, महीनों में बदल गया.                                         

   पतिव्रता अपने धर्म का निर्वाह किए जा रही थी कि आज ऑफिस में काम के दौरान अशोक दोस्ती से जरा आगे बढ़ ए.    

  उसने इंकार नहीं किया और व्रत टूट गया.

बैकग्राउंड
- कान्ता राय
"ये कहाँ लेकर आये हो मुझे।"
"अपने गाँव, और कहाँ!"
"क्या, ये है तुम्हारा गाँव?"
"हाँ, यही है, ये देखो हमारी बकरी और वो मेरा भतीजा "
"ओह नो, तुम इस बस्ती से बिलाँग करते हो?"
"हाँ, तो?"
"सुनो, मुझे अभी वापिस लौटना है!"
"ऐसे कैसे वापस जाओगी? तुम इस घर की बहू हो, बस माँ अभी खेत से आती ही होगी"
"मै वापस जा रही हूँ! सॉरी, मुझसे भूल हो गई। तुम डॉक्टर थे इसलिए ...."
"तो ....? इसलिए क्या?"
"इसलिए तुम्हारा बैकग्राउंड नहीं देखा मैने।"